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Friday, March 16, 2018

TAURUS-ZODIAC SIGN "वृषभ राशि"

              राशि चक्र की द्वितीय राशि वृषभ है जो शुक्र की ठंडक से परिपूर्ण शांत और स्थिर राशि है. इस राशि के जातक सहनशील और और निरंतर काम करने वाले तथा शक्ति होते हुए भी जंगली नहीं होते हैं , बल्कि अपनी शक्ति का सदुपयोग करना जानते हैं. इन्हें सामान्यतया उतावला होते हुए नहीं देखा जा सकता.
       
               बालकों के विषय में बात की जाए तो ऐसे बालक जिनकी माताओं को अक्सर दूसरी महिलाएं यह कहते हुए पाई जाती है की तेरा  बच्चा तो बहुत ही सयाना है एक बार कहीं पर बिठा दो तो बैठे बैठे ही खेलता रहता है और रोता भी नहीं है. सामान्यतया मुस्कुराने वाले और अपनी मुस्कुराहट से मन मोहने वाले यह बालक वृषभ के होते हैं. शुक्र की मुस्कुराहट सदैव इनके होठों पर रहती है और वृषभ की स्थिरता इनके एक जगह बैठने का कारण. माता इन्हें एक स्थान पर बिठाकर आसानी से अपना कार्य कर सकती हैं मोहल्ले के आयोजन में जब मेष राशि के बालकों द्वारा दो खंभों के बीच दौड़ का आयोजन होता है तो उस आयोजन में भाग न लेने वाले और एक स्थान पर बैठकर "चिड़िया उड़ - कबूतर उड़" के खेल खेलने वाले जातक वृषभ राशि के होते हैं. सामान्य रूप से यह ऐसा कोई कार्य नहीं करते जिसके लिए उन्हें डांट खानी पड़े लेकिन  यदाकदा ऐसा होने पर यदि कोई इन्हें  डांटता है  तो ये  बिल्कुल सौम्य बने रहते हैं.

               ये  व्यक्ति सदैव ही मेहनती होते हैं और मेहनत करने में कोई कसर नहीं छोड़ते. वृषभ राशि का प्रतीक बैल है अतः बैल की सहनशीलता,शक्ति, सामर्थ्य, लगन यह सभी वृत्तियां इन लोगों में पाई जाती हैं. ये  अपने विचार बिना डरे हुए सभी के सामने रखते हैं और अपने विचारों को बार-बार नहीं बदलते. हर किसी के मामले में टांग अड़ाने की इनकी आदत नहीं होती. ये  व्यक्ति व्यवहारिक, भरोसा करने वाले और  भरोसे के लायक तथा  शांत ,धैर्यशील  और स्नेह रखने वाले होते हैं . इनकी आत्मशक्ति बहुत ही दृढ़ होती है तथा इनकी सहनशक्ति भी असाधारण होती है. सौंदर्य, संगीत, कला इत्यादि से इन्हें बहुत लगाव होता है. ये  लोग अधिक समय तक गुस्से में नहीं रह पाते क्योंकि इनका मूल स्वभाव ही प्रसन्न रहना होता है. इनका क्रोध बहुत ही भयंकर होता है किसी ज्वालामुखी के फटने समान,क्रोध आने पर ये कई तरह से नुकसान भी कर देते हैं और कई बार स्वयं का नुकसान भी कर लेते हैं.अतः प्रयास ये किया जाना चाहिए कि इन्हें गुस्सा ना आये. वृषभ राशि में भोजन पकाने का बागवानी का  शौक भी पाया जाता है.

             इनकी कद काठी के विषय में यदि बात की जाए तो मेरा ऐसा मानना है कि यदि शारीरिक कद काठी से ज्योतिषीय राशि को पहचानना हो तो सबसे आसानी से पहचान में आने वाले जातक वृषभ और तुला के ही होते हैं. इनका शरीर गोलाई लिए हुए चेहरा चौड़ा  और चौकोर, गर्दन मोटी ,आंखें भूरे रंग और काले रंग की मिश्रित, कंधे बड़े और मांसपेशियां काफी उन्नत होती है. इन्हें देख कर आसानी से यह पता लगाया जा सकता है कि यह जातक वृषभ या तुला के हैं, लेकिन वृषभ और तुला में अंतर स्पष्ट पता करने के लिए काफी अनुभव की आवश्यकता होती है,

              जब धैर्य का उदाहरण देना हो तो लोग वृषभ वाले व्यक्तियों का उदाहरण दिया करते हैं अतः ये लोग दूसरों के लिए प्रेरणा स्रोत भी होते है. इनकी इच्छा शक्ति बहुत ही प्रबल होती है और धन पर सदैव इनकी पैनी निगाह बनी रहती है. ये  लोग उत्सव धर्मी होते हैं तथा विभिन्न उत्सव में भोजन का विशेष रूप से मिठाई का पूर्ण आनंद उठाते हैं.  ग्रहणशील होना इन की सबसे बड़ी विशेषता है, ये  पने दोस्तों के लिए व परिवार के लिए सदैव समर्थन का वातावरण बनाए रखते हैं अतः इन सभी का विश्वास जीतने में सफल रहते हैं. प्राकृतिक सुंदरता को देखकर ये सदैव ही प्रफुल्लित होते हैं. निरर्थक बातें नहीं करते तथा अपने अंतर्ज्ञान और ज्ञान से अनुभूत बातें ही साझा करते हैं तथा अपने विचारों पर अडिग रहते हैं. यह श्रेष्ठ दीर्घकालिक योजनाएं बनाते हैं और उन पर अमल भी करते हैंतथा आलोचना के उपरांत भी अपनी योजना के कार्यान्वयन में लगे रहते हैं और लंबे संघर्ष के बाद सफल होने पर विजय का उत्सव भी मनाते हैं.

              जिन लोगों को ये चाहते हैं उनके प्रति सदैव ही निष्कपट होते हैं. सत्य और ईमानदारी सदैव आपकी सफलता का मूलमंत्र होता हैतथा  आपके द्वारा की गई  आलोचना सच्ची होती है और सच्ची आलोचना करने से आप घबराते नहींहैं . धैर्य, त्याग और स्वीकार्यता क्या है यह उदाहरण आप लोगों के समक्ष प्रस्तुत करते हैं.
         
          किसी न किसी प्रकार की कला से इन्हें विशेष प्रेम होता है. धनोपार्जन से यह कभी भी सकुचाते  नहीं है और इनकी दृढ मान्यता होती है कि "जल्दी का काम शैतान का". क्रोधित होने पर कई बारी है प्रचंड रूप धारण कर लेते हैं तथा भयंकर भी हो जाते हैं अतः इन लोगों को अपने इस स्वभाव पर नियंत्रण करना सीखना चाहिए.इन लोगों में ऊर्जा की सदैव प्रचुरता होती है. ये लोग शारीरिक असमर्थता को स्वीकार नहीं कर सकते और रोगों को प्रकट किए बिना लंबे समय तक साधारण जीवन यापन करते रहते हैं. इनकी आरोग्य शक्तियां संतुष्टि जनक नहीं होती अतः रोग होने पर लंबे समय के बाद ही रोग मुक्ति संभव हो पाती है.
                                                            Related image
                वृषभ राशि कंठ को सूचित करती है शुभ प्रभाव होने पर ये लोग गायक हो सकते हैं तथा अशुभ प्रभाव होने पर कंठ से जुड़ी समस्याओं का समस्याओं का शिकार भी हो सकते हैं. भचक्र की द्वितीय राशि वृषभ को कोषागार की राशि कहा गया है अतः इन लोगों में धन को इकट्ठा करने की प्रवृत्ति पाई जाती है चाहे वह रकम छोटी हो या बड़ी इन लोगों के द्वारा संचित अवश्य की जाती है तथा खर्च होने की स्थिति आने पर भी यह उस धन का कुछ अंश सदैव बचा कर रखते हैं क्योंकि यह आर्थिक संकटों का सामना नहीं करना चाहते अतः कभी भी अनावश्यक खर्च नहीं करते.  विशेष रूप से कहा जाए तो "ये लोग किसी के लिए हानिकारक नहीं होते."

