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Monday, August 24, 2015

तैंतीस कोटि या तैंतीस करोड़ देवता

                                             देवताओं की संख्या के बारे में बाकी जानकारी तो आप इन्टरनेट पर से कहीं भी हासिल कर सकते हैं मुझे जो बात कुछ विशेष लगी उसका जिक्र यहाँ कर रहा हूँ  . देवी - देवताओं की संख्या को लेकर मैं भी यही सोचता रहा था , कि देवता तो तैंतीस करोड़ होते हैं . एक बार मैंने सुना कि जोधपुर में तैंतीस  करोड़ देवी - देवता का मंदिर है वहाँ गया भी पर कुछ समझ नहीं आया ..... अब फिर वही उधेड़बुन शुरू हो चुकी थी ............ पर किया जाये तो क्या ?


                                                         फिर एक दिन सिद्धार्थ भाईसाब (Astrologer Sidharth ) ने बताया की देवता तैंतीस प्रकार के होते हैं . कोटि का आशय प्रकार से है न कि करोड़ से . बात समझ तो आ चुकी थी लेकिन यह सब कहाँ वर्णित है इसकी खोज के दौरान जो पता चला वह लिखे देता हूँ -

१. ऋग्वेद १/१३९/११ के अनुसार कुल तैंतीस देवता हैं जिनमें से ११ पृथ्वी में , ११ अन्तरिक्ष में और ११ द्युलोक में है .
२. शतपथ ब्राह्मण ११/६/३/५ के अनुसार ८ वसु , ११ रूद्र ,१२ आदित्य ,१ इंद्र और एक प्रजापति कुल तैंतीस देवता हैं .
                       यहाँ "कोटि" शब्द प्रकार - वाचक है संख्या - वाचक नहीं . 

Monday, January 9, 2012

3.कृतिका


नक्षत्र:कृतिका

कृतिका नक्षत्र या सात बहने                                  3.कृतिका
कृतिका नक्षत्र में छः तारे मिलकर खुरपे या फरसे की आकृति का निर्माण करते हैं!वैदिक साहित्य में कृतिका नक्षत्र में सात तारे माने गए है!तैत्तिरीय ब्राह्मण में कृतिका नक्षत्र में सात आहुतियों का प्रावधान है!इस नक्षत्र पर अग्निदेव का स्वामित्व है!ग्रहों में सूर्य इस नक्षत्र का अधिष्ठाता है!कृतिका नक्षत्र दो तरह का माना जा सकता है,पहला भाग जो मंगल की मेष राशि के अंतर्गत आता है और दूसरा जो शुक्र की वृषभ राशि के अंतर्गत आता है!यह मिश्र नक्षत्र है,इसमें लगभग सभी कार्य किये जा सकते हैं!कृतिका भी अधोमुख नक्षत्र है,अतः इसमें भी भरणी के समान अधोगमन वाले कार्य किये जा सकते हैं!कार्तिक मास में कृतिका नक्षत्र के दिन कोई भी शुभ या विशेष कार्य नहीं करना चाहिए क्योंकि यह शून्यसंज्ञक होता है!मंगलवार को कृतिका नक्षत्र सर्वार्थसिद्धि योग का निर्माण करता है,इस नक्षत्र से अमृतसिद्धि योग नहीं बनता!इस नक्षत्र के लिए गूलर के वृक्ष की पूजा की जाती है!कृतिका ब्राह्मण जाति का नक्षत्र है!यह स्त्री जाति का नक्षत्र है और काल पुरुष के शरीर में भौहों का आधिपत्य रखता है!इसका राशि स्वामी मंगल,योनी मेष,नदी अन्त्य और गण राक्षस का होता है!आँखें और कार्निया पर भी इसी नक्षत्र का नियंत्रण होता है!कंठ नली और निचले जबड़े पर इस नक्षत्र का स्वामित्व होता है!
कारकत्व:-सुनार,लुहार,अग्नि से सम्बंधित कार्य करने वाले,ज्वलनशील पदार्थों का कार्य,तेज़ाब,गैस,यज्ञ कार्य करने वाले,गुप्त धन से सम्बंधित,तिजोरी,सुरंग,सफ़ेद फूलों के पदार्थ,BEAUTY PARLOUR,भाषा शास्त्र,व्याकरणाचार्य,ज्योतिषी,श्मशान,खान के कार्मिक इत्यादि!
नक्षत्रफल:-कम खाने वाले(वृष में हो तो अधिक खाने वाले)तेजस्वी "जहां जाये छा जाये"दानी,विपरीत लिंग के बारे में बातचीत के शौक़ीन,अनुशासित,तुनक मिजाज और लगनशील होते हैं!धार्मिक,संस्कारी,धनी और स्वाध्याय करने वाले होते हैं!नक्षत्र पीड़ित हो तो परस्त्रीगामी होते हैं!
पदार्थ:-तिल,जौ,हीरेसोना,चांदी,ताम्बा,लोहा आदि धातु!समय (आठ मास)!
व्यक्ति:-अग्निपूजक,पारसी,कर्मकांडी,अग्नि से जीविकोपार्जन करने वाले,मन्त्रज्ञ,R.B.I. के अधिकारी,हजामत बनाने वाले(नाई),INCOME-TAX,SALES-TAX,SERVICE-TAX,पंचांग व कैलेंडर छापने वाले!
कृतिका नक्षत्र का वैदिक मंत्र:-अग्निमूर्धादिवः ककुत्पतिः पृथिव्यामयम्!अपा गुं रेता गुं सिजिंवतिः!! 
बीमारियाँ:-कील-मुंहासे,दृष्टि-दोष,गर्दन के रोग,गले में रोग,घुटने पर निशान!
मानसिक गुण:-दोस्तों के झुण्ड में रहने वाला,आदर सत्कार में कुशल,विलासी,सामाजिक,रचनात्मक प्रवृत्ति,सरकार व राज्य कर्मचारियों से लाभ!
व्यवसाय:-सरकारी विभागों से लाभ,ऋणग्रस्त भी हो सकता है!कलाकार,शिल्पी,दवा का काम,अंतर्राष्ट्रीय व्यापारी,फोटोग्राफी का काम करने वाला!TAX-COLLECTOR,केशों का काम,इत्र का व्यापार इत्यादि!

