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Saturday, June 16, 2012

एक अनोखा विचार

                                  एक अनोखा विचार 

जिस प्रकार से ब्रह्माण्ड का केंद्र जगन्नियन्ता सर्वशक्तिमान ईश्वर को मन जाता है और उसके बिना   इस सम्पूर्ण  का अस्तित्व मात्र भी संभव नहीं है !जिस प्रकार हमारे सौरमंडल का केंद्र सूर्य है!सूर्य ही है जो सभी ग्रहों,उपग्रहों और अन्य पिंडों को एक निश्चित नियम में बांधकर उन्हें घूर्णन के लिए सामर्थ्य प्रदान करता है,और उनके अस्तितत्व को बनाये रखता है !सूर्य के बिना सौरमंडल की कल्पना भी नहीं की जा सकती है और यदि वर्तमान सौरमंडल में से सूर्य को हटाकर सौरमंडल की कल्पना करें तो सबकुछ बिखरा हुआ और तहस - नहस ही नज़र आएगा !उसी प्रकार इस केन्द्रत्व के नियम का सभी जगह पालन होता है !उदहारण स्वरुप जिस प्रकार चंद्र का केंद्र पृथ्वी है और पृथ्वी का केंद्र सूर्य ! सूर्य का केंद्र है आकाश गंगा !आकाश गंगा का केंद्र है ब्रह्माण्ड पालक परमब्रह्म !उसी प्रकार से घर-परिवार में, समाज में,राज्य में ,राष्ट्र में और विश्व में इसी प्रकार के एक प्रभावशाली केंद्र की आवश्यकता है जो सूर्य के सामान तेजस्वी हो और दूसरों को जीवनी शक्ति प्रदान करने का सामर्थ्य रखता हो ,जो पृथ्वी के सामान धैर्यवान हो ,जो आकाश गंगा के सामान विस्तार्युक्त हो और जो परमपिता के समान विशाल हृदय हो !जब तक केन्द्रत्व का ये समायोजन ठीक प्रकार से नहीं होगा तब तक ये अस्थिरता चलती ही रहेगी !उदहारण देखें जिस प्रकार परिवार का केंद्र होता है परिवार का मुखिया या पिताजी !यदि दुर्भाग्यवश वे न हों या उनका प्रभाव घर पर सूर्य के सामान न हो तो घर के सभी ग्रह अर्थात सदस्य किसी नियम में बंधे नहीं रह सकते हैं वे इधर - उधर बिखर जाते हैं औए स्वरचित नियम पालन करते हैं,समाज में कोई शीर्ष नेता न हो या कमजोर हो तो समाज वक्त के साथ नहीं चल पाता है इसीलिये "यत्पिंडे तत्ब्रह्मांडे"नियम के अनुसार इन सभी स्थानों पर इन केन्द्रधिपतियों का होना अत्यंत आवश्यक है !


