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Saturday, February 24, 2018

SATURN AND VENUS

शनि और शुक्र
यदि इन दोनों ग्रहों में से एक ग्रह भी उच्च राशि में स्थित हो, तो जब शनि की महादशा में शुक्र की अन्तर्दशा या शुक्र की महादशा में शनि की अन्तर्दशा आती है तो वह उस जातक के लिए बड़ा ही संघर्षपूर्ण होता है .
जब इस नियम की जांच करनी शुरू की तो तीन ऐसे लोगों से मुलाकात हुई जिनकी जन्मपत्रिका में इन दोनों में से एक ग्रह उच्च राशि में स्थित है और वो इस दशा से भी गुजर चुके हैं ,उनसे पूछने पर उनहोंने अपने उस समयावधि के बारे में जो बताया उसे बिन्दुवार लिख रहा हूँ .
१. प्रथम जातक जिसकी जन्मपत्रिका में कन्या लग्न है तथा शुक्र अपनी उच्च राशि में स्थित है , ४५ वर्ष की उम्र हो चुकी है अब तक विवाह नहीं हुआ है . इस जातक को शनि में शुक्र की अन्तर्दशा के दौरान अपने घर से निकाल दिया गया तथा इसे अपने दोस्तों के घर, होटल तथा धर्मशालाओं में रहकर इस समय को व्यतीत करना पडा तथा धनाभाव निरंतर बना रहा . इस दशा के समाप्त होने के बाद यह पुनः अपने परिवार के साथ रहने लगा है .
२. द्वितीय जातक भी कन्या लग्न का है जिसका शनि अपनी उच्च राशि तुला में स्थित है यह जातक अपने ननिहाल में रहता था लेकिन शुक्र मैं शनि की अन्तर्दशा के समय इसे ननिहाल से वापस भेज दिया गया तथा अपने पिता का मकान बहुत छोटा होने के कारण मंदिर के एक कमरे में इस समय को व्यतीत करना पड़ा तथा धनाभाव भी निरंतर बना रहा .
३. तृतीय जातक एक विधायक है जिसे लम्बे समय की चुनावी जीत के पश्चात इस दशा समय में चुनावी हार का सामना करना पडा अर्थात विधानसभा से बाहर रहना पडा . धनाभाव तो नहीं रहा लेकिन शक्ति और अधिकार का अभाव बना रहा .
और भी कुछ जातक है जिनके शनि या शुक्र उच्च राशि में स्थित है लेकिन अभी यह दशा क्रम आना बाकी है .
इस नियम का सही होना इतना सामान्य नहीं है , यह वास्तव में बहुत ही महत्वपूर्ण है क्योंकि यह घटना विंशोत्तरी दशा क्रम की सटीकता को भी प्रतिपादित करती है .
इसका विपरीत योग भी बिलकुल सटीक है जिसके बारे फिर कभी चर्चा करूंगा .

RAHU - THE NODE POINT

राहु
एक ग्रह के कई कारकत्व होते हैं और प्रत्येक कारकत्व के आधार पर उसके अलग अलग प्रभाव भी होते हैं इसी के आधार पर आज राहु ग्रह की बात करते हैं -
-राहु अव्यवस्था का प्रतीक है या ऐसा भी कह सकते हैं कि किसी व्यवस्था में विघ्न उत्पन्न करना भी राहु का ही काम है.
-नाड़ी ज्योतिष के अनुसार गुफा (CAVE) पर भी राहु का आधिपत्य है या ऐसा कहें की गुफा के समान संरचना पर भी राहु का ही अधिकार है.
राहु की स्थिति यदि लग्न में हो फिर चाहे लग्न में कोई भी राशि स्थित हो ,तो ऐसा राहु दांतों में किसी न किसी प्रकार की अव्यवस्था उत्पन्न करता है , जैसे -
- दांत पर दांत चढ़ा होना .
- किसी दांत का आधा टूटा होना .
-दांतों पर लाल या काले रंग की परत का जमा होना .
- स्कर्वी रोग हो जाना .
- कीड़े पड़ने से दांतों का खोखला हो जाना इत्यादि .
कई बार ये स्थितियां जन्म से ही उपस्थित होती है जबकि कई बार ये प्रकृतिजन्य होती है , जैसे
-छोटी उम्र में गिरने पर दांत टूट जाना या दांत पर दांत का चढ़ जाना .
- चॉकलेट खाने से दांतों में कीड़े पड़ जाना .
- कई बार दांत की निरंतर सफाई न करने से भी दांतों पर कुछ दाग हमेशा के लिए जम जाते है तथा बदबू आती है .
जिन लोगों का अनुभव मैंने प्राप्त किया है उनमे से :- एक व्यक्ति जिसका मकर लग्न है तथा लग्न में शनि राहु स्थित है, के दांत की श्रृंखला टेढ़ी - मेढ़ी ( ZIG-ZAG ) है ,जिसके कारण पिछले दांतों की सफाई ठीक तरह से नहीं हो पाती और उन पर जमे हुए काले रंग की परत को आसानी से देखा जा सकता है .
दूसरी कुंडली में लग्न में केवल राहु ही स्थित है और जब मैंने पूछा कि दांतों में क्या रोग है तो बताया गया की स्कर्वी है .
अन्य अनुभवों के आधार पर कहा जा सकता है कि लग्न में स्थित राहु दन्तावली में किसी न किसी प्रकार की समस्या देता है .
अब यह समस्या किस लग्न के राहु में किस प्रकार की होगी तथा युति व दृष्टि से किस प्रकार प्रभावित होगी यह निरंतर अनुभव व शोध का विषय है .
ऐसा नहीं है कि लग्न के राहु का यही एक फल है ,अन्य फल भी होते हैं ,उनमें से यह भी एक है .


अन्य ज्योतिर्विदों के अनुभवों की अपेक्षा में आपका
श्रीराम

Thursday, October 4, 2012

धार्मिक कर्म में मौलि बंधन क्यों ?

