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Saturday, February 24, 2018

AIDS AND ASTROLOGY

            इस विषय पर विशेषज्ञतापूर्ण तरीके से कुछ कहना तो उचित नहीं होगा लेकिन हाँ यदि     एड्स के लक्षणों और ग्रहों के लक्षणों को मिलाने का प्रयत्न करें तो कुछ पौराणिक घटनाओं के     सहयोग से इसे  समझने का प्रयत्न किया जा सकता है, कि कौन से ग्रह इस रोग के लिए जिम्मेदार हो  सकते हैं और किस प्रकार के तरीकों से इस रोग पर काबू पाया जा सकता है. यदि श्री गणेश की अनुकम्पा हुई  तो वह दिन भी दूर नहीं जब ज्योतिष,योग और आयुर्वेद मिलकर इस सर्वकालिक भयंकर बीमारी का समूल नाश कर देने में सक्षम होंगे .
    
           यदि  AIDS  के साधारण लक्षणों की बात करें तो ये सब जानते हैं, कि एड्स का VIRUS (वायरस) शरीर के प्रतिरोधक तंत्र (IMMUNITY SYSTEM)  को धीरे - धीरे इतना कमजोर कर देता है, कि साधारण रोगों से लड़ने में भी वह सक्षम नहीं रह पाता है . अर्थात ज्योतिष की भाषा में कहें तो मंगल को धीरे - धीरे शक्तिहीन कर देता है, क्योंकि मंगल (MARS) ही हमारे  शरीर का सेनापति है और इसे ज्योतिष में  COMMANDER-IN-CHIEF कहा जाता है, जो शत्रुओं से रक्षा करने का कार्य करता है और एड्स का RETRO VIRUS इसी मंगल की शक्ति को क्षीण करने का कार्य करता है . सबसे मजे की बात तो यह है, कि यह वायरस मंगल से आमने सामने का युद्ध नहीं करता बल्कि रूप बदल - बदल कर युद्ध करता है ताकि इसे पहचाना नहीं जा सके . सभी जानते हैं कि एड्स का RETRO VIRUS  अपनी सभी स्थितियों को लगातार बदलता रहता है जिसके कारण हमारा सेनापति अर्थात 'श्वेत रुधिर कणिकाएं' (W.B.C.) इन्हें पहचान नहीं पाती हैं और इनके विरुद्ध एंटीबोडीज (ANTIBODIES)  का निर्माण नहीं हो पाता है, और ये लगातार शरीर सैन्य शक्ति का विनाश करते रहते हैं . क्या  आप जानना नहीं चाहेंगे कि शरीर के सेनापति मंगल के साथ कपट युद्ध  करने वाले ये वायरस किस ग्रह  का प्रतिरूप हैं. बिलकुल सही सोचा आपने ,ये है - " राहु ". अमृतपान के समय राहु  ही अपना रूप बदलकर देवताओं के मध्य जाकर बैठता  हैं . अतः रूप बदलने का गुण राहु  में पाया जाता है . ये कहा जा सकता है, कि एड्स मंगल और राहु  की लड़ाई है जिसमें राहु  की विजय प्रतीत होती है लेकिन एक बात यहाँ और जोड़ना चाहूँगा कि इस राहु  को  भगवान सूर्य और चंद्र  के द्वारा पहचान लिया गया था और भगवान नारायण को इस बात की सूचना दी गई  थी जिसके बाद भगवान् नारायण के द्वारा इसका सिर  काट दिया गया था . यदि ग्रहों के इस कारकत्व और पौराणिक कथाओं पर विचार किया जाये तो संभव है कि कहीं पर जाकर हमें मंगल, सूर्य, चंद्र और बृहस्पति के उपचार द्वारा ज्योतिष, योग और आयुर्वेद के मिश्रित प्रयासों द्वारा इसका उपचार प्राप्त हो जाये . ईश्वर से इसी प्रार्थना के साथ लेख को आंशिक विराम देता हूँ .



Monday, August 24, 2015

तैंतीस कोटि या तैंतीस करोड़ देवता

                                             देवताओं की संख्या के बारे में बाकी जानकारी तो आप इन्टरनेट पर से कहीं भी हासिल कर सकते हैं मुझे जो बात कुछ विशेष लगी उसका जिक्र यहाँ कर रहा हूँ  . देवी - देवताओं की संख्या को लेकर मैं भी यही सोचता रहा था , कि देवता तो तैंतीस करोड़ होते हैं . एक बार मैंने सुना कि जोधपुर में तैंतीस  करोड़ देवी - देवता का मंदिर है वहाँ गया भी पर कुछ समझ नहीं आया ..... अब फिर वही उधेड़बुन शुरू हो चुकी थी ............ पर किया जाये तो क्या ?