Saturday, September 17, 2011

नक्षत्र


नक्षत्र : अश्विनी

: नक्षत्र :

एक स्थान से दुसरे स्थान पर पृथ्वी के अयन चलने के कारण खिसकते प्रतीत होने वाले तारामंडलों का नाम नक्षत्र है!तैत्तिरीय संहिता में कहा गया है सृष्टि सर्वत्र जल में रहने पर सृष्टि की शुरुआत में जो तर गए वे तारे हैं!
                                                                           1. अश्विनी 
अश्विनी नक्षत्र का वैदिक नाम अश्वयुज है!अश्विनी नक्षत्र में कुल तीन तारे होते हैं,जो आपस में मिलकर घोड़े के मुख जैसी आकृति का निर्माण करते हैं!
अश्विनी नक्षत्र का मालिक अश्विनी कुमार है,और ग्रहों में इस नक्षत्र का मालिक है केतु !यह क्षिप्र नक्षत्र है,अतः इसमें खरीद-बेच,यात्रारम्भ,विद्यारंभ किया जा सकता है!तिर्यक मुख नक्षत्र होने के कारण जलयात्रा,विमान यात्रा,मशीनरी चालू करना आदि कार्य किये जा सकते हैं!चैत्र मास में अश्विनी नक्षत्र को कोई भी शुभ कार्य नहीं करना चाहिए क्योंकि इसका प्रभाव शून्य होता है!मंगलवार को अश्विनी नक्षत्र होने पर अमृतसिद्धि और रविवार को अश्विनी नक्षत्र होने पर सर्वार्थसिद्धि नक्षत्र का योग करता है!रविवार को अश्विनी नक्षत्र आनंद योग का निर्माण करता है!अपवादस्वरूप अमृतसिद्धि योग यदि सप्तमी तिथी को पड़े तो विष का निर्माण करता है,अर्थात त्याज्य है!अश्विनी नक्षत्र गंडांत संज्ञक होता है इसकी शुरुआत की दो घड़ी अर्थात 48 मिनट गंडांत होते हैं!परन्तु रविवार को अश्विनी नक्षत्र में जन्म होने पर गंडांत का दोष काफी हद तक कम हो जाता है!अश्विनी नक्षत्र के लिए केले,आक व धतूरे के वृक्ष की पूजा करनी चाहिए!अश्विनी नक्षत्र पुरुष संज्ञक और मरीचि गोत्र का होता है!पञ्च तत्वों में इसका तत्व पृथ्वी है!यह नक्षत्र-पुरुष के सर का अधिष्ठाता होता है!इस नक्षत्र की योनी अश्व,नाड़ी आद्या और गण देव होता है!
कारकत्व:-घोड़ों से सम्बंधित लोग,आधुनिक काल के हिसाब से वाहनों से सम्बंधित लोग!सेनापति,शरीर की चिकित्सा करने वाले चिकित्सक!अधीनस्थता में काम करने वाले लोग!रूपाजीवी अर्थात सुंदरता से धन कमाने वाले लोग!कृषि कर्म करने वाले !

नक्षत्रफल:-सुरूप चमकयुक्त बड़ी आँखें!आकर्षक उभारयुक्त ललाट,कार्यदक्ष,बुद्धिमान,अच्छी नीरोग शक्ति वाला,बातों से प्रभावित करने वाला होता है!दृढ़ निश्चय या यूं कहें की अड़ियलपन इनकी खास पहचान होती है!
पदार्थ:-चावल,घी,अनाज,कपडा,घास,चारा,जड़ी-बूटियाँ,केमिकल आदि!
व्यक्ति:-घोड़ों के व्यापारी,प्रशिक्षक,घुडदौड कराने वाले,वाहन उद्योग से सम्बंधित लोग,चिकित्सक,कर्मचारी वर्ग,विज्ञापन की दुनिया से जुड़े लोग!
अश्विनी नक्षत्र का वैदिक मंत्र:- "अश्विना तेजसाचक्षु: प्रIणेन सरस्वतीवीर्यम् ! वाचेंद्रो बलेनेंद्रा यदद्युरिन्द्रयम्"
बीमारियाँ:-सर में चोट,दुर्बलता,मिर्गी,सर के आधे भाग में दर्द,मूर्छा,असाधारण नींद,पक्षाघात,मलेरिया,छोटी चेचक!
मानसिक गुण:-भाईयों से मतभेद,विवेक शून्य,हनुमान जी की पूजा,लोभी,भूमि के लिए चिंतित!
व्यवसाय:-पुलिस,सेना,चिकित्सा,रेलवे,मशीनरी,लोहा,घुडसवार,जेल,अदालत,कारखाना!