       किसी भी शुभ कार्य से पहले जैसे कोई पूजा -  अनुष्ठान , गृह प्रवेश ,दीपावली की पूजा  या अन्य कोई भी पूजन सर्वप्रथम पंडित जी यजमान (यज्ञमान) को तिलक करते हैं और मौली बंधते हैं फिर पूजा आरम्भ होती है ! मौली बंधते वक़्त इस  मंत्र का उच्चारण  जाता है:-


        येन  बद्धो बलीराजा दावेंद्रो महाबलः !
            तेन त्वामनुबध्नामि रक्षे  माचल माचल !! 


       ये प्रथा कब शुरू हुई और इसके महत्त्व के विषय में अनेक आख्यान शास्त्रों में मौजूद हैं !मौली बंधने की परंपरा तब से चली आ रही है, जब से महान , दानवीरों में अग्रणी महाराज बलि की अमरता के लिए वामन भगवान् ने उनकी कलाई पर रक्षा सूत्र बांधा था !

            इसे रक्षा  कवच के रूप में भी  शरीर पर बांधा जाता है !इन्द्र जब वृत्रासुर से युद्ध करने जा रहे थे तब इंद्राणी शची ने इन्द्र की दाहिनी भुजा पर रक्षा-कवच के रूप में मौली को बाँध दिया था और इन्द्र इस युद्ध में विजयी हुए ! 

      स्वास्थ्य के अनुसार मौली-बंधन से वात पित्त और कफ तीनों का शरीर में संतुलन बना रहता है और शरीर नीरोग रहता है !साधारणतया हम देखते हैं,कि यदि कोई कर्मकांडी पुरोहित जो कई दिनों तक चलने वाले अनुष्ठान में  हैं और दुर्भाग्यवश उनके कुटुंब में किसी निकट संबंधी की मृत्यु हो जाती है तो भी उनको "सूतक"का दोष नहीं लगता है और वो अपना अनुष्ठान निर्विघ्न पूरा कर सकते हैं,क्योंकि क्योंकि उनहोंने पूजन आरम्भ होने पर बंधी जाने वाली मौली बाँध  रखी है!यानी की मौली के प्रभाव से उस बड़े अनुष्ठान पर बाधा ताल जाती है ! 





    

Wednesday, October 5, 2011

नक्षत्र:भरणी


नक्षत्र:भरणी

                                                                  2.भरणी
भरणी नक्षत्र का वैदिक नाम अपभरणी है!
भरणी नक्षत्र में तीन तारे होते हैं,जो स्त्री योनि के आकार में आकाश में अवस्थित होते हैं!इस नक्षत्र का स्वामित्व यम देवता के पास होता है!नौ ग्रहों में से शुक्र भरणी नक्षत्र का अधिपति है!यह उग्रसंज्ञक नक्षत्र है अतः उग्र कार्य जैसे तंत्र प्रयोग,मुक़दमा करना,शत्रुपर आक्रमण,चालाकी के कार्य इसमें अनुकूल होते हैं!अधोमुख नक्षत्र होने के कारण अधोगमन वाले कार्य जैसे कुआं खोदना,UNDERGROUND बनाना,बोरिंग कराना,सुरंग बनाना इत्यादि नीचे की ओर गतिशील कार्य किये जा सकते हैं!भाद्रपद मास में भरणी नक्षत्र वाले दिन कोई भी कार्य नहीं करना चाहिए क्योंकि यह प्रभावशून्य होता है!भरणी नक्षत्र अमृतसिद्धि और सर्वार्थसिद्धि योग का निर्माण नहीं करता है!भरणी नक्षत्र के लिए केले व आंवले की पूजा की जानी चाहिए!भरणी चांडाल जाति का नक्षत्र है!भरणी नक्षत्र स्त्री संज्ञक और वशिष्ठ गोत्र का होता है!इस नक्षत्र की योनि गज,नाड़ी मध्य और गण मनुष्य होता है!यह कालपुरुष के माथे(ललाट) का अधिपति होता है!प्रमष्तिष्क गोलार्ध और आँखों पर इस नक्षत्र का ही आधिपत्य है!
कारकत्व:-रक्त व मांस से सम्बंधित लोग जैसे कि रक्त का परीक्षण करने वाले मांस का व्यापार करने वाले,हिंसक प्राणी,कसाई,आतंकवादी,भूसे वाले सभी अनाज,नीच स्वभाव और नीच कुल के लोग,तांत्रिक और मृत शरीरों पर तंत्र साधना करने वाले तांत्रिक,जहर,शस्त्र,अस्त्र,कोर्ट व युद्ध भी इसी नक्षत्र से सम्बंधित है!
नक्षत्रफल:-दृढ़ निश्चय वाले सत्यवादी और सुखी,जिस काम को करने की सोच ले उसे करके ही छोड़ते हैं!TIME MANAGEMENT बहुत अच्छा होता है!खाना कम खाते हैं!व्यक्तित्व आकर्षक होता है!मनोविनोद में इनका मन अधिक लगता है!शराब और स्त्री दोनों का पूर्ण लाभ लेना चाहते हैं!
पदार्थ:-भूसी वाले अनाज,ज्वारबाजरा,रंग,जहर व जहरीले पदार्थ,विभिन्न रसायन इत्यादि !
व्यक्ति:-BLOOD BANK के कर्मचारी,स्वार्थी लोग,अत्यधिक धूम्रपान करने वाले,शराब के शौक़ीन,रसिक मिजाज वाले,साधारणतया रोगों से मुक्त रहने वाला!
भरणी नक्षत्र का वैदिक मंत्र:-यमाय त्वान्गिरस्यते पित्रीमते स्वाहा स्वाहा धर्माय स्वाहा धर्मपित्रे!
बीमारियाँ:-सिर में चोट,आँखों के पास चोट,नशे की लत,कफ रोग इत्यादि!
मानसिक गुण:-खाने का शौक़ीन,क्रूर व्यक्तित्व,अपने से निचले तबके के लोगों के साथ रहने वाला अपने लक्ष्य को सदैव प्राप्त करता है!चतुर व्यक्तित्व का मालिक!इनके जीवन में प्रेम सर्वाधिक महत्वपूर्ण होता है और दिमाग की बजाय दिल से अधिक सोचते है!इनके व्यक्तित्व में सदैव एक कवि  रहता है!
व्यवसाय:-संगीत,खेल-कूद,प्रचारक,चांदी के बर्तनों का काम,शादी करवाने वाले मध्यस्थ,कसाईखाना,होटल,रतिरोग,MATERNITY HOSPITAL,संपत्ति का मूल्यांकन करने वाला!