                                                         फिर एक दिन सिद्धार्थ भाईसाब (Astrologer Sidharth ) ने बताया की देवता तैंतीस प्रकार के होते हैं . कोटि का आशय प्रकार से है न कि करोड़ से . बात समझ तो आ चुकी थी लेकिन यह सब कहाँ वर्णित है इसकी खोज के दौरान जो पता चला वह लिखे देता हूँ -

१. ऋग्वेद १/१३९/११ के अनुसार कुल तैंतीस देवता हैं जिनमें से ११ पृथ्वी में , ११ अन्तरिक्ष में और ११ द्युलोक में है .
२. शतपथ ब्राह्मण ११/६/३/५ के अनुसार ८ वसु , ११ रूद्र ,१२ आदित्य ,१ इंद्र और एक प्रजापति कुल तैंतीस देवता हैं .
                       यहाँ "कोटि" शब्द प्रकार - वाचक है संख्या - वाचक नहीं . 

Thursday, October 4, 2012

धार्मिक कर्म में मौलि बंधन क्यों ?

       किसी भी शुभ कार्य से पहले जैसे कोई पूजा -  अनुष्ठान , गृह प्रवेश ,दीपावली की पूजा  या अन्य कोई भी पूजन सर्वप्रथम पंडित जी यजमान (यज्ञमान) को तिलक करते हैं और मौली बंधते हैं फिर पूजा आरम्भ होती है ! मौली बंधते वक़्त इस  मंत्र का उच्चारण  जाता है:-


        येन  बद्धो बलीराजा दावेंद्रो महाबलः !
            तेन त्वामनुबध्नामि रक्षे  माचल माचल !! 


       ये प्रथा कब शुरू हुई और इसके महत्त्व के विषय में अनेक आख्यान शास्त्रों में मौजूद हैं !मौली बंधने की परंपरा तब से चली आ रही है, जब से महान , दानवीरों में अग्रणी महाराज बलि की अमरता के लिए वामन भगवान् ने उनकी कलाई पर रक्षा सूत्र बांधा था !

            इसे रक्षा  कवच के रूप में भी  शरीर पर बांधा जाता है !इन्द्र जब वृत्रासुर से युद्ध करने जा रहे थे तब इंद्राणी शची ने इन्द्र की दाहिनी भुजा पर रक्षा-कवच के रूप में मौली को बाँध दिया था और इन्द्र इस युद्ध में विजयी हुए ! 

      स्वास्थ्य के अनुसार मौली-बंधन से वात पित्त और कफ तीनों का शरीर में संतुलन बना रहता है और शरीर नीरोग रहता है !साधारणतया हम देखते हैं,कि यदि कोई कर्मकांडी पुरोहित जो कई दिनों तक चलने वाले अनुष्ठान में  हैं और दुर्भाग्यवश उनके कुटुंब में किसी निकट संबंधी की मृत्यु हो जाती है तो भी उनको "सूतक"का दोष नहीं लगता है और वो अपना अनुष्ठान निर्विघ्न पूरा कर सकते हैं,क्योंकि क्योंकि उनहोंने पूजन आरम्भ होने पर बंधी जाने वाली मौली बाँध  रखी है!यानी की मौली के प्रभाव से उस बड़े अनुष्ठान पर बाधा ताल जाती है ! 





    