Wednesday, July 6, 2011

ज्योतिष : पुरातन विवेचन :- आचार्य राज


आज बात कर रहा हूँ अपने पूजनीय गुरु श्री आचार्य राज द्वारा बताये गए एक पौराणिक किस्से का जिनका जिक्र उन्होंने अपनी पुस्तक "सितारों के अक्षर किरणों की भाषा" में भी किया है ! एक बात गुरूजी की किताबों के बारे में भी बताना चाहूँगा कि इनकी किताबें वास्तव में प्रसिद्द लेखिका अमृता प्रीतम के साथ संवाद है जिनका स्वरुप बाद में पुस्तकमय कर इनको प्रकाशित किया गया है ! दिल्ली के "किताब घर" से इनका प्रकाशन होता है ! इनकी दूसरी पुस्तक का नाम है "सितारों के संकेत"जिसमें आचार्य का स्वप्न ज्योतिष का गूढ़ ज्ञान दृष्टिगोचर होता है ! पुनः विषय पर आगे बढते हैं,आचार्य ने अपनी पुस्तक में ज्योतिष के उद्गम का विवेचन किया है, जिसका जिक्र मैं यहाँ उन्हीं के शब्दों में करने का प्रयास कर रहा हूँ ! 
     ज्योतिष की उत्पत्ति वेदों से होती है या ऐसा  कहें कि ज्योतिष वेदों का ही एक अंग हैं जिसे वेदों के नेत्र की संज्ञा दी गयी है !क्योंकि देखने का सामर्थ्य नेत्रों में होता है और ज्योतिष भी देखने का कार्य करता है !इस प्रकार सृष्टि के आरम्भ में ज्योतिष पर मूलतः प्रजापति ब्रह्मा का स्वामित्व था !जब जगन्नियन्ता परम पिता परमात्मा के आदेश से उन्होंने इस जगत के निर्माण का कार्य शुरू किया तो सर्वप्रथम उन्होंने तप के द्वारा सृष्टि के निर्माण की शुरुआत की !लेकिन कई युग बीत जाने पर उनके तप बल से आठ मानसिक पुत्रों को उन्होंने उत्पन्न किया !ये आठ पुत्र है सप्तर्षि और देवर्षि नारद !इसके बाद ब्रह्मा जी ने विचार किया कि इस प्रकार से मानसिक सृष्टि करने में तो करोड़ों युग बीत जायेंगे तो क्या किया जाय तब उनके मन में मैथुनी सृष्टि का विचार उत्पन्न हुआ ! उन्होंने अपने आठों पुत्रों को बुलाया और उनके समक्ष मैथुनी सृष्टि के विचार को रखा !उनके सात पुत्र तो मैथुनी सृष्टि स्वीकार करने के लिए तैयार हो गए "ये थे सप्तर्षि" लेकिन उनका एक पुत्र ने मैथुनी सृष्टि को स्वीकार नहीं किया और वो थे "नारद"!तब मैथुनी सृष्टि के विचार को अपनाने वाले पुत्रों के लिए ब्रह्मा ने स्त्री के निर्माण का कार्य शुरू कर दिया लेकिन काफी समय के बाद जब वे इस कार्य में पूर्ण रूप से सफल नहीं हो सके तो उन्होंने देवाधिदेव महादेव की शरण ली और महादेव ने प्रसन्न होकर पहले अर्धनारीश्वर रूप ग्रहण किया फिर नारी स्वरुप को अपने शरीर से अलग कर स्त्री जाति की उत्पत्ति की !इस प्रकार मैथुनी सृष्टि की शुरुआत हो गयी !फिर ब्रह्मा जी ने विचार किया कि मेरे सात पुत्र तो मैथुनी सृष्टि स्वीकार करके मर्त्यलोक में निवास करने चले गए अब मैं नारद को क्या दूं इस प्रकार विचार करते हुए ब्रह्मा जी ने नारद को वेदों में से ज्योतिष का ज्ञान प्रदान किया और नारद दैवज्ञ हो गए !दैवज्ञ वो होता है जो सात जन्म आगे और पीछे तक का ज्ञान ज्योतिष से प्राप्त कर लेता है !जब नारद भी इस कोटि को प्राप्त हो गए तो वह सदैव दैत्यों और देवताओं को आने वाले भविष्य के लिए पहले से ही सूचित करते रहते जिसके कारण कई बार सुनने को मिलता है , कि नारद ही देवताओं और दानवों को लड़ाने  का कार्य करते थे लेकिन वास्तव में नारद को सब कुछ पता होता था वो तो केवल आगाह करने का कार्य करते थे जो होना था वो तो निश्चित था !
             इस प्रकार ज्योतिष का पौराणिक  उद्गम "नारद पुराण"को माना जाता है !ऐसा कहा जता है , कि शुरुआत में इसमें 84 लाख श्लोक हुआ करते थे लेकिन वक्त की धुल में उड़ते - उड़ते ये श्लोक आज  नाम मात्र ही रह गए हैं !चाहें तो इस विषय पर ज्योतिषीगण नारद पुराण का पठन कर सकते हैं !  कहा जा सकता है कि वर्तमान में जो ज्योतिष का लेख विद्यमान है वह अपूर्ण है और सतत प्रयासों के द्वारा उनकी रचना पुनः करनी होगी !ज्योतिष को विभिन्न शाखाओं में विभाजन कर उनका तार्किक तरीकों से अध्ययन करना होगा !ज्योतिष फल बतलाने वाले पंडितों को ये बात समझनी होगी की विवाह की तिथी और नौकरी बताने वाला पंडित अचानक से बरसात का दिन ,चुनाव की जीत ,ज्वालामुखी का फटना आदि नहीं बता सकता क्योंकि ये ज्योतिष की अलग - अलग शाखाएं हैं लेकिन इस बात को समझे बिना पांडित्य को बरकरार रखने के लिए फलादेश किया जाता है और गलत होने पर पंडित जी के साथ साथ इस विषय को भी खामियाजा भुगतना पड़ता है !इसलिए बिना ज्ञान के ज्योतिष की विभिन्न शाखाओं में फलादेश करने से बचना चाहिए और पहले एक शाखा पर पूरी पकड़ करने का प्रयास करना चाहिए !मैं आह्वान करता हूँ भारत के उन सभी ज्योतिष से जुड़े लोगों का कि वो आगे बढे और जिस तरह से भी कर सकते हैं इस विषय को प्रामाणिक और उपयोगी बनाने में मदद करें ! गणेश जी हमें हमारे कार्य में सफल करे ! जय गणेश !