Saturday, September 17, 2011

नक्षत्र


नक्षत्र : अश्विनी

: नक्षत्र :

एक स्थान से दुसरे स्थान पर पृथ्वी के अयन चलने के कारण खिसकते प्रतीत होने वाले तारामंडलों का नाम नक्षत्र है!तैत्तिरीय संहिता में कहा गया है सृष्टि सर्वत्र जल में रहने पर सृष्टि की शुरुआत में जो तर गए वे तारे हैं!
                                                                           1. अश्विनी 
अश्विनी नक्षत्र का वैदिक नाम अश्वयुज है!अश्विनी नक्षत्र में कुल तीन तारे होते हैं,जो आपस में मिलकर घोड़े के मुख जैसी आकृति का निर्माण करते हैं!
अश्विनी नक्षत्र का मालिक अश्विनी कुमार है,और ग्रहों में इस नक्षत्र का मालिक है केतु !यह क्षिप्र नक्षत्र है,अतः इसमें खरीद-बेच,यात्रारम्भ,विद्यारंभ किया जा सकता है!तिर्यक मुख नक्षत्र होने के कारण जलयात्रा,विमान यात्रा,मशीनरी चालू करना आदि कार्य किये जा सकते हैं!चैत्र मास में अश्विनी नक्षत्र को कोई भी शुभ कार्य नहीं करना चाहिए क्योंकि इसका प्रभाव शून्य होता है!मंगलवार को अश्विनी नक्षत्र होने पर अमृतसिद्धि और रविवार को अश्विनी नक्षत्र होने पर सर्वार्थसिद्धि नक्षत्र का योग करता है!रविवार को अश्विनी नक्षत्र आनंद योग का निर्माण करता है!अपवादस्वरूप अमृतसिद्धि योग यदि सप्तमी तिथी को पड़े तो विष का निर्माण करता है,अर्थात त्याज्य है!अश्विनी नक्षत्र गंडांत संज्ञक होता है इसकी शुरुआत की दो घड़ी अर्थात 48 मिनट गंडांत होते हैं!परन्तु रविवार को अश्विनी नक्षत्र में जन्म होने पर गंडांत का दोष काफी हद तक कम हो जाता है!अश्विनी नक्षत्र के लिए केले,आक व धतूरे के वृक्ष की पूजा करनी चाहिए!अश्विनी नक्षत्र पुरुष संज्ञक और मरीचि गोत्र का होता है!पञ्च तत्वों में इसका तत्व पृथ्वी है!यह नक्षत्र-पुरुष के सर का अधिष्ठाता होता है!इस नक्षत्र की योनी अश्व,नाड़ी आद्या और गण देव होता है!
कारकत्व:-घोड़ों से सम्बंधित लोग,आधुनिक काल के हिसाब से वाहनों से सम्बंधित लोग!सेनापति,शरीर की चिकित्सा करने वाले चिकित्सक!अधीनस्थता में काम करने वाले लोग!रूपाजीवी अर्थात सुंदरता से धन कमाने वाले लोग!कृषि कर्म करने वाले !

नक्षत्रफल:-सुरूप चमकयुक्त बड़ी आँखें!आकर्षक उभारयुक्त ललाट,कार्यदक्ष,बुद्धिमान,अच्छी नीरोग शक्ति वाला,बातों से प्रभावित करने वाला होता है!दृढ़ निश्चय या यूं कहें की अड़ियलपन इनकी खास पहचान होती है!
पदार्थ:-चावल,घी,अनाज,कपडा,घास,चारा,जड़ी-बूटियाँ,केमिकल आदि!
व्यक्ति:-घोड़ों के व्यापारी,प्रशिक्षक,घुडदौड कराने वाले,वाहन उद्योग से सम्बंधित लोग,चिकित्सक,कर्मचारी वर्ग,विज्ञापन की दुनिया से जुड़े लोग!
अश्विनी नक्षत्र का वैदिक मंत्र:- "अश्विना तेजसाचक्षु: प्रIणेन सरस्वतीवीर्यम् ! वाचेंद्रो बलेनेंद्रा यदद्युरिन्द्रयम्"
बीमारियाँ:-सर में चोट,दुर्बलता,मिर्गी,सर के आधे भाग में दर्द,मूर्छा,असाधारण नींद,पक्षाघात,मलेरिया,छोटी चेचक!
मानसिक गुण:-भाईयों से मतभेद,विवेक शून्य,हनुमान जी की पूजा,लोभी,भूमि के लिए चिंतित!
व्यवसाय:-पुलिस,सेना,चिकित्सा,रेलवे,मशीनरी,लोहा,घुडसवार,जेल,अदालत,कारखाना!