                                                                                                                              -श्रीराम बिस्सा 

Monday, January 9, 2012

3.कृतिका


नक्षत्र:कृतिका

कृतिका नक्षत्र या सात बहने                                  3.कृतिका
कृतिका नक्षत्र में छः तारे मिलकर खुरपे या फरसे की आकृति का निर्माण करते हैं!वैदिक साहित्य में कृतिका नक्षत्र में सात तारे माने गए है!तैत्तिरीय ब्राह्मण में कृतिका नक्षत्र में सात आहुतियों का प्रावधान है!इस नक्षत्र पर अग्निदेव का स्वामित्व है!ग्रहों में सूर्य इस नक्षत्र का अधिष्ठाता है!कृतिका नक्षत्र दो तरह का माना जा सकता है,पहला भाग जो मंगल की मेष राशि के अंतर्गत आता है और दूसरा जो शुक्र की वृषभ राशि के अंतर्गत आता है!यह मिश्र नक्षत्र है,इसमें लगभग सभी कार्य किये जा सकते हैं!कृतिका भी अधोमुख नक्षत्र है,अतः इसमें भी भरणी के समान अधोगमन वाले कार्य किये जा सकते हैं!कार्तिक मास में कृतिका नक्षत्र के दिन कोई भी शुभ या विशेष कार्य नहीं करना चाहिए क्योंकि यह शून्यसंज्ञक होता है!मंगलवार को कृतिका नक्षत्र सर्वार्थसिद्धि योग का निर्माण करता है,इस नक्षत्र से अमृतसिद्धि योग नहीं बनता!इस नक्षत्र के लिए गूलर के वृक्ष की पूजा की जाती है!कृतिका ब्राह्मण जाति का नक्षत्र है!यह स्त्री जाति का नक्षत्र है और काल पुरुष के शरीर में भौहों का आधिपत्य रखता है!इसका राशि स्वामी मंगल,योनी मेष,नदी अन्त्य और गण राक्षस का होता है!आँखें और कार्निया पर भी इसी नक्षत्र का नियंत्रण होता है!कंठ नली और निचले जबड़े पर इस नक्षत्र का स्वामित्व होता है!
कारकत्व:-सुनार,लुहार,अग्नि से सम्बंधित कार्य करने वाले,ज्वलनशील पदार्थों का कार्य,तेज़ाब,गैस,यज्ञ कार्य करने वाले,गुप्त धन से सम्बंधित,तिजोरी,सुरंग,सफ़ेद फूलों के पदार्थ,BEAUTY PARLOUR,भाषा शास्त्र,व्याकरणाचार्य,ज्योतिषी,श्मशान,खान के कार्मिक इत्यादि!
नक्षत्रफल:-कम खाने वाले(वृष में हो तो अधिक खाने वाले)तेजस्वी "जहां जाये छा जाये"दानी,विपरीत लिंग के बारे में बातचीत के शौक़ीन,अनुशासित,तुनक मिजाज और लगनशील होते हैं!धार्मिक,संस्कारी,धनी और स्वाध्याय करने वाले होते हैं!नक्षत्र पीड़ित हो तो परस्त्रीगामी होते हैं!
पदार्थ:-तिल,जौ,हीरेसोना,चांदी,ताम्बा,लोहा आदि धातु!समय (आठ मास)!
व्यक्ति:-अग्निपूजक,पारसी,कर्मकांडी,अग्नि से जीविकोपार्जन करने वाले,मन्त्रज्ञ,R.B.I. के अधिकारी,हजामत बनाने वाले(नाई),INCOME-TAX,SALES-TAX,SERVICE-TAX,पंचांग व कैलेंडर छापने वाले!
कृतिका नक्षत्र का वैदिक मंत्र:-अग्निमूर्धादिवः ककुत्पतिः पृथिव्यामयम्!अपा गुं रेता गुं सिजिंवतिः!! 
बीमारियाँ:-कील-मुंहासे,दृष्टि-दोष,गर्दन के रोग,गले में रोग,घुटने पर निशान!
मानसिक गुण:-दोस्तों के झुण्ड में रहने वाला,आदर सत्कार में कुशल,विलासी,सामाजिक,रचनात्मक प्रवृत्ति,सरकार व राज्य कर्मचारियों से लाभ!
व्यवसाय:-सरकारी विभागों से लाभ,ऋणग्रस्त भी हो सकता है!कलाकार,शिल्पी,दवा का काम,अंतर्राष्ट्रीय व्यापारी,फोटोग्राफी का काम करने वाला!TAX-COLLECTOR,केशों का काम,इत्र का व्यापार इत्यादि!

Friday, August 19, 2011

ग्रहों की युति


  बात कुछ दिनों पहले की है,मेरे एक दोस्त मनीष जी गंगानगर से मुझसे मिलने बीकानेर आये हुए थे. बातों के दौरान ज्योतिष विषय पर चर्चा शुरू हुई. इसी क्रम में उन्होंने मुझसे पूछा,कि ग्रहों की युति को आप किस तरह से परिभाषित करेंगे. उसके बाद हमारी कुछ बातें इस विषय पर हुई,शायद ज्योतिष जिज्ञासुओं के लिए काम की हो इसलिए संवाद रूप में यहाँ लिख रहा हूँ.