Monday, January 9, 2012

4.रोहिणी


नक्षत्र:रोहिणी

                                                                     4.रोहिणी 
रोहिणी नक्षत्र का वैदिक नाम रोहिणी ही है!इस नक्षत्र में पांच तारे मिलकर शकट अर्थात गाड़ी की आकृति का निर्माण करते हैं!संहिता ग्रंथों में रोहिणी को शकट-भेदन कहा गया है!रोहिणी का अर्थ है ऊपर की ओर बढ़्ने वाली वस्तुएं!इस नक्षत्र का स्वामी ब्रह्मा को माना गया है!नौ ग्रहों में चंद्र रोहिणी नक्षत्र का अधिपति है!यह स्थिर नक्षत्र है,अर्थात इसमें स्थिरता वाले कार्य जैसे गृह-प्रवेश,बिजाई,व्यापार शुरू करना,मंदिर बनाना आदि कार्य शुरू किये जा सकते हैं!यह ऊर्ध्वमुख नक्षत्र है अर्थात ऊपर की ओर बढ़ने वाले कार्य जैसे नौकरी शुरू करना,बड़े पद को ग्रहण करना,और विकासशील कार्य शुरू किये जा सकते हैं!चैत्र मास का रोहिणी नक्षत्र शून्यसंज्ञक होता है,इस दिन कोई शुभ कार्य नहीं करना चाहिए!शनिवार को रोहिणी नक्षत्र हो तो अमृतसिद्धि योग का निर्माण होता है और यही नक्षत्र सोमवार को हो सर्वार्थसिद्धि योग का निर्माण होता है!अपवाद के रूप में शनिवार को रोहिणी नक्षत्र हो और उसी दिन एकादशी भी हो तो विषयोग का निर्माण होता है,जो सभी शुभ कार्यों के लिए वर्जित है!इस नक्षत्र के लिए जामुन की पूजा की जाती है!रोहिणी नक्षत्र की जाति किसान,मजदूर या हलवाहे की होती है!यह नक्षत्र स्त्रीसंज्ञक होता है!गोत्र का संबंध अत्रि मुनि से है!इसकी नाड़ी अन्त्या,गण मनुष्य और योनि सर्प की होती है!यह कालपुरुष की आँखों का स्वामित्व रखता है!अनुमष्तिष्क,ग्रीवा कशेरुक और तालू पर इसी नक्षत्र का अधिकार होता है!भूसे की गाडी के आकार जैसा यह नक्षत्र फरवरी माह मे रात को 9 बजे तक दिखाई देता है!
कारकत्व:-रोहिणी नक्षत्र अधिकता से सम्बंधित है जैसे कोई आपको प्रश्न करे कि बारिश होगी क्या? उस वक्त चंद्र और लग्न का सम्बन्ध रोहिणी नक्षत्र से हो तो अच्छी बारिश होती है!जुबान के पक्के,व्यापारी,अधिकारी,योगी,पानी के जीव,खेती करने वाले,जंगली प्रदेश!
नक्षत्रफल:-रोहिणी का संबंध विकास से है!सत्यवादी,चतुर,तेजस्वी,स्थिति को भांप लेने वाले,निडर,सांसारिक सुखों में तल्लीन,खेती से प्रेम,वाक्-पटु होते हैं!
पदार्थ:-रस वाले पदार्थ,ऊन,समय सात दिन!
व्यक्ति:-इनकी आँखें बड़ी-बड़ी होती है!अपने लक्ष्य के प्रति निष्ठावान होता है!नए विचार व परिवर्तन का स्वागत करता है!व्यवस्थित ढ़ग से काम करना रोहिणी नक्षत्र का विशिष्ट गुण है!जलचर,कृषक,राजसिक प्रवृत्ति के लोग,ट्रेवल एजेंट,जहाज का कप्तान इत्यादि!
रोहिणी नक्षत्र का वैदिक मंत्र:-ब्रह्मजज्ञानं प्रथमम्पुरस्ताद्विसीमः सुरुचे वेन आयवः सबुध्न्या उपमा अस्य विष्ठा: सतश्च योनिमसतश्च विध: !!  
बीमारियाँ:-गले की खराश,पाँव व छाती में दर्द,स्त्रियों को अनियमित मासिक!
मानसिक गुण:-सौंदर्य-प्रेमी,मधुर भाषी,स्थिर मानसिकता,प्रिय मिजाज वाला,शुद्ध ह्रदय,परोपकारी!
व्यवसाय:-यह कृ्षि उत्पादन व खनिज उद्योग से जुडा़ है!यात्रा वृत्तांत लेखक,आवास का क्रय-विक्रय करने वाला,
विशेष:-पौराणिक कथाओं के अनुसार रोहिणी चन्द्रमा की सत्ताईस पत्नियों में सबसे सुदर है!कृष्ण जी का जन्म भाद्रपद मास की कृष्णपक्ष अष्टमी तिथि को रोहिणी नक्षत्र में हुआ था!