Thursday, September 15, 2011


ग्रह:सूर्य

                                                                  1.सूर्य

                                             "सूर्य आत्मा जगत्स्तथुषश्च"
 सूर्य ग्रहों में राजा है!इसकी जाति राजक्षत्रिय है!इसका रंग रक्त के समान है!सूर्य के देवता अग्नि है!इसके अधिपति शिव है!सूर्य की दिशा पूर्व दिशा है!यह नैसर्गिक पाप ग्रह ना होकर नैसर्गिक क्रूर ग्रह है!
वैज्ञानिक दृष्टिकोण:-सूर्य वास्तव में एक तारा है,जो हमारे सौरमंडल को बाँधे रखने का कार्य करता है!सूर्य ही सौरमंडल का केंद्र बिंदु है,जिसके चारों ओर ग्रह और उपग्रह घूर्णन करते हैं!इसका कारण है,कि सूर्य से ही सभी पिंडों को जीवनी शक्ति प्राप्त होती है!सूर्य के बिना हमारे सौरमंडल और जीवन की कल्पना भी नहीं की जा सकती!यह पृथ्वी के सबसे नजदीक का तारा है!इसीलिये अन्य तारों की अपेक्षा अधिक चमकदार और बड़ा प्रतीत होता है!सूर्य पर हाइड्रोजन गैस का भण्डार है,जिसकी आपस में संयोजित होने की क्रिया से जो असीमित ऊर्जा विसर्जित होती है उसके अंश मात्र से पृथ्वी पर जीवन है,सभी ग्रहों का वातावरण है!
पौराणिक विवेचन:-पुराणों में आलेख मिलते हैं,कि दक्ष प्रजापति की दो कन्याओं दिति और अदिति का विवाह कश्यप मुनि के साथ हुआ था!अदिति के गर्भ से सूर्य का जन्म हुआ इसीलिये इसे आदित्य कहा जाता है!पौराणिक मान्यताओं के अनुसार सूर्य के रथ में सात घोड़े जुते होते हैं!सूर्य ने संज्ञा और छाया से विवाह किया!छाया से शनि नामक पुत्र उत्पन्न हुआ जो पिता के समान बलशाली है!
पर्यायवाची:-सूर्य को अंग्रेजी में SUN,अरबी मैं आफताब,फारसी में खुरशेद कहते हैं!हिन्दी में इसे आदित्य,अर्क,अर्यमा,अंशुमाली,ग्रहपति,दिनकर,दिवाकर,प्रभाकर,भानु,मार्तंड,रवि,सविता,भास्कर,मिहिर,दिनेश इत्यादि नामों से जाना जाता है!
वैदिक मंत्र:-  ॐआकृष्णेन रजसा वर्त्तमानो निवेशयन्नमृतं मर्त्यन्च !
                      हिरण्ययेन सविता रथेना देवो याति भुवनानि पश्यन !!
तांत्रिक मंत्र:- ॐ ह्राँ ह्रीं ह्रौं सः सूर्याय नमः !!
स्वामित्व:-रवि सौरमंडल की आत्मा है,इसके बिना सौरमंडल का अस्तित्व संभव नहीं है!अर्थात जीवन के लिए जितनी भी आवश्यक वस्तुएं हैं उन सब पर सूर्य का ही अधिकार है!हो सकता है पढ़कर ऐसा प्रतीत हो,कि जीवन के लिए तो वायु,भोजन और जल तीनों ही आवश्यक है,फिर इन सब पर सूर्य का अधिकार कैसे है!सूर्य के कारण ही पृथ्वी के पास वह शक्ति है,कि वायु और जल पृथ्वी की सतह पर उपलब्ध है और हमें भोजन प्रदान करने वाला वनस्पति जगत भी अस्तित्वमान है!रवि की ऊष्मा शरीर को जलाने वाली नहीं बल्कि शरीर के जीवित रहने के लिए जरूरी होती है!अतः आत्मा पर सूर्य का स्वामित्व है!आत्मा लौ के रूप में ऊर्ध्वगामी होकर ह्रदय में अवस्थित होती है अतः ह्रदय पर भी इसी ग्रह का अधिकार है!ह्रदय से जुड़े विभिन्न प्रकार के भाव जैसे क्षमाशीलता,अनुशासन भी सूर्य के ही अधिकार में है!
शारीरिक लक्षण एवं रचना:-इनकी आँखों का रंग धुप के जैसा होता है!अब बात आती है,कि धूप का रंग कैसा है तो गौर से देखने पर पता चलेगा कि धूप का रंग शहद के समान हल्का भूरा होता है!इनके शरीर में भी एक शहद जैसे रंग की एक परत चढी महसूस होती है!इनका चेहरा गोल होता है!यह हृदय का कारक है!पुरुषों में दांयी और स्त्रियों में बाँई आँख पर इसका स्वामित्व होता है!पेट में पाई जाने वाली जठराग्नि पर भी सूर्य का अधिकार है!