! जय गणेश ! 
! जय जय गणेश !!

Sunday, June 5, 2011

HORARY ASTROLOGY (प्रश्न ज्योतिष)

कई पाठकों से प्राप्त अनुरोध के प्रत्युत्तर में प्रश्न ज्योतिष या गोचर फल ज्योतिष से सम्बंधित ये  महत्वपूर्ण लेख , समर्पित है PROF.K.S. KRISHNAMURTI JEE और नागपुर के प्रसिद्द ज्योतिषी हनमंतसा नेमासा काटवे को ,जिन्होंने इस विषय पर काफी अध्ययन किया और  इसे ज्योतिष की एक पूर्ण विधा के रूप में विकसित करने का पूरा प्रयास किया ! विषय की शुरुआत मैं ये जानने का प्रयास करते हैं , कि ये HORARY क्या है ,तो इस विषय को स्पष्ट करते हुए ये बताना चाहूँगा कि ये ज्योतिष विज्ञान की ही एक शाखा है , जो कि उन स्थानों पर काम में ली जाती है ,जब किसी जातक को अपना भविष्य जानना होता है या अपने भविष्य से सम्बंधित किसी विशेष घटना पर उसे ज्योतिषीय सलाह की आवश्यकता होती है,पर उसके पास अपने जन्म का DATABASE  या तो होता नहीं है और अगर होता है तो वह अपूर्ण होता है !उस स्थिति में उस जातक से उसका सवाल पूछा जाता है और उस समय को ही उस प्रश्न का जन्म समय मानकर कुंडली बनाकर उस प्रश्न का उत्तर दिया जाता है !सबसे महत्वपूर्ण बात तो इस पद्धति की ACCURACY  की है , क्योंकि इसमें समय , तिथि या कुछ और गलत होने की सम्भावना नगण्य होती है और प्रश्न का उत्तर सही प्राप्त होता है !लेकिन यह पद्धति केवल उसी प्रश्न के सम्बन्ध में जातक का मार्गदर्शन कर सकती है जो उसने पूछा है ! यदि भविष्य में उस व्यक्ति को कुछ और पूछना हो तो यही प्रक्रिया दुबारा दोहरानी पड़ेगी! ज्योतिष की इस विधा का प्रयोग उतना ही प्राचीन है जितना साधारण "NATAL ASTROLOGY" अर्थात जातकीय  ज्योतिष का !वर्तमान में इस विधा का विस्तृत प्रयोग किया जा रहा है और RESEARCHES  भी जारी है इस विषय को लेकर!अब बात करते हैं कुछ ज्योतिषियों द्वारा प्रयुक्त "HORARY"  के तरीकों पर !                     
रामशलाका प्रश्नावली :- रामचरितमानस तो आप सब ने पढ़ी होगी उसके शुरुआती पृष्ठ पर ही रामशलाका प्रश्नावली है जहां आप अपना प्रश्न मन में सोचकर उसकी सहायता से उत्तर प्राप्त कर सकते हैं ! ये  भी प्रश्न ज्योतिष का एक उदहारण है ! 
वैदिक प्रश्न ज्योतिष :- इस पद्धति में जब कोई जातक प्रश्न पूछने के लिए ज्योतिषी के पास आकार अपना प्रश्न पूछता है तो उस समय के उदित लग्न  को कुंडली मानकर सभी गणनाएं कर उत्तर दिया जाता है !लेकिन कभी - कभी एक समय में ही या कहें तो एक लग्नोदय में ही कई लोग एक जैसे सवाल लेकर आते हैं तो उस समय गणना करना थोडा सा मुश्किल होता है ! हालाँकि इसके विचार में ये बताया गया है कि प्रथम प्रश्न का उत्तर लग्न से फिर सूर्य ,फिर चंद्र इस तरह क्रमानुसार देना चाहिए लेकिन वर्तमान में कम प्रचलित है !  जबकि इस विधि के स्थान पर जब एक ही समय कई जातक एक ही प्रश्न लेकर आते हैं तो तो उससे  1 से लेकर 12 तक एक अंक पूछ कर उसके बताये अंक को लग्न मानकर वहाँ से गणना कर उत्तर दिए जा सकते हैं !
केरला ज्योतिष :-  इसमें किसी फूल , फल या नदी का नाम पूछकर गणना  कर उत्तर दिया जाता है !यह विधि  मुख्यतया केरला में ही प्रचलित है ! 