Saturday, August 13, 2011

आखिर बुल्लेशाह फकीरी में रम गए


             

मनुष्य ईश्वर का ही अंश है इसलिए उसके अंतस में सदैव परब्रह्म का प्रतिबिम्ब विद्यमान रहता है!और मूल रूप से इसी प्रतिबिम्ब को साक्षात् प्राप्त कर लेना ही मनुष्य का लक्ष्य होता है लेकिन इस मायानगरी में प्रवेश करते ही सत्व,रज और तमोगुण के फंदे उसे इस प्रकार जकड लेते हैं,कि वह अपने प्रमुख लक्ष्य से विमुख हो जाता है!फिर भी मन में यदा-कदा ईश्वर को मिलने का विचार हिलोरें लेने लगता है,लेकिन यदि उस वक्त किसी श्रेष्ठ गुरु का सानिध्य प्राप्त हो जाये तो मनुष्य फकीरी की राह पर चलकर सबकुछ पा लेता है,अन्यथा जीवन भर सबकुछ पाकर भी फ़कीर ही बना रहता है!इसी सन्दर्भ में एक छोटी से घटना का उल्लेख यहाँ कर रहा हूँ,जो इस बात को चरितार्थ करती है,कि श्रेष्ठ गुरु का क्या महत्व है!और साथ-साथ यह भी बताती है,कि श्रेष्ठ गुरु ईश-अनुकम्पा से ही प्राप्त होता है!
 फ़कीर बुल्लेशाह एक रियासत के बादशाह थे!पर उनकी सदैव इच्छा रहती थी,कि वे अपना मन अध्यात्म में लगाएं,पर ग्रह-योग उनका साथ नहीं दे पा रहे थे और वे बस मन में सोचकर ही रह जाते थे!एक दिन एक फ़कीर घूमते-घूमते उनके राजमहल में पहुंचा!
फ़कीर ने राजा से पूछ लिया:-ये किसकी सराय है?
 राजा ने कहा:-यह सराय नहीं है बल्कि महल है और आप इस राजमहल को सराय कह रहे हैं!
फ़कीर ने कहा:- तुमसे पहले यहाँ कौन रहता था?
राजा ने कहा:-हमारे वालिद और उनसे पहले उनके वालिद यानि हमारे दादा हुज़ूर रहा करते थे!
फ़कीर ने कहा:-जहां लोग आते-जाते रहे,कुछ समय ठहरकर लौट जायें वह सराय नहीं तो और क्या है!
पर बुल्लेशाह को वैराग्य की वो शक्ति नहीं मिली,कि वो बात को पूरी तरह समझ पाते!कुछ दिनों के पश्चात एक फ़कीर और आया और महल के बाहर बैठकर एक गगरी में हाथ डालकर कुछ खोजने लगा!बुल्लेशाह जब बाहर घूमने निकले तो फ़कीर से पूछा कि बाबा क्या खोज रहे हो?
फ़कीर:-बेटा मेरा ऊँट खो गया है बस उसीको ढूंढ रहा हूँ!
राजा:-ये आप क्या कह रहे हैं बाबा,गगरी में ऊँट कैसे आ सकता है जो आप उसे गगरी में खोज रहे हो!
तब फ़कीर ने कहा कि जब तू महल में बैठकर अल्लाह को ढूंढ सकता है,तो मैं गगरी में ऊँट क्यों नहीं ढूंढ सकता !
तब बुल्लेशाह का वैराग्य चरम पर पहुँच गया!कुछ समय बाद उन्होंने  राजमहल(सराय)छोड़ दिया!पंजाब आकर फ़कीर बन गए और ईश्वर रूपी सच्ची दौलत उन्हें प्राप्त हो गयी!
    जय गुरुदेव.