चरित्र में निहित विशेषताएं:-निःस्वार्थ प्रेम सूर्य की सबसे बड़ी विशेषता है!यह बिना भेदभाव के सबके लिए समान व्यवहार रखता है!इसकी दूसरी विशेषता है नियमित होना जिस प्रकार सूर्य नियमित होता है उसी प्रकार सूर्य के प्रभाव क्षेत्र में आने वाला व्यक्ति भी नियमित होता है!ईश्वर के प्रति सच्चा प्रेम होता है!ये ताकतवर किन्तु न्यायप्रिय होते हैं!इच्छाशक्ति बहुत ही प्रबल होती है!ये कभी थकते नहीं हैं!इनके व्यक्तित्व में एक विशेष आकर्षण होता है!दूसरों पर शासन करने की कला और ऊर्जा होती है!ईमानदारी इनकी चारित्रिक विशेषता में चार चाँद लगा देती है!
बीमारियाँ:-दिल से सम्बंधित बीमारियाँ,गर्मी के कारण होने वाले रोग,ज्वर,दृष्टि-दोष,रीढ़ सम्बन्धित रोग,पाचन से सम्बंधित समस्याएं,आत्म शक्ति की कमी!ब्लड-प्रेशर भी रवि के आधिपत्य में है क्योंकि रक्त का प्रवाह धीरे होगा या तेज यह हृदय के आकुंचन पर निर्भर करता है और हृदय पर सूर्य का अधिकार है!सूर्य के पीड़ित होने पर मुंह से थूक आता रहता है!
व्यवसाय:-राजकीय सेवा,ऊर्जा उत्पादन,दवाइयों से जुड़े व्यवसाय,धन,अनाज के कारोबार,प्रकाश देने वाली चीजें जैसे बल्ब,ट्यूब लाईट के कारोबार,डॉक्टर इत्यादि!सोने का कारोबार!सूर्य स्थिरता का कारक है यह जीवन में स्थायित्व को निर्देशित करता है!पिता द्वारा प्रदत्त स्वयं का काम!
स्टॉक मार्केट:-POWER SECTOR,NUCLEAR ENERGY,GOVT. PUBLIC SECTOR UNITS,MEDIA.
COMMODITY MARKET:-सोना,ताम्बा,कांसा,GUN METAL,माणक,गेंहू,पटाखे,ग्रेफाईट और सल्फर!
राजनीतिक दृष्टिकोण:-प्रशासकों को निर्देशित करता है!राजा,तानाशाह,बड़े शाही नेता,विभागों के अध्यक्ष,वे लोग जिनके पास शक्ति व अधिकार है!ये एक होता है,जो सभी को नियंत्रित करता है यदि इस लिहाज से देखा जाये तो सूर्य के सभी गुण राजशाही में राजा के अंदर देखने को मिलेंगे लोकतंत्र में नहीं क्योंकि लोकतंत्र में तो शासक जनता होती है शक्ति का मुख्य पुंज नागरिक होते है और नेता तो केवल कार्यवाहक होते है या यूं कहें तो नौकर होते है इसलिए मुझे ऐसा लगता है,कि विभागाध्यक्ष तो फिर भी सूर्य के प्रभाव में हो सकते हैं पर नेता तो सेवक हैं मालिक नहीं हाँ ये बात और हैकि ये लोग आगे जाकर स्वयं को लोकतंत्र का उत्तराधिकारी समझने लगें!
पदार्थ:-अखरोट,नारियल,इलाइची,केसर,अजवायन,चावल,मिर्ची,बादाम,मूंगफली,पाइन,विदेशी मुद्रा,दवाएं,
बाजार और संस्थान:-रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया,स्टॉक एक्सचेंज,सरकारी दफ्तर,सोना और इसकी कीमतों में उतार चढ़ाव,सरकारी ऋण इत्यादि!
पेड़-पौधे:-कांटेदार पेड़,बादाम,संतरे,केसर,शीशम,गुलाब और केदार के पेड़ व पौधे!इनके अलावा चिकित्सकीय प्रयोग में आने वाले पादप!
स्थान:-जंगल,शिव मंदिर,सरकारी ऑफिस,पंचायत समिति,ऊर्जा विद्युत केंद्र,विद्युत निर्माण केंद्र,दवाई की दूकान इत्यादि!
अंक:-"एक" पर निर्विवाद रूप से सूर्य का अधिकार है!
दिन,राशि और नक्षत्र:-रविवार का मालिक सूर्य है!राशियों में सिंह राशि का स्वामित्व सूर्य के पास है!सत्ताईस नक्षत्रों में से कृतिका,उत्तराफाल्गुनी और उत्तराषाढा नक्षत्रों का मालिक भी सूर्य है!
रत्न:-माणक सूर्य का प्रमुख रत्न है!इसे सोने में मढवाकर पहना जा सकता है!यह रोगप्रतिरोधक क्षमता को बढाने के साथ-साथ सरकारी साख भी बढाता है!
जीव-जंतु:-शेर,घोडा,मवेशी और जंगल में रहने वाले अन्य जंगली जानवर!
       सूर्य ग्रीष्म ऋतु का मालिक होता है!यह एक माह तक एक राशि में रहता है और इसकी एक दिन की गति लगभग एक अंश होती है!सौरमंडल में सूर्य के गति को अयनांश कहा जाता है!घर में सूर्य का स्थान पूजन-कक्ष होता है!सूर्य प्रभावित व्यक्तियों के घर का दरवाजा पूर्व दिशा मैं होता है!सूर्य चालित व्यक्ति के दांये नितंब पर निशान बना होता है!