मनीष जी:- ग्रहों की युति अपना प्रभाव किन-किन तरीकों से देती है?यदि दो ग्रह हों तो और यदि तीसरा ग्रह भी उनमें सम्मिलित हो तो उसका क्या प्रभाव पड़ता है,क्या वह पूरी तरह से युति के प्रभाव को बदल देता है या फिर कुछ और?सबसे महत्वपूर्ण बात हम फलादेश करते समय इन युतिओं को किस तरह काम में ले सकते हैं?
ज्योतिष विद्यार्थी:-सबसे पहले तो मोटी बात करते हैं ग्रहों के मैत्री आधारित युति संबंधों पर.ये सम्बन्ध मुख्यतया तीन तरह के होते हैं!
1.जब दो मित्र ग्रह युति में हों.
2.जब दो सम ग्रह युति में हों.
3.जब दो शत्रु ग्रह युति में हों.
              अब साधारण सी बात है,कि जब दो मित्र साथ-साथ होंगे तो कुछ न कुछ सार्थक होगा जैसे यदि वह किसी विषय पर चर्चा कर रहे हैं या अगर कहीं घूमने गए हैं,तो माहौल शांतिमय और माधुर्यपूर्ण होता है.अगर दो अजनबी जो एक दुसरे के पास-पास बैठे हैं,तो उनमें आपस में जान-पहचान होगी कुछ बातचीत होगी और साधारण शांतिमय माहौल होगा.अंत में बात करते हैं शत्रु ग्रहों की,अगर दो शत्रु ग्रह एक साथ हो तो वो उस स्थान को अशांतिमय कर देंगे और विध्वंसकारी प्रवृत्तियों को वहाँ केंद्रित करेंगे.
        अलग दृष्टिकोण से देखने पर मान लें की एक कमरा एक राशि है,यदि एक ग्रह उस राशि के एक किनारे पर बैठा है और दूसरा दुसरे किनारे पर तो युति प्रतीत होते हुए भी उनकी युति का फल प्राप्त नहीं होता है.अब क्या दो लोग एक कमरे के दो अलग-अलग छोर पर बैठकर बातचीत कर सकते हैं क्या?नहीं लेकिन हाँ एक कमरे के अंतिम छोर पर बैठा व्यक्ति अगले कमरे के शुरुआती छोर पर बैठे व्यक्ति से आराम से बातचीत कर सकता है.वास्तव में कई बार जन्मकुंडली में ऐसा ही देखने को मिलता है,कि एक भाव में स्थित दो ग्रहों में तो युति का फल नहीं मिलता जबकि दो अलग भावों में बैठे ग्रहों की युति का फल प्राप्त होता है.एक बात और जैसे मान लें कि एक दोस्त सड़क पर चला जा रहा है और पीछे से उसका एक दोस्त आ रहा है,तो वह उस आगे वाले दोस्त को आवाज देकर रोकता है,उससे बात करता है फिर दोनों चल पड़ते हैं. अर्थात ग्रहों की युति जब बनने वाली होती है तो वह अधिक ताकतवर होती है और जब छूट रही होती है तो कमजोर होती जाती है.ये तो बात हुई दोस्ती और दुश्मनी की लेकिन जब उन्होंने पूछा की इन युति के प्रभाव को जन्मपत्रिका में किस प्रकार देखेंगे तो कुछ देर सोचने के बाद मैंने उन्हें समझाने के लिए एक सारणी बनाई उसे यहाँ पेश कर रहा हूँ.मैंने इस सारणी में चंद्र को प्रधान ग्रह के रूप में लिया है और अन्य ग्रहों का इसके साथ युति सम्बन्ध किस तरह होगा इस पर चर्चा करने का प्रयास किया है,आशा है कि आप सब को भी पसंद आएगा.
                                                       -:चंद्र:-(विचार)
शनि(दु:ख,विषाद,कमी,निराशा)               :- मन में दु:ख,नकारात्मक सोच.
मंगल(साहस,धैर्य,तेज,क्षणिक क्रोध)        :-  विचारों में ओज,क्रांतिकारी विचार. 
बुध(वाणी,चातुर्य.हास्य)                           :- हास्य-व्यंग्य पूर्ण विचार,नए विचार.
गुरु(ज्ञान,गंभीरता,न्याय,सत्य)            :- न्याय,सत्य और ज्ञान की कसौटी पर कसे हुए गंभीर विचार.
शुक्र(स्त्री,माया,संसाधन,मिठास,सौंदर्य)     :- माया में जकड़े विचार,सुंदरता से जुड़े विचार.
सूर्य(आत्म-तेज,आदर)                            :- आदर के विचार,स्वाभिमान का विचार.
राहू(मतिभ्रम,लालच)                               :- विचारों का द्वंद्व,सही-गलत के बीच झूलते विचार.
केतु(कटाक्ष,झूठ,अफवाह)                        :- झूठ,अफवाह और सही बातों को काटने का विचार.
               यहाँ जैसे मैंने चन्द्रमा के केवल एक कारक को लेते हुए दुसरे ग्रहों के वे कारकत्व जो चंद्र से मिल सकते हैं,मिलाया है और युति का फल बतलाने का प्रयत्न किया है अब इन्हीं का फल अलग तरह से भी पता लग सकता है,जैसे ऊपर की सारणी की ही बात करें तो चंद्र माता का भी स्वामित्व रखता है,अब चंद्र रूपी माता का शनि के किस कारक से संयोग होगा यह विचार कर प्रभाव ज्ञात कर सकते हैं!यहाँ मैंने मूल तरीका बताने की कोशिश की है,कैसा लगा.यदि किसी सुधार की गुंजाइश हो तो अवश्य सूचित करें. 