शिव का तीसरा नेत्र :- एक रहस्य


जब कभी भी अध्यात्मिक चर्चाओं का दौर चल पड़ता है और उसी प्रवाह में भोलेनाथ अर्थात शिव के बारे में बात होने लगे तो एक तस्वीर मानस-पटल पर साफ़ रहती है,कि,शिव बड़े ही भोले देवता हैं,लेकिन क्रोधित होने पर वे तांडव करने लगते हैं,नृत्य के चरम पर उनके ललाट पर स्थित उनका तीसरा नेत्र खुलता है और सबकुछ भस्म!अब बात करें तीसरे नेत्र की तो क्या वास्तव में शिव के ललाट पर दो नेत्रों के समान तीसरा नेत्र होता है!अगर होता भी है तो उसमें ऐसा क्या है,कि वह केवल क्रोध आने पर ही खुलता है सामान्य अवस्था में बंद रहता है!                                                                                                          मैंने इस बारे में कुछ अलग विचार करना प्रारंभ किया और सोचते-सोचते आज दस पंक्तियों का विचार पककर तैयार हुआ सो आपके समक्ष पेश कर रहा हूँ!ये मेरा व्यक्तिगत विचार है,ऐसा ही होता हो आवश्यक नहीं!आशा है पाठकगण इसमें आवश्यकता होने पर सुधार का प्रयास करेंगे!    यदि आदिकाल से शुरू करें तो सृष्टि के आरम्भ में केवल पुरुषों की उत्पत्ति ब्रह्मा ने की!ब्रह्मा जब स्त्री की उत्पत्ति नहीं कर पाए तो उन्होंने शिव से प्रार्थना की तो शिव  ने आदिशक्ति माया(योगमाया) को स्त्री के रूप में उत्पन्न कर अपने शरीर से अलग किया और इसी माया ने स्त्री जाति का निर्माण किया!अतः स्त्री वास्तव में माया का ही प्रतिबिम्ब है!यह माया सदैव पुरुषों के ललाट पर ही निवास करती है,जैसे ही पुरुष के शरीर,नेत्र या मानसिक विचारों का संसर्ग स्त्री स्वरुप के साथ होता है,तो उसकी छवि सर्वप्रथम मनुष्य के ललाट पर जाकर स्थित हो जाती है!ललाट पर ही मनुष्य का ज्ञान -चक्षु स्थित होता है और यह छवि ललाट पर जाकर मनुष्य के ज्ञान-चक्षुओं पर पर्दा डाल देती है,जिसके कारण उसके दिमाग कुछ भी सोचने-विचार करने का सामर्थ्य समाप्त हो जाता है,कि वह जो कर रहा है वह सही है या गलत!उस समय केवल अंतरात्मा ही ये सन्देश देती है,कि तू जो कर रहा है वह गलत है लेकिन मष्तिष्क इस बात को मानने के लिए तैयार नहीं होता,क्योंकि वह तो माया की चपेट में होता है!अतः विचार किया जा सकता है,कि ललाट पर स्थित चक्षु कोई सामान्य नहीं बल्कि ज्ञान का बोध करवाने वाला नेत्र होता है!चूंकि साधारण मनुष्य माया के आवरण से पूर्णतया लिप्त रहता है अतः उसके ललाट पर इसका कोई अंश भी दृष्टिगोचर नहीं होता है!अब जब माया साधारण मनुष्य पर अपना त्रिगुणात्मक फंदा डालती है,तो वह पूर्णतया उसकी चपेट में आ जाता है पर जब यही प्रभाव कोई शिव पर करने का प्रयत्न करे तो वह ज्ञान रूपी अग्नि से जलकर भस्म हो जाता है!जिस प्रकार कामदेव हो गया था,जिसने शिव की माया का प्रयोग उन्हीं पर करने का प्रयत्न किया!शिव का तीसरा नेत्र शरीर मैं आज्ञा चक्र के केंद्र में स्थित है जहां विवेक बुद्धि का निवास होता है!देखा जाए तो शिव का तीसरा नेत्र ज्ञान पुंज है,जो अज्ञान रूपी अंधकार को जलाकर भस्म कर देता है!"साधारण रूप में देखें तो शिव ईश्वर हैं और बुरे लोगों को अपने तीसरे नेत्र की अग्नि से जलाकर भस्म कर देते है और यदि अलग तरह से देखने का प्रयत्न करें तो शिव का तीसरा नेत्र ज्ञान पुंज है जो अज्ञान का नाश करता है!"तो चलो तीसरा नेत्र हम भी प्राप्त करें!