Friday, August 19, 2011

ग्रहों की युति


  बात कुछ दिनों पहले की है,मेरे एक दोस्त मनीष जी गंगानगर से मुझसे मिलने बीकानेर आये हुए थे. बातों के दौरान ज्योतिष विषय पर चर्चा शुरू हुई. इसी क्रम में उन्होंने मुझसे पूछा,कि ग्रहों की युति को आप किस तरह से परिभाषित करेंगे. उसके बाद हमारी कुछ बातें इस विषय पर हुई,शायद ज्योतिष जिज्ञासुओं के लिए काम की हो इसलिए संवाद रूप में यहाँ लिख रहा हूँ.

मनीष जी:- ग्रहों की युति अपना प्रभाव किन-किन तरीकों से देती है?यदि दो ग्रह हों तो और यदि तीसरा ग्रह भी उनमें सम्मिलित हो तो उसका क्या प्रभाव पड़ता है,क्या वह पूरी तरह से युति के प्रभाव को बदल देता है या फिर कुछ और?सबसे महत्वपूर्ण बात हम फलादेश करते समय इन युतिओं को किस तरह काम में ले सकते हैं?
ज्योतिष विद्यार्थी:-सबसे पहले तो मोटी बात करते हैं ग्रहों के मैत्री आधारित युति संबंधों पर.ये सम्बन्ध मुख्यतया तीन तरह के होते हैं!
1.जब दो मित्र ग्रह युति में हों.
2.जब दो सम ग्रह युति में हों.
3.जब दो शत्रु ग्रह युति में हों.
              अब साधारण सी बात है,कि जब दो मित्र साथ-साथ होंगे तो कुछ न कुछ सार्थक होगा जैसे यदि वह किसी विषय पर चर्चा कर रहे हैं या अगर कहीं घूमने गए हैं,तो माहौल शांतिमय और माधुर्यपूर्ण होता है.अगर दो अजनबी जो एक दुसरे के पास-पास बैठे हैं,तो उनमें आपस में जान-पहचान होगी कुछ बातचीत होगी और साधारण शांतिमय माहौल होगा.अंत में बात करते हैं शत्रु ग्रहों की,अगर दो शत्रु ग्रह एक साथ हो तो वो उस स्थान को अशांतिमय कर देंगे और विध्वंसकारी प्रवृत्तियों को वहाँ केंद्रित करेंगे.
        अलग दृष्टिकोण से देखने पर मान लें की एक कमरा एक राशि है,यदि एक ग्रह उस राशि के एक किनारे पर बैठा है और दूसरा दुसरे किनारे पर तो युति प्रतीत होते हुए भी उनकी युति का फल प्राप्त नहीं होता है.अब क्या दो लोग एक कमरे के दो अलग-अलग छोर पर बैठकर बातचीत कर सकते हैं क्या?नहीं लेकिन हाँ एक कमरे के अंतिम छोर पर बैठा व्यक्ति अगले कमरे के शुरुआती छोर पर बैठे व्यक्ति से आराम से बातचीत कर सकता है.वास्तव में कई बार जन्मकुंडली में ऐसा ही देखने को मिलता है,कि एक भाव में स्थित दो ग्रहों में तो युति का फल नहीं मिलता जबकि दो अलग भावों में बैठे ग्रहों की युति का फल प्राप्त होता है.एक बात और जैसे मान लें कि एक दोस्त सड़क पर चला जा रहा है और पीछे से उसका एक दोस्त आ रहा है,तो वह उस आगे वाले दोस्त को आवाज देकर रोकता है,उससे बात करता है फिर दोनों चल पड़ते हैं. अर्थात ग्रहों की युति जब बनने वाली होती है तो वह अधिक ताकतवर होती है और जब छूट रही होती है तो कमजोर होती जाती है.ये तो बात हुई दोस्ती और दुश्मनी की लेकिन जब उन्होंने पूछा की इन युति के प्रभाव को जन्मपत्रिका में किस प्रकार देखेंगे तो कुछ देर सोचने के बाद मैंने उन्हें समझाने के लिए एक सारणी बनाई उसे यहाँ पेश कर रहा हूँ.मैंने इस सारणी में चंद्र को प्रधान ग्रह के रूप में लिया है और अन्य ग्रहों का इसके साथ युति सम्बन्ध किस तरह होगा इस पर चर्चा करने का प्रयास किया है,आशा है कि आप सब को भी पसंद आएगा.
                                                       -:चंद्र:-(विचार)
शनि(दु:ख,विषाद,कमी,निराशा)               :- मन में दु:ख,नकारात्मक सोच.
मंगल(साहस,धैर्य,तेज,क्षणिक क्रोध)        :-  विचारों में ओज,क्रांतिकारी विचार. 
बुध(वाणी,चातुर्य.हास्य)                           :- हास्य-व्यंग्य पूर्ण विचार,नए विचार.
गुरु(ज्ञान,गंभीरता,न्याय,सत्य)            :- न्याय,सत्य और ज्ञान की कसौटी पर कसे हुए गंभीर विचार.
शुक्र(स्त्री,माया,संसाधन,मिठास,सौंदर्य)     :- माया में जकड़े विचार,सुंदरता से जुड़े विचार.
सूर्य(आत्म-तेज,आदर)                            :- आदर के विचार,स्वाभिमान का विचार.
राहू(मतिभ्रम,लालच)                               :- विचारों का द्वंद्व,सही-गलत के बीच झूलते विचार.
केतु(कटाक्ष,झूठ,अफवाह)                        :- झूठ,अफवाह और सही बातों को काटने का विचार.
               यहाँ जैसे मैंने चन्द्रमा के केवल एक कारक को लेते हुए दुसरे ग्रहों के वे कारकत्व जो चंद्र से मिल सकते हैं,मिलाया है और युति का फल बतलाने का प्रयत्न किया है अब इन्हीं का फल अलग तरह से भी पता लग सकता है,जैसे ऊपर की सारणी की ही बात करें तो चंद्र माता का भी स्वामित्व रखता है,अब चंद्र रूपी माता का शनि के किस कारक से संयोग होगा यह विचार कर प्रभाव ज्ञात कर सकते हैं!यहाँ मैंने मूल तरीका बताने की कोशिश की है,कैसा लगा.यदि किसी सुधार की गुंजाइश हो तो अवश्य सूचित करें. 





Saturday, August 13, 2011

आखिर बुल्लेशाह फकीरी में रम गए


             

मनुष्य ईश्वर का ही अंश है इसलिए उसके अंतस में सदैव परब्रह्म का प्रतिबिम्ब विद्यमान रहता है!और मूल रूप से इसी प्रतिबिम्ब को साक्षात् प्राप्त कर लेना ही मनुष्य का लक्ष्य होता है लेकिन इस मायानगरी में प्रवेश करते ही सत्व,रज और तमोगुण के फंदे उसे इस प्रकार जकड लेते हैं,कि वह अपने प्रमुख लक्ष्य से विमुख हो जाता है!फिर भी मन में यदा-कदा ईश्वर को मिलने का विचार हिलोरें लेने लगता है,लेकिन यदि उस वक्त किसी श्रेष्ठ गुरु का सानिध्य प्राप्त हो जाये तो मनुष्य फकीरी की राह पर चलकर सबकुछ पा लेता है,अन्यथा जीवन भर सबकुछ पाकर भी फ़कीर ही बना रहता है!इसी सन्दर्भ में एक छोटी से घटना का उल्लेख यहाँ कर रहा हूँ,जो इस बात को चरितार्थ करती है,कि श्रेष्ठ गुरु का क्या महत्व है!और साथ-साथ यह भी बताती है,कि श्रेष्ठ गुरु ईश-अनुकम्पा से ही प्राप्त होता है!
 फ़कीर बुल्लेशाह एक रियासत के बादशाह थे!पर उनकी सदैव इच्छा रहती थी,कि वे अपना मन अध्यात्म में लगाएं,पर ग्रह-योग उनका साथ नहीं दे पा रहे थे और वे बस मन में सोचकर ही रह जाते थे!एक दिन एक फ़कीर घूमते-घूमते उनके राजमहल में पहुंचा!
फ़कीर ने राजा से पूछ लिया:-ये किसकी सराय है?
 राजा ने कहा:-यह सराय नहीं है बल्कि महल है और आप इस राजमहल को सराय कह रहे हैं!
फ़कीर ने कहा:- तुमसे पहले यहाँ कौन रहता था?
राजा ने कहा:-हमारे वालिद और उनसे पहले उनके वालिद यानि हमारे दादा हुज़ूर रहा करते थे!
फ़कीर ने कहा:-जहां लोग आते-जाते रहे,कुछ समय ठहरकर लौट जायें वह सराय नहीं तो और क्या है!
पर बुल्लेशाह को वैराग्य की वो शक्ति नहीं मिली,कि वो बात को पूरी तरह समझ पाते!कुछ दिनों के पश्चात एक फ़कीर और आया और महल के बाहर बैठकर एक गगरी में हाथ डालकर कुछ खोजने लगा!बुल्लेशाह जब बाहर घूमने निकले तो फ़कीर से पूछा कि बाबा क्या खोज रहे हो?
फ़कीर:-बेटा मेरा ऊँट खो गया है बस उसीको ढूंढ रहा हूँ!
राजा:-ये आप क्या कह रहे हैं बाबा,गगरी में ऊँट कैसे आ सकता है जो आप उसे गगरी में खोज रहे हो!
तब फ़कीर ने कहा कि जब तू महल में बैठकर अल्लाह को ढूंढ सकता है,तो मैं गगरी में ऊँट क्यों नहीं ढूंढ सकता !
तब बुल्लेशाह का वैराग्य चरम पर पहुँच गया!कुछ समय बाद उन्होंने  राजमहल(सराय)छोड़ दिया!पंजाब आकर फ़कीर बन गए और ईश्वर रूपी सच्ची दौलत उन्हें प्राप्त हो गयी!
    जय गुरुदेव.