Monday, June 13, 2011

कर्म और भाग्य -३


                            कर्मों की व्याख्या :-के.एस.कृष्णमूर्ति
 कृष्णमूर्ति पद्धति के बारे में बात करने से पहले मैं बात करना चाहूँगा कर्म के सिद्धांत के बारे में जिसका उल्लेख प्रो. के. एस. कृष्णमूर्ति जे ने अपनी पुस्तक "FUNDAMENTAL PRINCIPLES OF ASTROLOGY" में किया है!क्योंकि चाहे जीवन हो ज्योतिष ये सब कर्म ही तो हैं जो इनका निर्धारण करते हैं !जीवन और ज्योतिष में कर्मों के सम्बन्ध और महत्त्व को समझने लिए ही कर्मों के सिद्धांत को पहले समझना आवश्यक सा देख पड़ता है !कृष्णमूर्ति जी ने अपनी पुस्तक में में कर्मों की तीन श्रेणियों का जिक्र किया है ! 
1. अदृढ़ कर्म       2. दृढ़ कर्म          3. दृढ़ अदृढ़ कर्म 
1. दृढ़ कर्म:- कर्म की इस श्रेणी में उन कर्मों को रखा गया है जिनको प्रकृति  के नियमानुसार माफ नहीं किया जा सकता !जैसे क़त्ल,गरीबों को उनकी मजदूरी न देना,बूढ़े माँ - बाप को खाना न देना ये सब कुछ ऐसे कर्म हैं जिनको माफ नहीं किया जा सकता ! ऐसा व्यक्ति अपने जीवन में चाहे कितने ही शांति के उपाय करे लेकिन उसका कोई भी प्रत्युत्तर उन्हें देख नहीं पड़ता है ,चाहे ऐसे व्यक्ति इस जीवन में कितने ही सात्विक जीवन को जीने वाले  हों लेकिन उनको जीवन कष्टमय ही गुजरना पड़ता है वे अपने जीवन के दुखों को दूर करने के लिए विभिन्न ज्योतिषीय उपाय करते देखे जाते हैं लेकिन अंत में हारकर उन्हें यही कहने के लिए मजबूर होना पड़ता है,कि ज्योतिष और उपाय सब कुछ निरर्थक है ,लेकिन ये बात तो एक सच्चा ज्योतिषी जनता है कि क्यों यह व्यक्ति कष्ट माय जीवन व्यतीत करने बाध्य है !
2.दृढ़ अदृढ़ कर्म:-कर्म की इस श्रेणी में जो कर्म आते है उनकी शांति उपायों के द्वारा की जा सकती है अर्थात ये माफ किये जाने योग्य कर्म होते हैं !जैसे कोई  व्यक्ति कोलकाता जाने लिए टिकट लेता है परन्तु भूलवश मुम्बई जाने वाली ट्रेन में बैठ जाता है !ऐसी स्थिति में टिकट चेक करने वाला कर्मचारी पेनल्टी के पश्चात उस व्यक्ति को सही ट्रेन में जाने की अनुमति दे देता है !ऐसे वैसे व्यक्ति सदैव ज्योतिष और इसके उपायों की तरफदारी करते नजर आते हैं !
3. अदृढ़ कर्म:-(नगण्य अपराध) ये वे कर्म होते हैं जो एक बुरे विचार के रूप में शुरू होते हैं और कार्य रूप में परिणत होने से पूर्व ही विचार के रूप में स्वतः खत्म हो जाते हैं ! जैसे एक लड़का आम के बाग को देखता है और उसका मन होता है ,कि बाग से आम तोड़कर ले आये लेकिन तभी उसकी नजर रखवाली कर रहे माली पर पड़ती है और वह चुपचाप आगे निकल जाता है !यहाँ बुरे विचारों का वैचारिक अंत हो जाता है अतः ये नगण्य अपराध की श्रेणी में आते हैं और थोड़े बहुत साधारण शांति - कर्मों के द्वारा इनकी शांति हो जाती है ! ऐसे व्यक्ति ज्योतिष के विरोध में तो नहीं दिखते लेकिन ज्यादा पक्षधर भी नहीं होते !
           ज्योतिष का एक जिज्ञासु विद्यार्थी होने के नाते कहना चाहूँगा कि सभी को अपनी दिनचर्या में साधारण पूजन कार्य और मंदिर जाने को अवश्य शामिल करना चाहिए क्योंकि ये आदत पता नहीं कितने ही  अदृढ़ कर्मों से जाने - अनजाने में छुटकारा दिला देती है !कर्म और भाग्य के विषय में इसी श्रृंखला के आगामी लेख में कर्म और भाग्य के रहस्य का पूर्ण सत्य विवरण प्रस्तुत करने का प्रयत्न करूँगा !
!जय गणेश!
!!जय गणेश!!
      