Wednesday, March 7, 2018

ARIES - मेष

       BEHAVIOUR  -   स्वभाव   

      राशि चक्र की प्रथम राशि है जो मंगल की दाहक अग्नि से परिपूर्ण ,निडर और निर्भीक राशि है . इस राशि के जातकों को सामान्य भय से विचलित होता हुआ नहीं देखा जा सकता चाहे वे उम्र में छोटे ही क्यूं न हों . चर राशि होने के कारण और मंगल की असीमित उर्जा से भरे इन बालकों को आसानी से पहचाना जा सकता है कि ये है मेष का बालक जो चुपचाप नहीं बैठ पा रहा और यदि किसी कारण वश उसे एक जगह बैठना पड़ भी जाए तो  उनकी आँखें और मष्तिष्क में घुमड़ते सवाल हर नयी जगह का पूरी तरह निरीक्षण अवश्य करते हैं . मोहल्ले में जब कोई आयोजन हो तो बच्चों की फ़ौज में उनका नेतृत्व करने वाला , इस खम्भे से उस खम्भे तक दौड़ का आयोजन करने वाला नेता मेष के अलावा और कौन हो सकता है भला . डर का तो जैसे शब्द इनके शब्दकोष में होता ही नहीं है , यदि कोई इन्हें डांट रहा है तो उसे भी ये अहसास हो ही जाता है कि ये बच्चा डरता तो नहीं है बस सुन रहा है क्योंकि इसे पता है कि अभी ये कुछ कर नहीं सकता और अपनी भाव भंगिमाओं से इस बात का अहसास भी ये बालक करवा ही देते हैं ."बुखार थोड़ा ठीक होते ही गली में खेलने चला गया"- ये महाशय मेष के ही हैं , ऊर्जा रुकने नहीं देती इनको फिर बुखार की क्या औकात .
                         
                               ये व्यक्ति सदैव ही महत्वाकांक्षी होते हैं और इसे पूरा करने के लिए कर्म में कोई कमी नहीं रखते . निष्ठापूर्वक अपने कर्म में संलग्न रहते हैं . मेष लग्न के पीड़ित होने पर इनका विवेक काम नहीं करता और ये झगडालू प्रवृत्ति के हो जाते हैं तथा सदैव ही "आओ और हमसे लड़ो" की कोशिश में लगे रहते हैं या यूं कहें तो मंगल की ऊर्जा का दुरूपयोग होने लगता है और लोग इन्हें देखकर अपना रास्ता बदलना शुरू कर देते हैं कि कौन सर खपाए अपने पास तो इतनी ताक़त नहीं हैं . इनके लक्ष्य कभी भी छोटे नहीं होते और बड़े लक्ष्य की प्राप्ति का ये पुरजोर प्रयास भी करते हैं . इनके मन में सदैव सबसे आगे रहने की इच्छा बनी रहती है . किसी और के द्वारा दी गयी सलाह को नहीं मानते और यदि मानते भी हैं तो काफी सोचने के बाद जब और कोई रास्ता नहीं बचता तब .अपने मतानुसार कार्य करना ही पसंद  करते हैं , किसी और का टांग अड़ाना इन्हें पसंद नहीं होता है .

              जो वस्तु,स्थिति इन्हें पसंद नहीं होती ये उसके स्वयं बदलने का इंतज़ार नहीं करते बल्कि उसे तुरंत ही हटा देते हैं. धैर्य से बैठकर प्रतीक्षा करने की बजाय आगे बढ़कर अवसर को प्राप्त कर लेना ही उचित समझते हैं .कार्य को  जल्दी से जल्दी पूरा करने की मनोवृत्ति होती है जिसके कारण कई जगह इनको नुकसान भी होता है .
मेष राशि के पीड़ित होने पर इनके क्रोध को धधकने में देर नहीं लगती . अकस्मात् होने वाली घटनाओं से निपटने में मेष वाले सर्वाधिक् उपयुक्त होते हैं .

       एक कार्य को पूरा किये बिना दुसरे कार्य को शुरू कर लेना इनकी प्रवृत्ति होती है , जिसके पीछे इनका सभी कार्यों को एक साथ पूरा कर लेने का आत्मविश्वास छुपा होता है , जो कई बार नुकसानप्रद सिद्ध होता है .मेष राशि के पीड़ित होने पर हर मनोभाव अपने चरम पर पहुँच कर अपनी आगामी स्थिति को प्राप्त कर लेता है जैसे उत्साह उन्माद में परिवर्तित हो जाता है और साहस प्रमत्ता में. यदि किसी मनोभाव के लिए "प्रचंड" शब्द का प्रयोग किया जाए तो वह मेष के जातक ही होंगे . व्यक्ति के अन्दर का "मैं " भी मेष है , इनके अन्दर मैं का प्रबल भाव होता है . जल्दबाजी में कभी - कभार ये मूर्खतापूर्ण फैसले ले लिया करते हैं जिनके कारण इन्हें बाद में पछताना पड़ता है.

             बीमार नहीं रह सकते ये , इन्हें जल्दी से ठीक होना होता है. अन्दर छटपटाहट मची रहती हैं ठीक होने की , आंतरिक ऊर्जा एक जगह रुकने नहीं देती और रोगी को आराम करना होता है . ये स्थिति इन्हें शारीरिक से  अधिक मानसिक रूप से बेचैन कर देती है .

        काम , क्रोध और लड़ना ये गुण प्रधान होते हैं . यदि मेष राशि पीड़ित न हो तो इनका सकारात्मक परिणाम प्राप्त होता है जो गृहस्थ जीवन में पूर्णता , गलत के विरुद्ध क्रोध और संघर्ष को बताता है जबकि मेष राशि पीड़ित हो तो इन तीनों मनोभावों का विकृतीकरण हो जाता हैं काम के पूर्ण न होने पर क्रोध की उत्पत्ति तथा क्रोध से लड़ाई का ये सिलसिला अनवरत जारी रहता है जब तक कि मेष की ऊर्जा क्षीण नहीं हो जाती .



अगले लेख में मेष राशि के बारे में अन्य जानकारियों के साथ उपस्थित होता हूँ.
आपका -  ज्योतिष विद्यार्थी
               श्री राम बिस्सा

          

Tuesday, February 27, 2018

READERS OF ASTROLOGY

                           एक लम्बे अरसे तक ज्योतिष पर लेखनी ने विराम रखा ,पर मष्तिष्क ने विचारों के क्षीर सागर में गहरे पैठना कहाँ छोड़ा था . ज्योतिष अध्ययन और परीक्षण  के साथ ही साथ ज्योतिष पर लेखन को लेकर कुछ विचार दिमाग में आवागमन करते रहे और इस आवागमन की छूट हमने भी दे ही रखी थी ताकि अनुकूल विचारों को एकत्रित किया जा सके.

    विचार कुछ यूं थे कि ज्योतिष जैसे गंभीर विषय पर जब हज़ारों वर्षों से काफी कुछ लिखा जा चुका है और आज भी यह कार्य अनवरत है फिर मेरे द्वारा जो लिखा जा रहा है वास्तव में इन लेखों का  पाठक कौन हैं और वो इनसे  किस प्रकार प्रभावित होता हैं . मेरे द्वारा लिखे गए लेख उनके लिए किस प्रकार उपयोगी सिद्ध हो सकते हैं .
            सबसे महत्वपूर्ण बात तो  यह है  कि प्रत्येक श्रेणी के पाठकों के लिए ऐसा कुछ लिखा जा सके जो उनके लिए उपयोगी हो . इस मसले पर सबसे अहम तो ये हो गया कि सर्वप्रथम  पाठकों को विभिन्न श्रेणियों में रखकर ये समझा जाए कि किस श्रेणी के लोगों को किस प्रकार के लेख उपयोगी सिद्ध हो सकते हैं और इसी क्रम में मैंने ज्योतिष लेखों के जिज्ञासु पाठकों का एक संक्षिप्त वर्गीकरण करने का प्रयास किया  है :-

1.      प्रथम प्रकार में वे लोग आते हैं जो ज्योतिष  के अच्छे जानकार  होने के साथ ही साथ व्यावसायिक रूप से ज्योतिष का काम  करते हैं  तथा ज्योतिष,ज्योतिषी.ज्योतिर्विद,ज्योतिषाचार्य,ज्योतिष शास्त्री   दैवज्ञ,ASTROLOGER,ASTROLOGY CONSULTANT  जैसे विशेषण इनके साथ जुड़े होते हैं . ऐसे लोगों के लिए किसी विषय विशेष पर किया गया गहन विश्लेष्णात्मक लेख ही विशिष्ट प्रयोजन का हो सकता है क्योंकि सामान्य नियमों व सिद्धांतों की इनको भली भांति जानकारी होती है और अनुभव भी .

2.     द्वितीय प्रकार में वे पाठक आते हैं जिन्होंने ज्योतिष को सीखने व इस विषय में पारंगत होने के लिए इसका अध्ययन प्रारम्भ किया है पर वे अभी अपने शुरूआती दौर में हैं तो उनके लिए ज्योतिष के आधारभूत सिद्धांतों से लेकर कई महत्वपूर्ण नियमों से सुसज्जित लेख ,जिसमें उदाहरण भी सम्मिलित हों काम के होंगे .