Tuesday, April 12, 2011

कर्म और भाग्य -2

                                                  !! ॐ श्री गणेशाय नमः !! 
                                        
                       
                     कर्म और भाग्य के विषय में अपने इस लेख कि शुरुआत में,मैं कहना चाहूँगा कि,हमारे पूर्वज विद्वान मनीषियों ने अपने द्वारा रचित शास्त्रों और विभिन्न प्रकार के ग्रंथों में इस विषय पर अपने बहुत ही स्पष्ट विचारों को अत्यंत ही गूढ़ भाषा में और अनेक टुकड़ो में लिख रखा है I जिसे समझना इतना सहज नहीं है I लेकिन मुझे सदैव से ही ऐसा प्रतीत होता रहा है कि अवश्य ही इन शास्त्रों में आपस में कोई सम्बन्ध है I अलग - अलग प्रतीत होने वाले ये ग्रन्थ एक दुसरे से पूर्ण रूप से अंतर्ग्रथित हैं I और इन्हीं ग्रंथों और इनके संबंधों का अध्ययन करते करते ही मुझे कर्म और भाग्य रुपी इस गूढ़ विषय के बारे में अत्यंत ही स्पष्ट विचार प्राप्त हुए हैं .  ये सब मुझ पर श्री गणेश जी की असीम अनुकम्पा से संभव हुआ है , और मैं भी अपने पूर्वजों का ही अनुसरण करते हुए इस विषय का ज्ञान आप सभी विद्वतजनों की साथ बाँटने को तत्पर हूँ और आने वाले समय में धीरे -धीरे इस माध्यम से अपने सभी संकलित विचारों को भी आपके समक्ष प्रस्तुत करूँगा I

      फिलहाल कर्म और भाग्य कि चर्चा को आगे बढ़ाते हुए बात करते हैं  कि ,कर्म और भाग्य के मर्म को समझने के लिए हमें महर्षि वेदव्यास,गोस्वामी तुलसीदास और अनेकानेक विद्वतजनों कि लेखनी से उद्धृत हुए विषयों का सहारा लेना पड़ेगा I

इसी क्रम मैं शुरुआत करता हूँ वेदव्यास द्वारा रचित महाभारत कथा से :- जो इस विषय कि आत्मा के समान है I

     महाभारत के भीष्म पर्व में भीष्म - युधिष्ठिर संवाद और भीष्म - कृष्ण संवाद में इस विषय की पूर्णतया नींव रख दी गई है इ जहां से ईश्वर कर्म और भाग्य की गुत्थी को सुलझाने के लिए एक डोर प्रदान करते हैं I इसलिए इस विषय को आत्मसात करने के लिए इन संवादों कि गूँज अंतर्मन में होना अत्यंत आवश्यक है I

                      भीष्म - युधिष्ठिर संवाद

दिनभर तक चले भीषण युद्ध कि समाप्ति के पश्चात शाम के समय युधिष्ठिर अपने बंधु - बांधवों के साथ शर शैय्या पर उत्तरायण की प्रतीक्षा कर कर रहे कौरव-कुल-शिरोमणि भीष्मपितामह का कुशलक्षेम पूछने के लिए उनके पास जाते हैं I वहां पहुँचने पर प्रणाम कर युधिष्ठिर पितामह के चरणों के पास खड़े हो जाते हैं I कुछ देर मौन के पश्चात :-

युधिष्ठिर :- पितामह ,इस संसार में ऐसा क्यों होता है , कि शुभ और पुण्य कर्म करने वालों को जीवन भर संघर्ष करना पड़ता है , जबकि पाप कर्मों में लिप्त और जीवन भर भोग - विलासमय जीवन व्यतीत करने वाले कभी भी समस्याओं के भंवर में फंसते हुए नहीं देखे जाते , ऐसा क्यों पितामह ? ऐसा क्यों ?

पितामह :- पुत्र मैं जानता हूँ , कि तुमने आज मुझसे यह प्रश्न कौरवों और पांडवों के सम्बन्ध में पूछा है I अतः मेरी यह बात गौर से सुनो कि मनुष्य को अपने जीवन - काल में केवल अपने कर्मों का फल ही नहीं भोगना पड़ता अपितु स्वयं के साथ - साथ उसे अपने पूर्वजों के कर्मों के फलों का लेखा जोखा भी संभालना पड़ता है I इसलिए कई बार व्यक्तियों को जीवन भर धर्मं के मार्ग पर अडिग रहते हुए भी सुख का एक भी क्षण प्राप्त नहीं होता है और कई व्यक्ति ऐसे होते है ,जो जीवन भर अधर्म में लिप्त रहते हुए भी सुख भोग करते हैं I

                           भीष्म - कृष्ण संवाद

इसी प्रकार एक बार  शर - शैय्या पर लेटे गंगापुत्र भीष्म से मिलने के लिए श्रीकृष्ण जाते हैं I वहां उनके बीच जो वार्तालाप होता है ..........
गंगापुत्र :- प्रणाम वासुदेव ! आज मेरे जीवन को स्वयं से और कुछ प्राप्त करने की अभिलाषा नहीं रह गयी है ,अन्तकाल में जिसे साक्षात् स्वयं श्री हरि का ही संयोग प्राप्त हो जाये उसे अपने जीवन से और क्या प्राप्त करना बाकी रह जाएगा ! परन्तु हे देवकीनंदन एक बात है ,जो मुझे आज तक कचोट रही है ,आज्ञा है तो पूछूँ वासुदेव

कृष्ण :- अवश्य गंगापुत्र Iआप जैसे युगपुरुष को भी यदि कोई बात कचोट रही है , तो आपका संशय दूर करना मेरे लिए परम सौभाग्य की बात होगी I