काटवे की "प्रश्न विचार "  :- काटवे के बारे  में जानने के लिए  यहाँ   देख सकते हैं ! काटवे ने अपने प्रश्न विचार में इस पद्धति को एक अलग ही मोड दिया है !उनकी गणना  का आधार है, कि जब जातक प्रश्न पूछने आता है तो जिस दिशा की और उसका मुख होता है उसके अनुसार उस जातक के चरों दिशाओं में ग्रहों को वारानुसार स्थापित किया जाता है और अलग अलग दिशाओं में स्थित ग्रहों के अनुसार फलादेश किया जाता है !वर्तमान में यह पद्धति  कम प्रचलन में है !                                                                                             
KRISHNAMURTI HORARY ASTROLOGY :- ज्योतिष की पद्धति के पुनरुत्थान का श्रेय श्री  कृष्णमूर्ति महोदय को दिया जा सकता है !इन्होंने इस विधा का पूर्ण SCIENTIFIC तरीके से विकास किया है और अपने आप में पूर्ण बनाने के साथ ही साथ जातकीय  ज्योतिष का एक अभिन्न अंग भी बना दिया है !मेरी एक पोस्ट आप लोगों ने पढ़ी जिसमे मैंने लोगों से सवाल आमंत्रित किये थे गणपति का निमंत्रण  में आप देख सकते हैं!यहाँ मैंने केवल अपना प्रश्न और उस प्रश्न के साथ  1 से  249 तक की संख्या लिखने को कहा है ! ये 1  से  249 अंकों वाली पद्धति के लिए सारा श्रेय कृष्णमूर्ति जी को दिया जा सकता है !यहाँ ये स्पष्ट कर देना उचित समझता हूँ , कि ये अंक NUMEROLOGY  से सम्बंधित नहीं हैं बल्कि ये बारह राशियों का विभाजन हैं ! प्रत्येक अंक तीन ग्रहों के  COMBINATION  को  बताता है ! राशि - नक्षत्र - उप स्वामी  !उदहारण के तौर पर 'यदि कोई व्यक्ति प्रश्न पूछने के बाद उस प्रश्न के लिए अंक 7  का चयन करता है तो उसका तात्पर्य है , कि मेरे प्रश्न का लग्न मेष राशि के उस स्थान पर मानो  जहां "मंगल - केतु - गुरु" का COMBINATION बनता हो !और उस स्थान को लग्न मानते हुए सभी ग्रहों को गोचर के स्थान पर रखते हुए प्रश्न के लिए गणना करें ! इस विधि  के बारे में विस्तार से चर्चा मेरे ब्लॉग पृष्ठ "ज्योतिष योग संग्रह" में की जायेगी !         HORARY ASTROLOGY  से मिलता जुलता ही एक सब्जेक्ट है "RULING PLANETS" जिस पर आगामी लेखों में चर्चा की जायेगी !यदि RULING PLANETS "तात्कालिक कार्येष ग्रहों " पर ज्योतिषी अपनी अच्छी पकड़ कर लेता है तो वह किसी जादूगर से कम नहीं होता !इतना चमत्कारी होता है इनका प्रभाव और फलादेश !
आज का टिप :-स्त्रियों को सिन्दूर सही मात्रा  में और सही तरीके से लगाना  चाहिए क्योंकि यह यह ब्रह्मरंध्र और अधमी रंध्र के ठीक ऊपर लगाया जाता है जिसे  सामान्य भाषा में सीमन्त या मांग कहते हैं !पुरुषों की तुलना में स्त्रियों में यह भाग नाजुक होता है और शरीर में विद्युत ऊर्जा के नियंत्रण का कार्य करता है ! सिन्दूर में  पाया जाने वाला पारा दुष्प्रभावों से स्त्रियों की रक्षा करता है ! 
! जय गणेश !
!! जय जय गणेश !!     
                                                                                                                                                                        