3.    तृतीय प्रकार के पाठक वे हैं जो ज्योतिष सीखना नहीं चाहते बस इस विषय में उनकी रूचि है और इसे पढने में उन्हें आनंद की अनुभूति होती है तो इनके लिए छोटी छोटी बातें जो ज्योतिष में काफी महत्व रखती हैं और अन्य सभी प्रकार के लेख जिन्हें ये समझ सकते हैं इनके लिए महत्वपूर्ण हैं .

4.  चतुर्थ श्रेणी में वे पाठक हैं जो इन्टरनेट पर अपनी समस्या का ज्योतिषीय उपचार खोजते हैं और विभिन्न लेखों को पढ़कर उनमे बताये अनुसार उपचार प्रारंभ कर देते हैं इन्हें ज्योतिष की TERMINOLOGY से कोई मतलब नहीं होता इन्हें बस पता होता है कि इनकी राशि क्या है और उनको शनि की साढे- साती  चल रही है या काल सर्प दोष है जो इन्हें कोई भी ज्योतिष पढने वाला या अखबार से पता लग जाता है और ये नेट पर पढ़कर उपचार करने में जुट जाते हैं कि कुछ अच्छा होगा . ऐसे पाठकों के लिए ऐसे लेखों की आवश्यकता है कि ज्योतिष जैसे गूढ़ विषय को इतने हलके में न लिया जाए और ज्योतिषीय उपचार अपना अलग  महत्त्व रखते हैं सो उन्हें ऐसे ही एकांगी लेख को पढ़कर प्रयोग में न लाया जाए बल्कि किसी विद्वान् ज्योतिषी की सलाह लेने के पश्चात ही किया जाए  .

5.  इन चार प्रकार के पाठकों के अतिरिक्त  भी एक और प्रकार है पाठकों का जो ज्योतिष के लेख इसलिए पढ़ता  हैं कि कहीं भी यदि ज्योतिष से सम्बंधित कुछ बातचीत हो तो वो भी कुछ कह सकें या अपना पक्ष रख सकें.


                    संभव हैं पाठकों के प्रकार और भी हों पर मैंने अपनी समझ व अनुभव के अनुसार ज्योतिष विषय के लेखों को पढने वाले लोगों का वर्गीकरण किया है . इस वर्गीकरण का मूल उद्देश्य यह है कि प्रत्येक श्रेणी के पाठकों को ध्यान में रखते हुए उनके लिए कुछ महत्वपूर्ण लिखा जा सके.सभी पाठकों से एक निवेदन है कि  ज्योतिषीय उपचारों के लिए किसी योग्य ज्योतिर्विद की सलाह अवश्य लें और किसी योग के बारे में बुरा पढ़कर चिंतित न हों क्योंकि ज्योतिष एक बहुआयामी विषय है एक अनुभवी ज्योतिषी ही भली- भाँति आकलन कर सकता है कि कोई योग अच्छा है या बुरा अतः पढने तक ठीक है परन्तु किसी निर्णय पर पहुँचने से पहले विषय के विशेषज्ञ से सलाह अवश्य लें .

     इन्हीं पाठकों के विभिन्न प्रकारों को ध्यान में रखते हुए ज्योतिषीय लेखों की एक श्रृंखला शुरू करने का मानस बना है तो शीघ्र ही एक ज्योतिष विषयक लेख के साथ मिलता हूँ .


निरंतरता बनाये रखने का प्रयत्न करूंगा .
श्रद्धावनत
आपका
ज्योतिष विद्यार्थी  श्रीराम बिस्सा





Saturday, February 24, 2018

TRIANGLE IN ASTROLOGY

ज्योतिष में त्रिकोण का बहुत अधिक महत्त्व है . भुजाओं से यदि किसी बंद आकृति का निर्माण करना है तो सबसे छोटी आकृति एक त्रिकोण ही हो सकती है और यही सिद्धांत ज्योतिष के फलित खंड पर भी लागू होता है .कोई भी एक भाव स्वयं अकेले ही किसी परिणाम को देने में समर्थ नहीं होता है उसे कम से कम दो और भावों की आवश्यकता होती है जिनके सहारे वह अपना त्रिकोण पूरा करे और परिणाम जातक को प्राप्त हो , इसी सिद्धांत का प्रयोग प्रो.के.एस.कृष्णमूर्ति ने अपनी तारकीय ज्योतिष पद्धति में किया है , उनहोंने हर घटना के लिए एक मुख्य भाव और दो या दो से अधिक सहायक भाव भी लिए हैं , जी हाँ त्रिकोण के अलावा बन्ने वाली चतुश्कोनीय आकृति भी फल प्रदान करने में सक्षम है . त्रिकोण तो कम से कम होना ही चाहिए .


जैसे
अल्पायु :- लग्न,द्वितीय,सप्तम और मारक स्थान .
लम्बी आयु :- १,३,5,8,१० .
प्रसिद्ध :- १,१०,३,११.
अत्याधिक धन सम्पदा :- 2,6,१०,११.
लाभ:- 2,6,१०.
यात्रा :-३,12,१.
समझौता :-३,१,९.
ऐसे बहुत से समूह हैं जिनका प्रयोग किया जा सकता है , धीरे - धीरे उदाहरणों से समझने का प्रयत्न करेंगे .

SATURN AND VENUS

शनि और शुक्र
यदि इन दोनों ग्रहों में से एक ग्रह भी उच्च राशि में स्थित हो, तो जब शनि की महादशा में शुक्र की अन्तर्दशा या शुक्र की महादशा में शनि की अन्तर्दशा आती है तो वह उस जातक के लिए बड़ा ही संघर्षपूर्ण होता है .
जब इस नियम की जांच करनी शुरू की तो तीन ऐसे लोगों से मुलाकात हुई जिनकी जन्मपत्रिका में इन दोनों में से एक ग्रह उच्च राशि में स्थित है और वो इस दशा से भी गुजर चुके हैं ,उनसे पूछने पर उनहोंने अपने उस समयावधि के बारे में जो बताया उसे बिन्दुवार लिख रहा हूँ .
१. प्रथम जातक जिसकी जन्मपत्रिका में कन्या लग्न है तथा शुक्र अपनी उच्च राशि में स्थित है , ४५ वर्ष की उम्र हो चुकी है अब तक विवाह नहीं हुआ है . इस जातक को शनि में शुक्र की अन्तर्दशा के दौरान अपने घर से निकाल दिया गया तथा इसे अपने दोस्तों के घर, होटल तथा धर्मशालाओं में रहकर इस समय को व्यतीत करना पडा तथा धनाभाव निरंतर बना रहा . इस दशा के समाप्त होने के बाद यह पुनः अपने परिवार के साथ रहने लगा है .
२. द्वितीय जातक भी कन्या लग्न का है जिसका शनि अपनी उच्च राशि तुला में स्थित है यह जातक अपने ननिहाल में रहता था लेकिन शुक्र मैं शनि की अन्तर्दशा के समय इसे ननिहाल से वापस भेज दिया गया तथा अपने पिता का मकान बहुत छोटा होने के कारण मंदिर के एक कमरे में इस समय को व्यतीत करना पड़ा तथा धनाभाव भी निरंतर बना रहा .
३. तृतीय जातक एक विधायक है जिसे लम्बे समय की चुनावी जीत के पश्चात इस दशा समय में चुनावी हार का सामना करना पडा अर्थात विधानसभा से बाहर रहना पडा . धनाभाव तो नहीं रहा लेकिन शक्ति और अधिकार का अभाव बना रहा .
और भी कुछ जातक है जिनके शनि या शुक्र उच्च राशि में स्थित है लेकिन अभी यह दशा क्रम आना बाकी है .
इस नियम का सही होना इतना सामान्य नहीं है , यह वास्तव में बहुत ही महत्वपूर्ण है क्योंकि यह घटना विंशोत्तरी दशा क्रम की सटीकता को भी प्रतिपादित करती है .
इसका विपरीत योग भी बिलकुल सटीक है जिसके बारे फिर कभी चर्चा करूंगा .