गंगापुत्र :- हे वासुदेव मुझे अपने पिछले सौ जन्म तक का सब कुछ स्पष्ट रूप से याद है और वहाँ तक मुझे एक भी ऐसा कारन प्रतीत नहीं होता जिसके कारण मुझे आज इस शर-शैय्या पर विश्राम करना पड़ रहा है I

कृष्ण :- हे गंगापुत्र जहां तक तुम्हें याद है उससे एक जन्म पहले तुम एक बार किसी जंगल से गुजर रहे थे ,रास्ते में तुम्हारे पैर पर एक कीट आकर गिर गया और तुमने अपने पैर को झटक दिया जिसके कारण वह कीट पास की एक झाड़ी में जाकर गिर गया और काँटों में फंस कर
तड़पते हुए उसके प्राण निकल गए ! शेष आप स्वयं ज्ञानी हैं पितामह  यदि इन दो वार्तालापों पर गौर करें तो स्पष्ट हो जाता है की मनुष्य के जीवन पर अपने पिछले जन्म के कर्मों के साथ - साथ अपने  पूर्वजों के कर्म को भी यथा संभव भोग करना पड़ता है I

साधारण जुबान  में हम इनका प्रयोग भी करते हैं,लेकिन इन पर कभी ध्यान नहीं दे पाते हैं I

उदहारण के तौर पर मारवाड़ी भाषा के बोलने वालों लोगों जबान से अक्सर ये बातें सुनी जा सकती है ....
*-*   देखो फलां व्यक्ति आज अपने बुजुर्गों के शुभ कर्मो का फल भोग रहा है, इसके माँ बाप बहुत सेवा पूजा करने वाले थे ,जिसके कारण ये आज

अपनी जिंदगी में इतना सफल हो रहा है I

*-*   खोटे किये हैं पिछले जनम में तो अब खोटे भुगत !

यहाँ तक चिंतन व मनन करें शेष अगले लेख में

आज का टिप :-शनि ग्रह ह्रदय मैं संतोष और दया का करक है I जब  शनि की साढ़े साती , ढैय्या या दशा चल रही हो तो ह्रदय में संतोष रखना चाहिए , होठों पर मिठास रखनी चाहिए ,दूसरों के प्रति मन में बुरे विचार नहीं रखने चाहिए और मौन रखने का प्रयास करना चाहिए
सभी से प्रेम से बात करनी चाहिए फिर देखिये  कैसे शनि  ग्रह आपको सबसे अच्छा  ग्रह लगने लगेगा !

शेष शुभम !
जय गणेश जय गणेश
जिस पर हो तेरी कृपा दृष्टि
उसके लिए इस ब्रह्माण्ड में
क्या बचा है शेष
जय गणेश जय जय गणेश

                        










































Monday, April 4, 2011

कर्म और भाग्य-1

                                                                                        
                             
                                                           

  1.                             
गीता के दूसरे अध्याय के सेतालीसवे श्लोक में श्री कृष्ण कहते हैं, कि हे मनुष्य -  तेरा केवल कर्म करने में ही अधिकार है , कर्म के फलों में तेरा कोई हस्तक्षेप  नहीं है !

 होइहि सोई जो राम रचि राखा , कों करि तरक बडावहिं  साखा !
   
   रामचरितमानस में तुलसीदास भी कहते है, कि होता  वही है , जो राम अर्थात ईश्वर ने निर्धारित कर दिया है , इसलिए हमें व्यर्थ ही तर्क नहीं करना चाहिए ! महर्षि वेदव्यास और तुलसीदास के इन दोनों कथनों कि तुलना करे तो यही प्रतीत होता है , कि मनुष्य के जीवन पर भाग्य का ही प्रभाव होता है ! तो क्या ये सही है मनुष्य के द्वारा किये गए कर्मो का कोई औचित्य नहीं है और यदि है तो फिर इन दो महापुरुषों के कथनों में केवल भाग्यवादिता का ही उल्लेख 
क्यों हुआ है ! इसी परिप्रेक्ष्य में यदि बात करे तो रामचरितमानस में ही तुलसीदास जी ने यह भी कहा है कि कर्म की  भी जीवन में उतनी ही उपादेयता है जितनी भाग्य की  !

कर्म प्रधान विश्वकरि राखा ! जो जस करिय सो तस फल चाखा !
  
     अर्थात जो जैसा कर्म करेगा उसे वैसा ही फल प्राप्त होगा!
अब यदि जीवन  के साथ अध्यात्म कि तुलना कि जाये तो प्रतीत होता है कि, जब ये दो महापुरुष भी इन दोनों विचारों कि तुलना नहीं कर सके तो हमारी औकात ही क्या है ! परन्तु क्या ये सही है , कि वेद व्यास
 और तुलसीदास जैसे महानुभाव भी कर्म और भाग्य कि गुत्थी कों सुलझा नहीं पाए थे ! सोचने पर विश्वास तो नहीं होता लेकिन क्या करे कही इन दो विषयों का कोई स्पष्ट उल्लेख नहीं मिलता ! फिर क्या करे कि इन दोनों विषयों का कोई स्पष्ट ज्ञान प्राप्त हो जाये !
तो फिर इंतज़ार कीजिये मेरे अगले लेख का जिसमे गणेशजी  इस गूढ़ विषय का
ज्ञान प्रदान करेंगे !ये इतना भी सहज नहीं होगा कि दो और दो चार हो जाते हैं  इसे समझने के लिए नियमित अध्ययन कि अति आवश्यकता होगी अतः आप सब पाठक गणों
से अनुरोध है कि इस विषय पर मेरे सभी लेख नियमित रूप से पढने का प्रयास करे! आप इन दोनों गूढ़ प्रश्नों के  भंवर में से स्वयं ही ज्ञान-दीप्ति कों उदय होता हुआ देखेंगे !
एक बात और मै अपने हर लेख में एक ऐसी बात बताने कि  कोशिश करूँगा जो साधारण जिंदगी में सभी के काम आ सके I
आज का TIP   :- जिन व्यक्तियों कि जन्म कुंडली में शुक्र राहू से ग्रसित  हो उन्हें श्रीमद्भागवत में से कालिया मर्दन कि कथा  का पाठ करना चाहिए और कालिया मर्दन कि तस्वीर अपने कमरे में लगानी चाहिए !



जय गणेश जय जय गणेश !
जय गणेश जय जय गणेश !