                     




                                     


                                                                                                                                                                                                                                                                                                                 


Sunday, May 22, 2011

कौन सा जीवन श्रेष्ठ - गृहस्थ या संन्यास




काफी लम्बे समय के चिंतन मनन के बाद इस पोस्ट को लिखने का मन बनाया है , कि गृहस्थ जीवन अधिक श्रेष्ठ है या संन्यासमय जीवन !आपके अनुसार कौन सा अधिक श्रेष्ठ है और क्यों अवगत अवश्य कराएँ ! मैं यहाँ अपने विचार व्यक्त कर रहा हूँ !
   बात शुरू करते हैं एक ऐतिहासिक स्थान और घटना से " एक बार राजा परीक्षित जंगल से गुजर रहे थे , तो उन्होंने एक बैल को एक टांग पर खड़ा देखा ! जब राजा ने बैल से पूछा तो उसने कुछ स्पष्ट नहीं बताया क्योंकि वे और कोई और नहीं बल्कि स्वयं साक्षात् धर्मराज और धर्मराज कैसे किसी निंदा कर सकते थे! तब परीक्षित ने ध्यान बल से पता लगाया कि इनकी ऐसी दशा का जिम्मेदार कलियुग है !राजा ने सोचा कि कलियुग के आने पर संसार में चारों तरफ लूट - पट चोरी डकैती आदि नाना प्रकार के पापकर्मों की वृद्धि हो जायेगी अतः इस कलियुग का अंत कर देना चाहिए ! जब उन्होंने कलियुग का अंत करने का पूरा मानस बना लिया था तभी उनके मन में एक विचार आया , जिसके कारण उन्होंने कलियुग का अंत करने का विचार त्याग दिया ! उन्होंने सोचा कि कलियुग में सभी प्रकार की बुराइयां हैं , लेकिन इस में एक बहुत बड़ी अच्छाई भी है , जिसका लाभ कलियुग में सबको प्राप्त होगा और वो यह है , कि कलियुग में ईश्वर की प्राप्ति के लिए लोगों को बड़े - बड़े यज्ञ नहीं करने पड़ेंगे ! सालों - साल तक तपस्या नहीं करनी पड़ेगी केवल एक बार सच्चे मन से जो व्यक्ति एक बार ईश्वर के नाम का उच्चारण करेगा और ईश्वर को याद करेगा बस उसे ही ईश्वर की प्राप्ति हो जायेगी यह सोचकर उन्होंने उस समय कलियुग पर केवल पूर्णतया नियंत्रण कर लिया लेकिन उसका वध नहीं किया !जिसका उल्लेख तुलसीदास जी ने रामचरितमानस में भी किया है , देखिये
         " कलियुग केवल नाम अधारा,सुमिर-सुमिर नर उतरहिं पारा "
               खैर इस कथा का यहाँ जिक्र करने का उद्देश्य भी यही है , कि हमारा गृहस्थ जीवन भी कुछ ऐसा ही है , हम अपने दैनिक जीवन और सांसारिक मोह माया में फंसे रहकर भी यदि सच्चे मन से ईश्वर का कुछ पल के लिए ध्यान करते हैं , तो उसका काफी महत्त्व होता है ! और इसका कारण वास्तविकता में यह है , कि गृहस्थ में सच्चे मन से समय निकालकर पूरी श्रद्धा और आस्था से ईश्वर का ध्यान करना बड़ा ही मुश्किल कार्य है ! जो गृहस्थ  इसको करने में सफल होता है , उसे ईश्वर की प्राप्ति होती है इसमें कोई संशय भी नहीं है ! सन्यासी जीवन के बारे में कुछ कहना उचित नहीं है , गृहस्थ की व्याख्या में संन्यास की व्याख्या स्वतः ही छुपी है ! कोई बन्धु यदि कुछ विचार रखते हैं , तो अवगत करवाएं !
  एक बात और कहना चाहूँगा कि संन्यास का मतलब केवल घर छोड़कर चले जाना ही नहीं है य़ा फिर जंगलों में जाकर तप करना ही संन्यास नहीं है ! संन्यास का अर्थ है ( सम + न्यास ) अर्थात सबकुछ सामान यदि गृहस्थी व्यक्ति भी सभी से सामान व्यवहार करे सभी को समान रूप से आदर , महत्त्व प्रदान करे तो वह गृहस्थ में रहते हुए भी संन्यासी है ! लेकिन सभी अच्छी तरह से जानते हैं,कि गृहस्थ में रहते हुए ऐसा होना कितना मुश्किल है , क्यों है ना................???
    फिर भी प्रयास किया जा सकता है ! खैर प्रयास ना करना चाहें भी , तो गृहस्थ जीवन श्रेष्ठ है , क्योंकि इतनी समस्याओं और मोह माया के बंधनों में रहते हुए भी यदि व्यक्ति कुछ देर के लिए ईश्वर में चित्त को स्थिर कर सकता है तो ईश्वर ऐसे गृहस्थी व्यक्तियों का इंतज़ार कर रहे हैं !
                         गीता में श्रीकृष्ण कहते भी हैं :-
               !! सर्वधर्मानपरित्यज्यं मामेकं शरणम् व्रजः !
             अहम् त्वIम् सर्वपापेभ्यो मोक्षयिश्यामीमाशुचः !!