RAHU - THE NODE POINT

राहु
एक ग्रह के कई कारकत्व होते हैं और प्रत्येक कारकत्व के आधार पर उसके अलग अलग प्रभाव भी होते हैं इसी के आधार पर आज राहु ग्रह की बात करते हैं -
-राहु अव्यवस्था का प्रतीक है या ऐसा भी कह सकते हैं कि किसी व्यवस्था में विघ्न उत्पन्न करना भी राहु का ही काम है.
-नाड़ी ज्योतिष के अनुसार गुफा (CAVE) पर भी राहु का आधिपत्य है या ऐसा कहें की गुफा के समान संरचना पर भी राहु का ही अधिकार है.
राहु की स्थिति यदि लग्न में हो फिर चाहे लग्न में कोई भी राशि स्थित हो ,तो ऐसा राहु दांतों में किसी न किसी प्रकार की अव्यवस्था उत्पन्न करता है , जैसे -
- दांत पर दांत चढ़ा होना .
- किसी दांत का आधा टूटा होना .
-दांतों पर लाल या काले रंग की परत का जमा होना .
- स्कर्वी रोग हो जाना .
- कीड़े पड़ने से दांतों का खोखला हो जाना इत्यादि .
कई बार ये स्थितियां जन्म से ही उपस्थित होती है जबकि कई बार ये प्रकृतिजन्य होती है , जैसे
-छोटी उम्र में गिरने पर दांत टूट जाना या दांत पर दांत का चढ़ जाना .
- चॉकलेट खाने से दांतों में कीड़े पड़ जाना .
- कई बार दांत की निरंतर सफाई न करने से भी दांतों पर कुछ दाग हमेशा के लिए जम जाते है तथा बदबू आती है .
जिन लोगों का अनुभव मैंने प्राप्त किया है उनमे से :- एक व्यक्ति जिसका मकर लग्न है तथा लग्न में शनि राहु स्थित है, के दांत की श्रृंखला टेढ़ी - मेढ़ी ( ZIG-ZAG ) है ,जिसके कारण पिछले दांतों की सफाई ठीक तरह से नहीं हो पाती और उन पर जमे हुए काले रंग की परत को आसानी से देखा जा सकता है .
दूसरी कुंडली में लग्न में केवल राहु ही स्थित है और जब मैंने पूछा कि दांतों में क्या रोग है तो बताया गया की स्कर्वी है .
अन्य अनुभवों के आधार पर कहा जा सकता है कि लग्न में स्थित राहु दन्तावली में किसी न किसी प्रकार की समस्या देता है .
अब यह समस्या किस लग्न के राहु में किस प्रकार की होगी तथा युति व दृष्टि से किस प्रकार प्रभावित होगी यह निरंतर अनुभव व शोध का विषय है .
ऐसा नहीं है कि लग्न के राहु का यही एक फल है ,अन्य फल भी होते हैं ,उनमें से यह भी एक है .


अन्य ज्योतिर्विदों के अनुभवों की अपेक्षा में आपका
श्रीराम

Who gives the results : Planets Or ........ (आखिर फल कौन देता है )

       अक्सर जब साधारण जन मानस के बीच ज्योतिष की चर्चा देखने व सुनने का अवसर मिलता है तो हमेशा कुछ बातें उनके बीच सामान्य होती हैं जैसे कि यदि किसी को शनि की दशा चल रही है तो संवादों के बीच सशक्त रूप से सुनने को मिलता है , कि "शनि चल रहा है तब तो तेरा समय खराब है ,तू तो शनि के मंदिर जाया कर और ये दान किया कर वरना बहुत मुश्किल हो जायेगी !" और दुसरी ओर  जब पता चलता है , कि किसीको गुरू की दशा चल रही है , तो कहा जाता है , कि "तेरे तो अभी मौज है , गुरू तो बहुत अच्छा ग्रह है तुझे पूरी तरह सेट कर देगा -फलां फलां ". तो क्या जिस जिस व्यक्ति को शनि की दशा चलेगी वह समस्याओं से जूझता ही रहेगा और गुरू की दशा वाला व्यक्ति आनंद करेगा ? क्या शनि कभी किसी का कुछ अच्छा नहीं कर सकता ? आइये कुछ चर्चा हो जाये इस बात पर ! 
जितना अपने अल्पकालीन विद्यार्थी जीवन में सीखा है उस आधार पर स्पष्ट करने का प्रयास करता हूँ  
        सर्वप्रथम तो ये बात जानना बहुत आवश्यक है , कि फल  देता कौन है ! हालाँकि ये बात थोड़ी दार्शनिक लग सकती है लेकिन सत्य है , कि फल हमारा कर्म ही देता है और वही दे सकता है, ग्रहों में ये शक्ति नहीं कि हमें फल प्रदान करें वे तो कर्म फलों के संचरण का माध्यम मात्र हैं ! गहन विचार करने पर मन में यही प्रस्फुटित होता है , कि जब मनुष्य पैदा होता है , तो उस मनुष्य को उसके जीवन काल में जो कुछ भी मिलना होता है ईश्वर वह सब कुछ उसके साथ एक बड़े होटल में भेज देता है ! इस होटल  में बारह कमरे होते हैं जिनमें वो सामान रखा होता है जो उसे इस जीवन काल में काम लेना होता है ! इन्हीं कमरों में कुछ खाली स्थान भी होता है जहाँ वह व्यक्ति इस जीवन काल में कुछ कमाकर वहाँ रख सकता है ,लेकिन ये स्थान सीमित होता है ! इन सामानों को उस व्यक्ति तक पहुँचाने वाले नौ कर्मचारी  उस होटल में काम करते हैं जो अपने अपने कार्य समय के हिसाब से अपने अपने कमरों से सामान उस व्यक्ति तक पहुंचाते रहते हैं !  
         अब मान लीजिए की उस व्यक्ति ने किसी डिश का आर्डर किया और वो डिश किसी कमरे में है ही नहीं तो उसे कैसे मिल सकती है ! हाँ वो खुद कमा  सकता है लेकिन यदि उसने अपने होटल के कमरों के खाली स्थान को पूर्णतया भर दिया है तो फिर कोई उपाय नहीं है ! फिर एक बात समझ में नहीं आई की ग्रहों ने क्या दिया ! ग्रह तो केवल सप्लाई का काम करते हैं , तो फिर शनि खराब कैसे और गुरू अच्छा कैसे ! अब यदि शनि के कमरे में केवल अच्छा सामान ही रखा होगा तो अपने कार्यसमय में वह केवल अच्छा ही दे पाएगा बुरा नहीं और गुरू के कमरे मैं सबकुछ खराब रखा  है तो वह अच्छा कैसे देगा सोचें , हाँ परोसने का ढंग उनका अपना अपना हो सकता है लेकिन परोसेंगे तो वही जो पीछे से मिलेगा ! यही वो बात जिसे समझने का प्रयत्न मेरे जैसे और भी नए ज्योतिष विद्यार्थियों को करना  चाहिए ताकि अच्छे बुरे का दोष ग्रहों के सर न मढा  जाऐ  और व्यक्ति स्वयं इसके लिए जिम्मेदार रहे , कि मिल तो वही रहा है जो मैंने जमा किया है ग्रह तो केवल माध्यम है !इस विषय पर चर्चा आगे भी जारी रहेगी ............



गृह लक्ष्मी

घर और मकान में अंतर है - मकान ईंट और सीमेंट से बनता है जबकि घर सदस्यों और उनके प्रेम से . किसी भी घर में प्रेम,सौहार्द और शांति बनाए रखने और सब कुछ कुशल मंगल रखने में स्त्रियों का महत्वपूर्ण योगदान होता है . ज्योतिषीय दृष्टिकोण से घर के माहौल पर स्त्रियों का क्या प्रभाव होता है ,यहाँ बात करते हैं :- 
             ज्योतिष के अनुसार मन की शांति और आत्मिक प्रेम के लिए जो  ग्रह  जिम्मेदार होते हैं :-

१ . चन्द्रमा :- मन ( चन्द्रमा मनसो  जातः )
२ . शुक्र :- आत्मिक प्रेम ( नेमिचंद्र शास्त्री: भारतीय ज्योतिष  )

                      ज्योतिष के अनुसार ये दोनों ही ग्रह स्त्रियों पर अपना आधिपत्य रखते है . चन्द्रमा माता का कारक होता है और शुक्र पत्नी का !
               अतः जिस प्रकार मन की शांति  और आत्मिक प्रेम के लिए चन्द्रमा और शुक्र का अच्छी स्थिति में होना आवश्यक है ,उसी प्रकार घर के शांतिमय माहौल के लिए घर के शुक्र ( पत्नी ) और घर के चन्द्रमा ( माता ) का अच्छी स्थिति में होना आवश्यक है !
           यहाँ कुछ बातों के बारे में जिक्र करना चाहूँगा जिनके अनुसरण के द्वारा स्त्रियाँ अपने घर की आत्मा में नयी उमंग फूंक सकती है :-

१ . सुबह सबसे पहले उठें और सर्वप्रथम कार्य हो , कि आप नित्य कर्म से निवृत्त हो स्नान करें .
२ . घर की सफाई के बाद देहली पूजन अवश्य करें .
३ . सुबह एक बार धुप जलाकर पूरे घर में आरती करें .
४ . आवाज़ में हमेशा सौम्यता रखें .
              सबसे महत्वपूर्ण बात कि यदि चद्र और शुक्र का शुभ संयोग हो तो जीवन में चार चाँद लग जाते हैं , उसी प्रकार यदि घर में भी इन दोनों का शुभ  संयोग हो तो घर के सभी सदस्यों के जीवन में चार चाँद लग जाते हैं . अब यदि मन प्रसन्न हो और आत्मा में प्रेम हो तो जीवन की कल्पना सहज ही की जा सकती है !
                 सुखमय जीवन की शुभकामनाओं के साथ आंशिक विराम लेता हूँ ...... शुभम .