Wednesday, July 6, 2011

ज्योतिष : पुरातन विवेचन :- आचार्य राज


आज बात कर रहा हूँ अपने पूजनीय गुरु श्री आचार्य राज द्वारा बताये गए एक पौराणिक किस्से का जिनका जिक्र उन्होंने अपनी पुस्तक "सितारों के अक्षर किरणों की भाषा" में भी किया है ! एक बात गुरूजी की किताबों के बारे में भी बताना चाहूँगा कि इनकी किताबें वास्तव में प्रसिद्द लेखिका अमृता प्रीतम के साथ संवाद है जिनका स्वरुप बाद में पुस्तकमय कर इनको प्रकाशित किया गया है ! दिल्ली के "किताब घर" से इनका प्रकाशन होता है ! इनकी दूसरी पुस्तक का नाम है "सितारों के संकेत"जिसमें आचार्य का स्वप्न ज्योतिष का गूढ़ ज्ञान दृष्टिगोचर होता है ! पुनः विषय पर आगे बढते हैं,आचार्य ने अपनी पुस्तक में ज्योतिष के उद्गम का विवेचन किया है, जिसका जिक्र मैं यहाँ उन्हीं के शब्दों में करने का प्रयास कर रहा हूँ ! 
     ज्योतिष की उत्पत्ति वेदों से होती है या ऐसा  कहें कि ज्योतिष वेदों का ही एक अंग हैं जिसे वेदों के नेत्र की संज्ञा दी गयी है !क्योंकि देखने का सामर्थ्य नेत्रों में होता है और ज्योतिष भी देखने का कार्य करता है !इस प्रकार सृष्टि के आरम्भ में ज्योतिष पर मूलतः प्रजापति ब्रह्मा का स्वामित्व था !जब जगन्नियन्ता परम पिता परमात्मा के आदेश से उन्होंने इस जगत के निर्माण का कार्य शुरू किया तो सर्वप्रथम उन्होंने तप के द्वारा सृष्टि के निर्माण की शुरुआत की !लेकिन कई युग बीत जाने पर उनके तप बल से आठ मानसिक पुत्रों को उन्होंने उत्पन्न किया !ये आठ पुत्र है सप्तर्षि और देवर्षि नारद !इसके बाद ब्रह्मा जी ने विचार किया कि इस प्रकार से मानसिक सृष्टि करने में तो करोड़ों युग बीत जायेंगे तो क्या किया जाय तब उनके मन में मैथुनी सृष्टि का विचार उत्पन्न हुआ ! उन्होंने अपने आठों पुत्रों को बुलाया और उनके समक्ष मैथुनी सृष्टि के विचार को रखा !उनके सात पुत्र तो मैथुनी सृष्टि स्वीकार करने के लिए तैयार हो गए "ये थे सप्तर्षि" लेकिन उनका एक पुत्र ने मैथुनी सृष्टि को स्वीकार नहीं किया और वो थे "नारद"!तब मैथुनी सृष्टि के विचार को अपनाने वाले पुत्रों के लिए ब्रह्मा ने स्त्री के निर्माण का कार्य शुरू कर दिया लेकिन काफी समय के बाद जब वे इस कार्य में पूर्ण रूप से सफल नहीं हो सके तो उन्होंने देवाधिदेव महादेव की शरण ली और महादेव ने प्रसन्न होकर पहले अर्धनारीश्वर रूप ग्रहण किया फिर नारी स्वरुप को अपने शरीर से अलग कर स्त्री जाति की उत्पत्ति की !इस प्रकार मैथुनी सृष्टि की शुरुआत हो गयी !फिर ब्रह्मा जी ने विचार किया कि मेरे सात पुत्र तो मैथुनी सृष्टि स्वीकार करके मर्त्यलोक में निवास करने चले गए अब मैं नारद को क्या दूं इस प्रकार विचार करते हुए ब्रह्मा जी ने नारद को वेदों में से ज्योतिष का ज्ञान प्रदान किया और नारद दैवज्ञ हो गए !दैवज्ञ वो होता है जो सात जन्म आगे और पीछे तक का ज्ञान ज्योतिष से प्राप्त कर लेता है !जब नारद भी इस कोटि को प्राप्त हो गए तो वह सदैव दैत्यों और देवताओं को आने वाले भविष्य के लिए पहले से ही सूचित करते रहते जिसके कारण कई बार सुनने को मिलता है , कि नारद ही देवताओं और दानवों को लड़ाने  का कार्य करते थे लेकिन वास्तव में नारद को सब कुछ पता होता था वो तो केवल आगाह करने का कार्य करते थे जो होना था वो तो निश्चित था !
             इस प्रकार ज्योतिष का पौराणिक  उद्गम "नारद पुराण"को माना जाता है !ऐसा कहा जता है , कि शुरुआत में इसमें 84 लाख श्लोक हुआ करते थे लेकिन वक्त की धुल में उड़ते - उड़ते ये श्लोक आज  नाम मात्र ही रह गए हैं !चाहें तो इस विषय पर ज्योतिषीगण नारद पुराण का पठन कर सकते हैं !  कहा जा सकता है कि वर्तमान में जो ज्योतिष का लेख विद्यमान है वह अपूर्ण है और सतत प्रयासों के द्वारा उनकी रचना पुनः करनी होगी !ज्योतिष को विभिन्न शाखाओं में विभाजन कर उनका तार्किक तरीकों से अध्ययन करना होगा !ज्योतिष फल बतलाने वाले पंडितों को ये बात समझनी होगी की विवाह की तिथी और नौकरी बताने वाला पंडित अचानक से बरसात का दिन ,चुनाव की जीत ,ज्वालामुखी का फटना आदि नहीं बता सकता क्योंकि ये ज्योतिष की अलग - अलग शाखाएं हैं लेकिन इस बात को समझे बिना पांडित्य को बरकरार रखने के लिए फलादेश किया जाता है और गलत होने पर पंडित जी के साथ साथ इस विषय को भी खामियाजा भुगतना पड़ता है !इसलिए बिना ज्ञान के ज्योतिष की विभिन्न शाखाओं में फलादेश करने से बचना चाहिए और पहले एक शाखा पर पूरी पकड़ करने का प्रयास करना चाहिए !मैं आह्वान करता हूँ भारत के उन सभी ज्योतिष से जुड़े लोगों का कि वो आगे बढे और जिस तरह से भी कर सकते हैं इस विषय को प्रामाणिक और उपयोगी बनाने में मदद करें ! गणेश जी हमें हमारे कार्य में सफल करे ! जय गणेश !