Sunday, June 5, 2011

HORARY ASTROLOGY (प्रश्न ज्योतिष)

कई पाठकों से प्राप्त अनुरोध के प्रत्युत्तर में प्रश्न ज्योतिष या गोचर फल ज्योतिष से सम्बंधित ये  महत्वपूर्ण लेख , समर्पित है PROF.K.S. KRISHNAMURTI JEE और नागपुर के प्रसिद्द ज्योतिषी हनमंतसा नेमासा काटवे को ,जिन्होंने इस विषय पर काफी अध्ययन किया और  इसे ज्योतिष की एक पूर्ण विधा के रूप में विकसित करने का पूरा प्रयास किया ! विषय की शुरुआत मैं ये जानने का प्रयास करते हैं , कि ये HORARY क्या है ,तो इस विषय को स्पष्ट करते हुए ये बताना चाहूँगा कि ये ज्योतिष विज्ञान की ही एक शाखा है , जो कि उन स्थानों पर काम में ली जाती है ,जब किसी जातक को अपना भविष्य जानना होता है या अपने भविष्य से सम्बंधित किसी विशेष घटना पर उसे ज्योतिषीय सलाह की आवश्यकता होती है,पर उसके पास अपने जन्म का DATABASE  या तो होता नहीं है और अगर होता है तो वह अपूर्ण होता है !उस स्थिति में उस जातक से उसका सवाल पूछा जाता है और उस समय को ही उस प्रश्न का जन्म समय मानकर कुंडली बनाकर उस प्रश्न का उत्तर दिया जाता है !सबसे महत्वपूर्ण बात तो इस पद्धति की ACCURACY  की है , क्योंकि इसमें समय , तिथि या कुछ और गलत होने की सम्भावना नगण्य होती है और प्रश्न का उत्तर सही प्राप्त होता है !लेकिन यह पद्धति केवल उसी प्रश्न के सम्बन्ध में जातक का मार्गदर्शन कर सकती है जो उसने पूछा है ! यदि भविष्य में उस व्यक्ति को कुछ और पूछना हो तो यही प्रक्रिया दुबारा दोहरानी पड़ेगी! ज्योतिष की इस विधा का प्रयोग उतना ही प्राचीन है जितना साधारण "NATAL ASTROLOGY" अर्थात जातकीय  ज्योतिष का !वर्तमान में इस विधा का विस्तृत प्रयोग किया जा रहा है और RESEARCHES  भी जारी है इस विषय को लेकर!अब बात करते हैं कुछ ज्योतिषियों द्वारा प्रयुक्त "HORARY"  के तरीकों पर !                     
रामशलाका प्रश्नावली :- रामचरितमानस तो आप सब ने पढ़ी होगी उसके शुरुआती पृष्ठ पर ही रामशलाका प्रश्नावली है जहां आप अपना प्रश्न मन में सोचकर उसकी सहायता से उत्तर प्राप्त कर सकते हैं ! ये  भी प्रश्न ज्योतिष का एक उदहारण है ! 
वैदिक प्रश्न ज्योतिष :- इस पद्धति में जब कोई जातक प्रश्न पूछने के लिए ज्योतिषी के पास आकार अपना प्रश्न पूछता है तो उस समय के उदित लग्न  को कुंडली मानकर सभी गणनाएं कर उत्तर दिया जाता है !लेकिन कभी - कभी एक समय में ही या कहें तो एक लग्नोदय में ही कई लोग एक जैसे सवाल लेकर आते हैं तो उस समय गणना करना थोडा सा मुश्किल होता है ! हालाँकि इसके विचार में ये बताया गया है कि प्रथम प्रश्न का उत्तर लग्न से फिर सूर्य ,फिर चंद्र इस तरह क्रमानुसार देना चाहिए लेकिन वर्तमान में कम प्रचलित है !  जबकि इस विधि के स्थान पर जब एक ही समय कई जातक एक ही प्रश्न लेकर आते हैं तो तो उससे  1 से लेकर 12 तक एक अंक पूछ कर उसके बताये अंक को लग्न मानकर वहाँ से गणना कर उत्तर दिए जा सकते हैं !