Saturday, August 22, 2015

कर्म और भाग्य - ३

         समझ और नासमझी का अंतर समझें या समझ समझ कर नासमझी की जिद -
                        एक प्रश्न जो हमेशा से ज्योतिष का ज्ञान रखने वाले लोगों के लिए भी उतना ही महत्वपूर्ण और पेचीदा रहा है , जितना कि सामान्य जन मानस के लिए . और वह प्रश्न है कि जीवन में कर्म अधिक महत्वपूर्ण है या भाग्य ...............
   
                 
                                     एक बार इसी ब्लॉग पर यह क्रम शुरू किया था पर किन्हीं कारणों से पूरा नहीं लिख पाया था देखें -कर्म और भाग्य - १ तथा कर्म और भाग्य - २   इन लेखों में रामचरितमानस महाभारत और रामायण के उदाहरणों से इस विषय को समझना शुरू किया था पर पूर्ण नहीं कर पाए थे . अब इस विषय पर एक और प्रयास कर रहा हूँ और इसी क्रम सबसे पहले सामान्यजन और ज्योतिष ज्ञानार्जन करने वालों से आग्रह है की वे अपने विचारों से अवगत कराएं ताकि सभी को इस विषय में भागीदारी करने का मौका मिले .............

Thursday, October 4, 2012

धार्मिक कर्म में मौलि बंधन क्यों ?

       किसी भी शुभ कार्य से पहले जैसे कोई पूजा -  अनुष्ठान , गृह प्रवेश ,दीपावली की पूजा  या अन्य कोई भी पूजन सर्वप्रथम पंडित जी यजमान (यज्ञमान) को तिलक करते हैं और मौली बंधते हैं फिर पूजा आरम्भ होती है ! मौली बंधते वक़्त इस  मंत्र का उच्चारण  जाता है:-


        येन  बद्धो बलीराजा दावेंद्रो महाबलः !
            तेन त्वामनुबध्नामि रक्षे  माचल माचल !! 


       ये प्रथा कब शुरू हुई और इसके महत्त्व के विषय में अनेक आख्यान शास्त्रों में मौजूद हैं !मौली बंधने की परंपरा तब से चली आ रही है, जब से महान , दानवीरों में अग्रणी महाराज बलि की अमरता के लिए वामन भगवान् ने उनकी कलाई पर रक्षा सूत्र बांधा था !

            इसे रक्षा  कवच के रूप में भी  शरीर पर बांधा जाता है !इन्द्र जब वृत्रासुर से युद्ध करने जा रहे थे तब इंद्राणी शची ने इन्द्र की दाहिनी भुजा पर रक्षा-कवच के रूप में मौली को बाँध दिया था और इन्द्र इस युद्ध में विजयी हुए ! 

      स्वास्थ्य के अनुसार मौली-बंधन से वात पित्त और कफ तीनों का शरीर में संतुलन बना रहता है और शरीर नीरोग रहता है !साधारणतया हम देखते हैं,कि यदि कोई कर्मकांडी पुरोहित जो कई दिनों तक चलने वाले अनुष्ठान में  हैं और दुर्भाग्यवश उनके कुटुंब में किसी निकट संबंधी की मृत्यु हो जाती है तो भी उनको "सूतक"का दोष नहीं लगता है और वो अपना अनुष्ठान निर्विघ्न पूरा कर सकते हैं,क्योंकि क्योंकि उनहोंने पूजन आरम्भ होने पर बंधी जाने वाली मौली बाँध  रखी है!यानी की मौली के प्रभाव से उस बड़े अनुष्ठान पर बाधा ताल जाती है ! 





    

Saturday, June 16, 2012

एक अनोखा विचार

                                  एक अनोखा विचार 

जिस प्रकार से ब्रह्माण्ड का केंद्र जगन्नियन्ता सर्वशक्तिमान ईश्वर को मन जाता है और उसके बिना   इस सम्पूर्ण  का अस्तित्व मात्र भी संभव नहीं है !जिस प्रकार हमारे सौरमंडल का केंद्र सूर्य है!सूर्य ही है जो सभी ग्रहों,उपग्रहों और अन्य पिंडों को एक निश्चित नियम में बांधकर उन्हें घूर्णन के लिए सामर्थ्य प्रदान करता है,और उनके अस्तितत्व को बनाये रखता है !सूर्य के बिना सौरमंडल की कल्पना भी नहीं की जा सकती है और यदि वर्तमान सौरमंडल में से सूर्य को हटाकर सौरमंडल की कल्पना करें तो सबकुछ बिखरा हुआ और तहस - नहस ही नज़र आएगा !उसी प्रकार इस केन्द्रत्व के नियम का सभी जगह पालन होता है !उदहारण स्वरुप जिस प्रकार चंद्र का केंद्र पृथ्वी है और पृथ्वी का केंद्र सूर्य ! सूर्य का केंद्र है आकाश गंगा !आकाश गंगा का केंद्र है ब्रह्माण्ड पालक परमब्रह्म !उसी प्रकार से घर-परिवार में, समाज में,राज्य में ,राष्ट्र में और विश्व में इसी प्रकार के एक प्रभावशाली केंद्र की आवश्यकता है जो सूर्य के सामान तेजस्वी हो और दूसरों को जीवनी शक्ति प्रदान करने का सामर्थ्य रखता हो ,जो पृथ्वी के सामान धैर्यवान हो ,जो आकाश गंगा के सामान विस्तार्युक्त हो और जो परमपिता के समान विशाल हृदय हो !जब तक केन्द्रत्व का ये समायोजन ठीक प्रकार से नहीं होगा तब तक ये अस्थिरता चलती ही रहेगी !उदहारण देखें जिस प्रकार परिवार का केंद्र होता है परिवार का मुखिया या पिताजी !यदि दुर्भाग्यवश वे न हों या उनका प्रभाव घर पर सूर्य के सामान न हो तो घर के सभी ग्रह अर्थात सदस्य किसी नियम में बंधे नहीं रह सकते हैं वे इधर - उधर बिखर जाते हैं औए स्वरचित नियम पालन करते हैं,समाज में कोई शीर्ष नेता न हो या कमजोर हो तो समाज वक्त के साथ नहीं चल पाता है इसीलिये "यत्पिंडे तत्ब्रह्मांडे"नियम के अनुसार इन सभी स्थानों पर इन केन्द्रधिपतियों का होना अत्यंत आवश्यक है !