आज का टिप :- यदि मन में स्थिरता की कमी हो ,मन में व्यर्थ चिंताएं हो उहापोह की स्थिति हो तो शिवमहिम्नः स्तोत्र का पठन य़ा श्रवण करना चाहिए ! धार्मिक कारण तो शिव की आराधना हो गयी !क्योंकि मन पर चन्द्रमा का अधिकार है और चन्द्र शिव का घनिष्ठ सम्बन्ध है !और दूसरा कारण ये कि इस स्तोत्र की रचना "शिखिरिणी" छंद में की गयी है इस छंद का VIBRATION मानसिक रूप से आराम प्रदान कर एकाग्रता बढ़ता है ! अनुभूत है यकीन ना हो तो एक दिन के लिए सुबह - सुबह एकाग्रचित्त होकर श्रवण करें पता चल जायेगा !
शेष शुभम
! जय गणेश !
!! जय जय गणेश !!

Wednesday, May 18, 2011

साधारण दिनचर्या में योग

                        !! प्राणाय नमो यस्य सर्वमिदं वशे !!
        अर्थात - "मैं प्राण को प्रणाम करता हूँ इस प्राण के वश में ये सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड है ! यदि प्राण को वश में कर लिया जाये तो सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड को वश में किया जा सकता है !"
   आज मेरा विषय है योग जिसके बारे में प्रत्येक हिन्दू ये गर्व करता है , कि योग भारत की देन है ! लेकिन योग का अभ्यास कितने भारतीय नियमित रूप से करते हैं ??? इसका कारण शायद ये भी हो सकता है , कि आज की भागदौड़ भरी जिन्दगी में लोगों के पास योग को देने के लिए अधिक समय न हो ! या फिर ये भी हो सकता है , कि अपनी भारी - भरकम तनख्वाह वाली नौकरी के आगे वे योग को एक तुच्छ चीज मानते हो या और भी कई कारण हो सकते हैं जो हमें इस पूर्ण रूपेण भारतीय विज्ञान पर केवल झूठा गर्व करना ही सिखाता है उसका निरंतर अभ्यास करना नहीं ! हो सकता है , कि कई लोगों को ये बात अच्छी ना लगे लेकिन ये वास्तविकता है ! यदि बाबा रामदेव से पहले का समय याद करें तो सच्चाई समझ आ जायेगी ! खैर मेरे लेख का विषय योग का सरलीकरण पेश करना है , जो कई महापुरुषों ने अपने जीवन में प्रयुक्त किया है ! और शायद आप सब के भी काम आ सके क्योंकि मैं भी कम समय में ही योग का अभ्यास करने के लिए इस योग सारणी का अभ्यास करता रहा हूँ !
         इस योग सारणी का प्रयोग प्रत्येक व्यक्ति चाहे वो किसी भी पेशे में हो आसानी से कर सकता है !
                   प्राणायाम के तीन कवच ( बंधत्रय )
               इन्हें योग की भाषा में बंधत्रय कहा जाता है , लेकिन मैंने "कवच" नाम इसलिए दिया है , क्योंकि ये शरीर से बाहर जाने वाली ऊर्जा को रोककर उसे अंतर्मुखी करने का कार्य करते हैं ! प्राणायाम शुरू करने से पहले इनका अभ्यास करना अत्यंत ही लाभदायक रहता है ! शुरुआत में ४ मिनट फिर धीरे - धीरे ८ मिनट तक का समय दिया जा सकता है !
१ . जालंधर बंध :- पद्मासन में बैठकर श्वास अन्दर भरें , दोनों हाथ घुटनों पर टिकाकर ठोडी को कंठकूप पर लगाएं छाती को आगे के और तान कर रखें और दृष्टी भ्रूमध्य में स्थिर करना ही जालंधर बंध है !( एक मिनट )
२ . उड्डीयान बंध :- खड़े होकर दोनों हाथों को घुटनों से लगाकर श्वास बाहर छोडें और पेट को ढीला छोड़कर छाती को ऊपर उठाएं ! पेट को कमर से लगा दें ! शुरुआत में तीन बार पर्याप्त है !
३ . मूलबंध :- पद्मासन या सिद्धासन में बैठकर गुदाभाग और मूत्रेन्द्रिय को ऊपर के और आकर्षित करें ! ( एक मिनट )
४ . महा बंध :- तीनों बंध एक साथ लगाएं ! ( एक मिनट )
                       अब प्राणायाम शुरू करते हैं :--
१ . भस्त्रिका :- सुविधानुसार बैठकर दोनों नासिकाओं से श्वास को डायफ्राम तक भरना और सहजता से बाहर छोड़ना ही भस्त्रिका है ! एक मिनट में १२ बार होता है ५ मिनट प्रतिदिन करें !
   * HIGH B.P. वाले तेजी से ना करें ! ( ५ मिनट )
२ . कपालभाति :- श्वास को भरने के लिए विशेष प्रयत्न ना करें बल्कि जितना श्वास सहजता से अन्दर चला जाता है उसे पूरी एकाग्रता के साथ बाहर निकलने का प्रयत्न करें !एक मिनट ,में ४५ बार ५ मिनट करें ( ५ मिनट )