केरला ज्योतिष :-  इसमें किसी फूल , फल या नदी का नाम पूछकर गणना  कर उत्तर दिया जाता है !यह विधि  मुख्यतया केरला में ही प्रचलित है ! 
काटवे की "प्रश्न विचार "  :- काटवे के बारे  में जानने के लिए  यहाँ   देख सकते हैं ! काटवे ने अपने प्रश्न विचार में इस पद्धति को एक अलग ही मोड दिया है !उनकी गणना  का आधार है, कि जब जातक प्रश्न पूछने आता है तो जिस दिशा की और उसका मुख होता है उसके अनुसार उस जातक के चरों दिशाओं में ग्रहों को वारानुसार स्थापित किया जाता है और अलग अलग दिशाओं में स्थित ग्रहों के अनुसार फलादेश किया जाता है !वर्तमान में यह पद्धति  कम प्रचलन में है !                                                                                             
KRISHNAMURTI HORARY ASTROLOGY :- ज्योतिष की पद्धति के पुनरुत्थान का श्रेय श्री  कृष्णमूर्ति महोदय को दिया जा सकता है !इन्होंने इस विधा का पूर्ण SCIENTIFIC तरीके से विकास किया है और अपने आप में पूर्ण बनाने के साथ ही साथ जातकीय  ज्योतिष का एक अभिन्न अंग भी बना दिया है !मेरी एक पोस्ट आप लोगों ने पढ़ी जिसमे मैंने लोगों से सवाल आमंत्रित किये थे गणपति का निमंत्रण  में आप देख सकते हैं!यहाँ मैंने केवल अपना प्रश्न और उस प्रश्न के साथ  1 से  249 तक की संख्या लिखने को कहा है ! ये 1  से  249 अंकों वाली पद्धति के लिए सारा श्रेय कृष्णमूर्ति जी को दिया जा सकता है !यहाँ ये स्पष्ट कर देना उचित समझता हूँ , कि ये अंक NUMEROLOGY  से सम्बंधित नहीं हैं बल्कि ये बारह राशियों का विभाजन हैं ! प्रत्येक अंक तीन ग्रहों के  COMBINATION  को  बताता है ! राशि - नक्षत्र - उप स्वामी  !उदहारण के तौर पर 'यदि कोई व्यक्ति प्रश्न पूछने के बाद उस प्रश्न के लिए अंक 7  का चयन करता है तो उसका तात्पर्य है , कि मेरे प्रश्न का लग्न मेष राशि के उस स्थान पर मानो  जहां "मंगल - केतु - गुरु" का COMBINATION बनता हो !और उस स्थान को लग्न मानते हुए सभी ग्रहों को गोचर के स्थान पर रखते हुए प्रश्न के लिए गणना करें ! इस विधि  के बारे में विस्तार से चर्चा मेरे ब्लॉग पृष्ठ "ज्योतिष योग संग्रह" में की जायेगी !         HORARY ASTROLOGY  से मिलता जुलता ही एक सब्जेक्ट है "RULING PLANETS" जिस पर आगामी लेखों में चर्चा की जायेगी !यदि RULING PLANETS "तात्कालिक कार्येष ग्रहों " पर ज्योतिषी अपनी अच्छी पकड़ कर लेता है तो वह किसी जादूगर से कम नहीं होता !इतना चमत्कारी होता है इनका प्रभाव और फलादेश !
आज का टिप :-स्त्रियों को सिन्दूर सही मात्रा  में और सही तरीके से लगाना  चाहिए क्योंकि यह यह ब्रह्मरंध्र और अधमी रंध्र के ठीक ऊपर लगाया जाता है जिसे  सामान्य भाषा में सीमन्त या मांग कहते हैं !पुरुषों की तुलना में स्त्रियों में यह भाग नाजुक होता है और शरीर में विद्युत ऊर्जा के नियंत्रण का कार्य करता है ! सिन्दूर में  पाया जाने वाला पारा दुष्प्रभावों से स्त्रियों की रक्षा करता है ! 
! जय गणेश !
!! जय जय गणेश !!