                                                                                                                              -श्रीराम बिस्सा 

Wednesday, October 5, 2011

नक्षत्र:भरणी


नक्षत्र:भरणी

                                                                  2.भरणी
भरणी नक्षत्र का वैदिक नाम अपभरणी है!
भरणी नक्षत्र में तीन तारे होते हैं,जो स्त्री योनि के आकार में आकाश में अवस्थित होते हैं!इस नक्षत्र का स्वामित्व यम देवता के पास होता है!नौ ग्रहों में से शुक्र भरणी नक्षत्र का अधिपति है!यह उग्रसंज्ञक नक्षत्र है अतः उग्र कार्य जैसे तंत्र प्रयोग,मुक़दमा करना,शत्रुपर आक्रमण,चालाकी के कार्य इसमें अनुकूल होते हैं!अधोमुख नक्षत्र होने के कारण अधोगमन वाले कार्य जैसे कुआं खोदना,UNDERGROUND बनाना,बोरिंग कराना,सुरंग बनाना इत्यादि नीचे की ओर गतिशील कार्य किये जा सकते हैं!भाद्रपद मास में भरणी नक्षत्र वाले दिन कोई भी कार्य नहीं करना चाहिए क्योंकि यह प्रभावशून्य होता है!भरणी नक्षत्र अमृतसिद्धि और सर्वार्थसिद्धि योग का निर्माण नहीं करता है!भरणी नक्षत्र के लिए केले व आंवले की पूजा की जानी चाहिए!भरणी चांडाल जाति का नक्षत्र है!भरणी नक्षत्र स्त्री संज्ञक और वशिष्ठ गोत्र का होता है!इस नक्षत्र की योनि गज,नाड़ी मध्य और गण मनुष्य होता है!यह कालपुरुष के माथे(ललाट) का अधिपति होता है!प्रमष्तिष्क गोलार्ध और आँखों पर इस नक्षत्र का ही आधिपत्य है!
कारकत्व:-रक्त व मांस से सम्बंधित लोग जैसे कि रक्त का परीक्षण करने वाले मांस का व्यापार करने वाले,हिंसक प्राणी,कसाई,आतंकवादी,भूसे वाले सभी अनाज,नीच स्वभाव और नीच कुल के लोग,तांत्रिक और मृत शरीरों पर तंत्र साधना करने वाले तांत्रिक,जहर,शस्त्र,अस्त्र,कोर्ट व युद्ध भी इसी नक्षत्र से सम्बंधित है!
नक्षत्रफल:-दृढ़ निश्चय वाले सत्यवादी और सुखी,जिस काम को करने की सोच ले उसे करके ही छोड़ते हैं!TIME MANAGEMENT बहुत अच्छा होता है!खाना कम खाते हैं!व्यक्तित्व आकर्षक होता है!मनोविनोद में इनका मन अधिक लगता है!शराब और स्त्री दोनों का पूर्ण लाभ लेना चाहते हैं!
पदार्थ:-भूसी वाले अनाज,ज्वारबाजरा,रंग,जहर व जहरीले पदार्थ,विभिन्न रसायन इत्यादि !
व्यक्ति:-BLOOD BANK के कर्मचारी,स्वार्थी लोग,अत्यधिक धूम्रपान करने वाले,शराब के शौक़ीन,रसिक मिजाज वाले,साधारणतया रोगों से मुक्त रहने वाला!
भरणी नक्षत्र का वैदिक मंत्र:-यमाय त्वान्गिरस्यते पित्रीमते स्वाहा स्वाहा धर्माय स्वाहा धर्मपित्रे!
बीमारियाँ:-सिर में चोट,आँखों के पास चोट,नशे की लत,कफ रोग इत्यादि!
मानसिक गुण:-खाने का शौक़ीन,क्रूर व्यक्तित्व,अपने से निचले तबके के लोगों के साथ रहने वाला अपने लक्ष्य को सदैव प्राप्त करता है!चतुर व्यक्तित्व का मालिक!इनके जीवन में प्रेम सर्वाधिक महत्वपूर्ण होता है और दिमाग की बजाय दिल से अधिक सोचते है!इनके व्यक्तित्व में सदैव एक कवि  रहता है!
व्यवसाय:-संगीत,खेल-कूद,प्रचारक,चांदी के बर्तनों का काम,शादी करवाने वाले मध्यस्थ,कसाईखाना,होटल,रतिरोग,MATERNITY HOSPITAL,संपत्ति का मूल्यांकन करने वाला!

Thursday, September 15, 2011


ग्रह:सूर्य

                                                                  1.सूर्य

                                             "सूर्य आत्मा जगत्स्तथुषश्च"
 सूर्य ग्रहों में राजा है!इसकी जाति राजक्षत्रिय है!इसका रंग रक्त के समान है!सूर्य के देवता अग्नि है!इसके अधिपति शिव है!सूर्य की दिशा पूर्व दिशा है!यह नैसर्गिक पाप ग्रह ना होकर नैसर्गिक क्रूर ग्रह है!
वैज्ञानिक दृष्टिकोण:-सूर्य वास्तव में एक तारा है,जो हमारे सौरमंडल को बाँधे रखने का कार्य करता है!सूर्य ही सौरमंडल का केंद्र बिंदु है,जिसके चारों ओर ग्रह और उपग्रह घूर्णन करते हैं!इसका कारण है,कि सूर्य से ही सभी पिंडों को जीवनी शक्ति प्राप्त होती है!सूर्य के बिना हमारे सौरमंडल और जीवन की कल्पना भी नहीं की जा सकती!यह पृथ्वी के सबसे नजदीक का तारा है!इसीलिये अन्य तारों की अपेक्षा अधिक चमकदार और बड़ा प्रतीत होता है!सूर्य पर हाइड्रोजन गैस का भण्डार है,जिसकी आपस में संयोजित होने की क्रिया से जो असीमित ऊर्जा विसर्जित होती है उसके अंश मात्र से पृथ्वी पर जीवन है,सभी ग्रहों का वातावरण है!
पौराणिक विवेचन:-पुराणों में आलेख मिलते हैं,कि दक्ष प्रजापति की दो कन्याओं दिति और अदिति का विवाह कश्यप मुनि के साथ हुआ था!अदिति के गर्भ से सूर्य का जन्म हुआ इसीलिये इसे आदित्य कहा जाता है!पौराणिक मान्यताओं के अनुसार सूर्य के रथ में सात घोड़े जुते होते हैं!सूर्य ने संज्ञा और छाया से विवाह किया!छाया से शनि नामक पुत्र उत्पन्न हुआ जो पिता के समान बलशाली है!
पर्यायवाची:-सूर्य को अंग्रेजी में SUN,अरबी मैं आफताब,फारसी में खुरशेद कहते हैं!हिन्दी में इसे आदित्य,अर्क,अर्यमा,अंशुमाली,ग्रहपति,दिनकर,दिवाकर,प्रभाकर,भानु,मार्तंड,रवि,सविता,भास्कर,मिहिर,दिनेश इत्यादि नामों से जाना जाता है!
वैदिक मंत्र:-  आकृष्णेन रजसा वर्त्तमानो निवेशयन्नमृतं मर्त्यन्च !
                      हिरण्ययेन सविता रथेना देवो याति भुवनानि पश्यन !!
तांत्रिक मंत्र:-  ह्राँ ह्रीं ह्रौं सः सूर्याय नमः !!
स्वामित्व:-रवि सौरमंडल की आत्मा है,इसके बिना सौरमंडल का अस्तित्व संभव नहीं है!अर्थात जीवन के लिए जितनी भी आवश्यक वस्तुएं हैं उन सब पर सूर्य का ही अधिकार है!हो सकता है पढ़कर ऐसा प्रतीत हो,कि जीवन के लिए तो वायु,भोजन और जल तीनों ही आवश्यक है,फिर इन सब पर सूर्य का अधिकार कैसे है!सूर्य के कारण ही पृथ्वी के पास वह शक्ति है,कि वायु और जल पृथ्वी की सतह पर उपलब्ध है और हमें भोजन प्रदान करने वाला वनस्पति जगत भी अस्तित्वमान है!रवि की ऊष्मा शरीर को जलाने वाली नहीं बल्कि शरीर के जीवित रहने के लिए जरूरी होती है!अतः आत्मा पर सूर्य का स्वामित्व है!आत्मा लौ के रूप में ऊर्ध्वगामी होकर ह्रदय में अवस्थित होती है अतः ह्रदय पर भी इसी ग्रह का अधिकार है!ह्रदय से जुड़े विभिन्न प्रकार के भाव जैसे क्षमाशीलता,अनुशासन भी सूर्य के ही अधिकार में है!
शारीरिक लक्षण एवं रचना:-इनकी आँखों का रंग धुप के जैसा होता है!अब बात आती है,कि धूप का रंग कैसा है तो गौर से देखने पर पता चलेगा कि धूप का रंग शहद के समान हल्का भूरा होता है!इनके शरीर में भी एक शहद जैसे रंग की एक परत चढी महसूस होती है!इनका चेहरा गोल होता है!यह हृदय का कारक है!पुरुषों में दांयी और स्त्रियों में बाँई आँख पर इसका स्वामित्व होता है!पेट में पाई जाने वाली जठराग्नि पर भी सूर्य का अधिकार है!
चरित्र में निहित विशेषताएं:-निःस्वार्थ प्रेम सूर्य की सबसे बड़ी विशेषता है!यह बिना भेदभाव के सबके लिए समान व्यवहार रखता है!इसकी दूसरी विशेषता है नियमित होना जिस प्रकार सूर्य नियमित होता है उसी प्रकार सूर्य के प्रभाव क्षेत्र में आने वाला व्यक्ति भी नियमित होता है!ईश्वर के प्रति सच्चा प्रेम होता है!ये ताकतवर किन्तु न्यायप्रिय होते हैं!इच्छाशक्ति बहुत ही प्रबल होती है!ये कभी थकते नहीं हैं!इनके व्यक्तित्व में एक विशेष आकर्षण होता है!दूसरों पर शासन करने की कला और ऊर्जा होती है!ईमानदारी इनकी चारित्रिक विशेषता में चार चाँद लगा देती है!
बीमारियाँ:-दिल से सम्बंधित बीमारियाँ,गर्मी के कारण होने वाले रोग,ज्वर,दृष्टि-दोष,रीढ़ सम्बन्धित रोग,पाचन से सम्बंधित समस्याएं,आत्म शक्ति की कमी!ब्लड-प्रेशर भी रवि के आधिपत्य में है क्योंकि रक्त का प्रवाह धीरे होगा या तेज यह हृदय के आकुंचन पर निर्भर करता है और हृदय पर सूर्य का अधिकार है!सूर्य के पीड़ित होने पर मुंह से थूक आता रहता है!
व्यवसाय:-राजकीय सेवा,ऊर्जा उत्पादन,दवाइयों से जुड़े व्यवसाय,धन,अनाज के कारोबार,प्रकाश देने वाली चीजें जैसे बल्ब,ट्यूब लाईट के कारोबार,डॉक्टर इत्यादि!सोने का कारोबार!सूर्य स्थिरता का कारक है यह जीवन में स्थायित्व को निर्देशित करता है!पिता द्वारा प्रदत्त स्वयं का काम!
स्टॉक मार्केट:-POWER SECTOR,NUCLEAR ENERGY,GOVT. PUBLIC SECTOR UNITS,MEDIA.
COMMODITY MARKET:-सोना,ताम्बा,कांसा,GUN METAL,माणक,गेंहू,पटाखे,ग्रेफाईट और सल्फर!
राजनीतिक दृष्टिकोण:-प्रशासकों को निर्देशित करता है!राजा,तानाशाह,बड़े शाही नेता,विभागों के अध्यक्ष,वे लोग जिनके पास शक्ति व अधिकार है!ये एक होता है,जो सभी को नियंत्रित करता है यदि इस लिहाज से देखा जाये तो सूर्य के सभी गुण राजशाही में राजा के अंदर देखने को मिलेंगे लोकतंत्र में नहीं क्योंकि लोकतंत्र में तो शासक जनता होती है शक्ति का मुख्य पुंज नागरिक होते है और नेता तो केवल कार्यवाहक होते है या यूं कहें तो नौकर होते है इसलिए मुझे ऐसा लगता है,कि विभागाध्यक्ष तो फिर भी सूर्य के प्रभाव में हो सकते हैं पर नेता तो सेवक हैं मालिक नहीं हाँ ये बात और हैकि ये लोग आगे जाकर स्वयं को लोकतंत्र का उत्तराधिकारी समझने लगें!
पदार्थ:-अखरोट,नारियल,इलाइची,केसर,अजवायन,चावल,मिर्ची,बादाम,मूंगफली,पाइन,विदेशी मुद्रा,दवाएं,
बाजार और संस्थान:-रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया,स्टॉक एक्सचेंज,सरकारी दफ्तर,सोना और इसकी कीमतों में उतार चढ़ाव,सरकारी ऋण इत्यादि!
पेड़-पौधे:-कांटेदार पेड़,बादाम,संतरे,केसर,शीशम,गुलाब और केदार के पेड़ व पौधे!इनके अलावा चिकित्सकीय प्रयोग में आने वाले पादप!
स्थान:-जंगल,शिव मंदिर,सरकारी ऑफिस,पंचायत समिति,ऊर्जा विद्युत केंद्र,विद्युत निर्माण केंद्र,दवाई की दूकान इत्यादि!
अंक:-"एक" पर निर्विवाद रूप से सूर्य का अधिकार है!
दिन,राशि और नक्षत्र:-रविवार का मालिक सूर्य है!राशियों में सिंह राशि का स्वामित्व सूर्य के पास है!सत्ताईस नक्षत्रों में से कृतिका,उत्तराफाल्गुनी और उत्तराषाढा नक्षत्रों का मालिक भी सूर्य है!
रत्न:-माणक सूर्य का प्रमुख रत्न है!इसे सोने में मढवाकर पहना जा सकता है!यह रोगप्रतिरोधक क्षमता को बढाने के साथ-साथ सरकारी साख भी बढाता है!
जीव-जंतु:-शेर,घोडा,मवेशी और जंगल में रहने वाले अन्य जंगली जानवर!
       सूर्य ग्रीष्म ऋतु का मालिक होता है!यह एक माह तक एक राशि में रहता है और इसकी एक दिन की गति लगभग एक अंश होती है!सौरमंडल में सूर्य के गति को अयनांश कहा जाता है!घर में सूर्य का स्थान पूजन-कक्ष होता है!सूर्य प्रभावित व्यक्तियों के घर का दरवाजा पूर्व दिशा मैं होता है!सूर्य चालित व्यक्ति के दांये नितंब पर निशान बना होता है!