! जय गणेश ! 
! जय जय गणेश !!

Tuesday, June 28, 2011

श्री गणेश कहते हैं

          आज तक हमने सिर्फ ये सुना और जाना है,कि किसी भी पूजा के करने से पहले गणेश जी पूजा करनी चाहिए आइये आज गणेश जी के प्रथम पूज्य होने के अलावा उनके अन्य पक्षों पर दृष्टिपात करते हैं ! श्री गणेश केवल उपदेशात्मक रूप से नहीं बल्कि इस मोह माया युक्त संसार में जीवन को किस प्रकार व्यतीत करना चाहिए इसके बारे में अपने प्रत्येक अंग से कुछ न कुछ कहते हैं !आइये जानते हैं उन सभी नियमों के बारे में जो हमें गणेश जी प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से अपने शरीर के विभिन्न अंगों के द्वारा बता रहे  हैं !
मस्तक :- गणेश जी का मस्तक काफी बड़ा होता है जो हमें अपनी सोच को बड़ा बनाये रखने की और बड़े विचारों को मस्तिष्क में स्थिरता रखने की सलाह देता है !
आँखें :- गणेश जी आँखें काफी छोटी - छोटी होती है जो हमें  सन्देश देती है , कि जीवन में सफल होने के लिए एकाग्रता का होना सर्वाधिक महत्वपूर्ण है !एकाग्रता के बिना सरल से सरल काम को भी पूर्ण नहीं किया जा सकता है और एकाग्रता हो तो पानी में देखकर भी घूमती हुई मछली की आँख को निशाना बनाया जा सकता है ! 
कान :- गणेश जी के कान काफी बड़े होते हैं और ये बड़े कान हमें एक अच्छा श्रोता बनने का सन्देश देते हैं !अर्थात हमारे अंदर धैर्य और एकाग्रता पूर्वक अच्छी बातों को सुनने का सामर्थ्य होन चाहिए ! 
कुल्हाड़ी :- गणेश जी के दांये हाथ की कुल्हाड़ी हमें ये प्रेरणा देती है , कि हमें सांसारिक बंधनों की असत्य डोरियों को काटकर एकमात्र सत्य ईश्वर की और अग्रसर होने का प्रयत्न करना चाहिए ! 
रस्सी :-गणेश जी के बांये हाथ की रस्सी स्वयं को अपने जीवन के चरम लक्ष्य की और खींच कर ले जाने का संकेत देती है और यह लक्ष्य है स्वयं श्री गणेश !
मुख :-गणेश जी का मुख काफी छोटा होता है परन्तु ये हमें दो संकेत देता है , कि एक तो हमें कम बोलना चाहिए !कम बोलने से तात्पर्य है कि जितनी आवश्यकता हो उतना ही बोलना चाहिए अधिक नहीं ! दूसरा संकेत जो हमें गणेश जी के मुख से प्राप्त होता है वह है ,कि हमें  कम खाना चाहिए अर्थात जीवन के लिए भोजन करना चाहिए न कि केवल स्वाद के लिए !