Friday, August 19, 2011

ग्रहों की युति


  बात कुछ दिनों पहले की है,मेरे एक दोस्त मनीष जी गंगानगर से मुझसे मिलने बीकानेर आये हुए थे. बातों के दौरान ज्योतिष विषय पर चर्चा शुरू हुई. इसी क्रम में उन्होंने मुझसे पूछा,कि ग्रहों की युति को आप किस तरह से परिभाषित करेंगे. उसके बाद हमारी कुछ बातें इस विषय पर हुई,शायद ज्योतिष जिज्ञासुओं के लिए काम की हो इसलिए संवाद रूप में यहाँ लिख रहा हूँ.

मनीष जी:- ग्रहों की युति अपना प्रभाव किन-किन तरीकों से देती है?यदि दो ग्रह हों तो और यदि तीसरा ग्रह भी उनमें सम्मिलित हो तो उसका क्या प्रभाव पड़ता है,क्या वह पूरी तरह से युति के प्रभाव को बदल देता है या फिर कुछ और?सबसे महत्वपूर्ण बात हम फलादेश करते समय इन युतिओं को किस तरह काम में ले सकते हैं?
ज्योतिष विद्यार्थी:-सबसे पहले तो मोटी बात करते हैं ग्रहों के मैत्री आधारित युति संबंधों पर.ये सम्बन्ध मुख्यतया तीन तरह के होते हैं!
1.जब दो मित्र ग्रह युति में हों.
2.जब दो सम ग्रह युति में हों.
3.जब दो शत्रु ग्रह युति में हों.
              अब साधारण सी बात है,कि जब दो मित्र साथ-साथ होंगे तो कुछ न कुछ सार्थक होगा जैसे यदि वह किसी विषय पर चर्चा कर रहे हैं या अगर कहीं घूमने गए हैं,तो माहौल शांतिमय और माधुर्यपूर्ण होता है.अगर दो अजनबी जो एक दुसरे के पास-पास बैठे हैं,तो उनमें आपस में जान-पहचान होगी कुछ बातचीत होगी और साधारण शांतिमय माहौल होगा.अंत में बात करते हैं शत्रु ग्रहों की,अगर दो शत्रु ग्रह एक साथ हो तो वो उस स्थान को अशांतिमय कर देंगे और विध्वंसकारी प्रवृत्तियों को वहाँ केंद्रित करेंगे.
        अलग दृष्टिकोण से देखने पर मान लें की एक कमरा एक राशि है,यदि एक ग्रह उस राशि के एक किनारे पर बैठा है और दूसरा दुसरे किनारे पर तो युति प्रतीत होते हुए भी उनकी युति का फल प्राप्त नहीं होता है.अब क्या दो लोग एक कमरे के दो अलग-अलग छोर पर बैठकर बातचीत कर सकते हैं क्या?नहीं लेकिन हाँ एक कमरे के अंतिम छोर पर बैठा व्यक्ति अगले कमरे के शुरुआती छोर पर बैठे व्यक्ति से आराम से बातचीत कर सकता है.वास्तव में कई बार जन्मकुंडली में ऐसा ही देखने को मिलता है,कि एक भाव में स्थित दो ग्रहों में तो युति का फल नहीं मिलता जबकि दो अलग भावों में बैठे ग्रहों की युति का फल प्राप्त होता है.एक बात और जैसे मान लें कि एक दोस्त सड़क पर चला जा रहा है और पीछे से उसका एक दोस्त आ रहा है,तो वह उस आगे वाले दोस्त को आवाज देकर रोकता है,उससे बात करता है फिर दोनों चल पड़ते हैं. अर्थात ग्रहों की युति जब बनने वाली होती है तो वह अधिक ताकतवर होती है और जब छूट रही होती है तो कमजोर होती जाती है.ये तो बात हुई दोस्ती और दुश्मनी की लेकिन जब उन्होंने पूछा की इन युति के प्रभाव को जन्मपत्रिका में किस प्रकार देखेंगे तो कुछ देर सोचने के बाद मैंने उन्हें समझाने के लिए एक सारणी बनाई उसे यहाँ पेश कर रहा हूँ.मैंने इस सारणी में चंद्र को प्रधान ग्रह के रूप में लिया है और अन्य ग्रहों का इसके साथ युति सम्बन्ध किस तरह होगा इस पर चर्चा करने का प्रयास किया है,आशा है कि आप सब को भी पसंद आएगा.
                                                       -:चंद्र:-(विचार)
शनि(दु:ख,विषाद,कमी,निराशा)               :- मन में दु:ख,नकारात्मक सोच.
मंगल(साहस,धैर्य,तेज,क्षणिक क्रोध)        :-  विचारों में ओज,क्रांतिकारी विचार. 
बुध(वाणी,चातुर्य.हास्य)                           :- हास्य-व्यंग्य पूर्ण विचार,नए विचार.
गुरु(ज्ञान,गंभीरता,न्याय,सत्य)            :- न्याय,सत्य और ज्ञान की कसौटी पर कसे हुए गंभीर विचार.
शुक्र(स्त्री,माया,संसाधन,मिठास,सौंदर्य)     :- माया में जकड़े विचार,सुंदरता से जुड़े विचार.
सूर्य(आत्म-तेज,आदर)                            :- आदर के विचार,स्वाभिमान का विचार.
राहू(मतिभ्रम,लालच)                               :- विचारों का द्वंद्व,सही-गलत के बीच झूलते विचार.
केतु(कटाक्ष,झूठ,अफवाह)                        :- झूठ,अफवाह और सही बातों को काटने का विचार.
               यहाँ जैसे मैंने चन्द्रमा के केवल एक कारक को लेते हुए दुसरे ग्रहों के वे कारकत्व जो चंद्र से मिल सकते हैं,मिलाया है और युति का फल बतलाने का प्रयत्न किया है अब इन्हीं का फल अलग तरह से भी पता लग सकता है,जैसे ऊपर की सारणी की ही बात करें तो चंद्र माता का भी स्वामित्व रखता है,अब चंद्र रूपी माता का शनि के किस कारक से संयोग होगा यह विचार कर प्रभाव ज्ञात कर सकते हैं!यहाँ मैंने मूल तरीका बताने की कोशिश की है,कैसा लगा.यदि किसी सुधार की गुंजाइश हो तो अवश्य सूचित करें. 





Wednesday, July 6, 2011

ज्योतिष : पुरातन विवेचन :- आचार्य राज


आज बात कर रहा हूँ अपने पूजनीय गुरु श्री आचार्य राज द्वारा बताये गए एक पौराणिक किस्से का जिनका जिक्र उन्होंने अपनी पुस्तक "सितारों के अक्षर किरणों की भाषा" में भी किया है ! एक बात गुरूजी की किताबों के बारे में भी बताना चाहूँगा कि इनकी किताबें वास्तव में प्रसिद्द लेखिका अमृता प्रीतम के साथ संवाद है जिनका स्वरुप बाद में पुस्तकमय कर इनको प्रकाशित किया गया है ! दिल्ली के "किताब घर" से इनका प्रकाशन होता है ! इनकी दूसरी पुस्तक का नाम है "सितारों के संकेत"जिसमें आचार्य का स्वप्न ज्योतिष का गूढ़ ज्ञान दृष्टिगोचर होता है ! पुनः विषय पर आगे बढते हैं,आचार्य ने अपनी पुस्तक में ज्योतिष के उद्गम का विवेचन किया है, जिसका जिक्र मैं यहाँ उन्हीं के शब्दों में करने का प्रयास कर रहा हूँ ! 
     ज्योतिष की उत्पत्ति वेदों से होती है या ऐसा  कहें कि ज्योतिष वेदों का ही एक अंग हैं जिसे वेदों के नेत्र की संज्ञा दी गयी है !क्योंकि देखने का सामर्थ्य नेत्रों में होता है और ज्योतिष भी देखने का कार्य करता है !इस प्रकार सृष्टि के आरम्भ में ज्योतिष पर मूलतः प्रजापति ब्रह्मा का स्वामित्व था !जब जगन्नियन्ता परम पिता परमात्मा के आदेश से उन्होंने इस जगत के निर्माण का कार्य शुरू किया तो सर्वप्रथम उन्होंने तप के द्वारा सृष्टि के निर्माण की शुरुआत की !लेकिन कई युग बीत जाने पर उनके तप बल से आठ मानसिक पुत्रों को उन्होंने उत्पन्न किया !ये आठ पुत्र है सप्तर्षि और देवर्षि नारद !इसके बाद ब्रह्मा जी ने विचार किया कि इस प्रकार से मानसिक सृष्टि करने में तो करोड़ों युग बीत जायेंगे तो क्या किया जाय तब उनके मन में मैथुनी सृष्टि का विचार उत्पन्न हुआ ! उन्होंने अपने आठों पुत्रों को बुलाया और उनके समक्ष मैथुनी सृष्टि के विचार को रखा !उनके सात पुत्र तो मैथुनी सृष्टि स्वीकार करने के लिए तैयार हो गए "ये थे सप्तर्षि" लेकिन उनका एक पुत्र ने मैथुनी सृष्टि को स्वीकार नहीं किया और वो थे "नारद"!तब मैथुनी सृष्टि के विचार को अपनाने वाले पुत्रों के लिए ब्रह्मा ने स्त्री के निर्माण का कार्य शुरू कर दिया लेकिन काफी समय के बाद जब वे इस कार्य में पूर्ण रूप से सफल नहीं हो सके तो उन्होंने देवाधिदेव महादेव की शरण ली और महादेव ने प्रसन्न होकर पहले अर्धनारीश्वर रूप ग्रहण किया फिर नारी स्वरुप को अपने शरीर से अलग कर स्त्री जाति की उत्पत्ति की !इस प्रकार मैथुनी सृष्टि की शुरुआत हो गयी !फिर ब्रह्मा जी ने विचार किया कि मेरे सात पुत्र तो मैथुनी सृष्टि स्वीकार करके मर्त्यलोक में निवास करने चले गए अब मैं नारद को क्या दूं इस प्रकार विचार करते हुए ब्रह्मा जी ने नारद को वेदों में से ज्योतिष का ज्ञान प्रदान किया और नारद दैवज्ञ हो गए !दैवज्ञ वो होता है जो सात जन्म आगे और पीछे तक का ज्ञान ज्योतिष से प्राप्त कर लेता है !जब नारद भी इस कोटि को प्राप्त हो गए तो वह सदैव दैत्यों और देवताओं को आने वाले भविष्य के लिए पहले से ही सूचित करते रहते जिसके कारण कई बार सुनने को मिलता है , कि नारद ही देवताओं और दानवों को लड़ाने  का कार्य करते थे लेकिन वास्तव में नारद को सब कुछ पता होता था वो तो केवल आगाह करने का कार्य करते थे जो होना था वो तो निश्चित था !
             इस प्रकार ज्योतिष का पौराणिक  उद्गम "नारद पुराण"को माना जाता है !ऐसा कहा जता है , कि शुरुआत में इसमें 84 लाख श्लोक हुआ करते थे लेकिन वक्त की धुल में उड़ते - उड़ते ये श्लोक आज  नाम मात्र ही रह गए हैं !चाहें तो इस विषय पर ज्योतिषीगण नारद पुराण का पठन कर सकते हैं !  कहा जा सकता है कि वर्तमान में जो ज्योतिष का लेख विद्यमान है वह अपूर्ण है और सतत प्रयासों के द्वारा उनकी रचना पुनः करनी होगी !ज्योतिष को विभिन्न शाखाओं में विभाजन कर उनका तार्किक तरीकों से अध्ययन करना होगा !ज्योतिष फल बतलाने वाले पंडितों को ये बात समझनी होगी की विवाह की तिथी और नौकरी बताने वाला पंडित अचानक से बरसात का दिन ,चुनाव की जीत ,ज्वालामुखी का फटना आदि नहीं बता सकता क्योंकि ये ज्योतिष की अलग - अलग शाखाएं हैं लेकिन इस बात को समझे बिना पांडित्य को बरकरार रखने के लिए फलादेश किया जाता है और गलत होने पर पंडित जी के साथ साथ इस विषय को भी खामियाजा भुगतना पड़ता है !इसलिए बिना ज्ञान के ज्योतिष की विभिन्न शाखाओं में फलादेश करने से बचना चाहिए और पहले एक शाखा पर पूरी पकड़ करने का प्रयास करना चाहिए !मैं आह्वान करता हूँ भारत के उन सभी ज्योतिष से जुड़े लोगों का कि वो आगे बढे और जिस तरह से भी कर सकते हैं इस विषय को प्रामाणिक और उपयोगी बनाने में मदद करें ! गणेश जी हमें हमारे कार्य में सफल करे ! जय गणेश !

! जय गणेश ! 
! जय जय गणेश !!