दांत :-गणेश जी का  केवल एक ही दन्त होता है दूसरा नहीं अर्थात हमें केवल अच्छी वस्तुओं का संग्रह करना चाहिए बुरी वस्तुओं का नहीं !दूसरा संकेत हमें ये प्राप्त होता है , कि यह शरीर नश्वर होता है जिसे एक दिन अवश्य ही खत्म हो जाना है !इसलिए शरीर का अधिक मोह नहीं करना चाहिए !लेकिन "शरीर माध्यम खलु धर्मंसाधनं"के विचार को महत्व देते हुए हमें शरीर को नीरोग रखने का पूरा कर्म करना चाहिए क्योंकि शरीर ही संसार में सभी धर्मों को पूरा करने का माध्यम है और मोक्ष का माध्यम है !
सूंड :- गणेश जी की सूंड मानव शरीर की adaptibility का सर्वश्रेष्ठ उदहारण है !यह सूंड हमें शरीर में दुसरे परिवर्तनों को सहेजने और उनके साथ उसी कुशलता से काम करने का सन्देश देती है !जिस प्रकार स्वयं गणेश जी ने हाथी की सूंड का सामंजस्य स्वयं के शरीर के साथ करते हुए अपने मुख के सभी कार्य सूंड के साथ निर्विघ्न्तापूर्ण संपन्न किये !
हस्त :- गणेश जी का दांया हाथ जो आशीर्वाद  देने की मुद्रा में उठा हुआ है ,वो सभी जीवों को सुखपूर्वक जीने का आशीर्वाद दे रहा है !और साथ ही साथ संसार से ईश्वर तक जाने वाले उस दिव्य पथ को भी आलोकित कर रहा है ! 
मोदक अर्थात लड्डू :-मोदक हमें इस बात की सूचना देता है कि यदि आप कोई कर्म करते हैं तो आपको उसका फल तो मिलेगा ही लेकिन यदि आपका कर्म और उसके प्रभाव नश्वर होते हैं तो आपको नष्ट  होने वाला फल ही प्राप्त होगा लेकिन यदि आपके कर्म ईश्वर प्राप्ति के मार्ग को प्रशस्त करने वाले हैं तो आपका प्रसाद भी अलौकिक ,दिव्य और गणेश जी के मोदक के समान अनश्वर होगा ! (अर्थात साधना का फल है मोदक)
बड़ा पेट  :-गणेश जी का बड़ा पेट हमें इस बात की शिक्षा देता है ,कि हमें जीवन में जो कुछ भी हो रहां है उसे शांतिपूर्वक पचा लेना चाहिए!चाहे वह अच्छा हो रहा है या बुरा ! 
प्रसाद :- गणेश जी सामने रखा हुआ प्रसाद ये बता रहा  है , कि सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड आपके कदमों में है और आपके आदेश की प्रतीक्षा कर रहा है ! 
मूषक(चूहा):- मूषक अर्थात गणेश जी का वाहन !मूषक के द्वारा गणेश जी ये बताना चाह रहे हैं ,कि ऐसी इच्छाएं जो हमारे वश में नहीं होती हैं वो नुकसान पहुंचा सकती है इसलिए इच्छाएं सदैव उस आकार की ही होनी चाहिए कि हम उन पर सवारी कर सकें यदि यदि इच्छाएं हम पर सवारी करना शुरू कर देती है तो मुश्किल हो जाती है !विशालकाय गणेश जी का वाहन छोटा सा मूषक इसी बात की दार्शनिक व्याख्या करता नजर आता है  !
         क्यों गणेश का केवल मुख नहीं अंग - अंग बोलता है और वो भी लाजवाब !गणेश जी ने इतनी बुद्धि और अवसर दिया ताकि उनकी यशगाथा में शामिल हो सकूं इसके लिए उनका धन्यवाद ! 
! जय गणेश !