३ . अनुलोम - विलोम :- इससे कई लोग परिचित होंगे बहुत ही प्रसिद्ध प्राणायाम है ! लेकिन ये प्रसिद्ध ऐसे ही नहीं है,इसकी विशेषताएं ही ऐसी हैं ! पद्मासन में बैठकर दोनों हाथ को उठाकर अंगूठे के द्वारा दायीं नासिका को बंद करें और अनामिका और मध्यमा अँगुलियों के द्वारा (अंगूठे से दूसरी और तीसरी) बायीं नासिका को बंद करें और श्वास लेकर छोड़ने का क्रम प्रत्येक नासिका के द्वारा करें ! विशेष :- (इस प्राणायाम को करने से ७२ लाख ७२ हज़ार १० हज़ार २१० नाडिया शुद्ध हो जाती हैं !)
४ . भ्रामरी :- श्वास को पूरा अन्दर भरकर दोनों हाथों के अंगूठों से दोनों कानों को बंद कर लें और मध्यमा अंगुलिओं के द्वारा नासिका मूल को दबाएँ फिर भंवरे की तरह गुंजन करते हुए नाद रूप में "ॐ" का उच्चारण करते हुए श्वास को बाहर छोडें !( ५ मिनट ) ( विशेष:- डिप्रेशन , माइग्रेन और नेत्र रोग में लाभदायक )
५ . उदगीथ :- ३ से ६ सेकण्ड में श्वास को एक लय क साथ अन्दर भरना और १८ से २० सेकण्ड में बाहर छोड़ना ! (५ मिनट )
*** भ्रामरी और उदगीथ से किसी प्रकार की हानि होने की सम्भावना नहीं है !
६ . ध्यान :- अंत में ५ मिनट मौन रहकर समस्त विचारों को मन से निकालकर शिव का ध्यान करें ! ( ५ मिनट )
             ये पूरा अभ्यास ३४ मिनट का है , यदि अधिक समय लग तो ४० मिनट का समय मन जा एकता है लेकिन ये समय आपके जीवन को नयी ऊर्जाओं से भर देगा !
समय के साथ - साथ इन अभ्यासों के समय व संख्याओं को बढाया भी जा सकता है !
आज के इस लेख में मैं केवल अपनी दिनचर्या में शामिल करने योग्य नियमित योग सारणी का ही उल्लेख किया है , लेख का कलेवर अधिक विस्तृत ना हो जाये इसलिए इनके लाभ या अन्य बातों का उल्लेख नहीं किया और भाषा को भी अति संक्षिप्त रखने का प्रयास किया है , यदि इसमें फिर भी किसी प्रकार की त्रुटि रह गयी हो तो पाठक गण मेरा सहयोग करेंगे ऐसी आशा करता हूँ !साथ ही कुछ हिदायतें भी है अपनाने के लिए ! प्राणायाम का अभ्यास हमेशा स्वच्छ स्थान पर किया जाना चाहिए !आसन कुचालक यथा कम्बल या कुशा का होना चाहिए !
            सबसे महत्वपूर्ण बात ये , कि योग का अभ्यास करते समय धैर्य रखना चाहिए क्योंकि उतावलापन समस्याएं उत्पन्न कर सकता है !
              यथा सिंहो गजो व्याघ्रो भवेद वश्यः शनैः शनैः !
                  तथैव वश्यते वायुरन्यथा हन्ति साधकं !!
    अर्थात जिस प्रकार शेर , बाघ और हाथी जैसे प्राणियों को धीरे - धीरे वश में किया जाता है वरना ये हमला भी कर सकते हैं , उसी प्रकार प्राणायाम को धीरे - धीरे बढ़ाते हुए प्राण को वश में करना चाहिए !
        योग का अभ्यास करने वाले या ना करने वाले सभी को गीता का ये श्लोक अवश्य व्यवहार में लाना चाहिए :-
                                             
                         युक्ताहर्विहरास्य युक्तचेष्टस्य कर्मसु !
                    युक्तस्वप्नावबोधस्य योगो भवती दु:खहा !!
                   अर्थात जिसका आहार - विहार ठीक है , जिस व्यक्ति की निश्चित दिनचर्या है और जिसका सोने जागने का समय भी निश्चित है , ऐसा व्यक्ति ही योग कर सकता है और उसका योग का अनुष्ठान दु;खों का नाशक बनता है !
           आवश्यकता और रुझान महसूस होने पर आगे भी इस विषय पर चर्चा करने का प्रयत्न किया जाएगा तथा अलग - अलग रोगों के लिए योग और आयुर्वेद के नियमों का विचार करने का प्रयास करेंगे !
   आज का टिप :- राहू गन्दगी है,अतः रIहू का प्रभाव रहने पर व्यक्ति को जितना अधिक साफ़ - सुथरा रखने का प्रयत्न किया जाएगा मंदिरों में ले जाया जाएगा या आग के समीप वाले स्थानों पर ले जाने का प्रयत्न किया जाएगा उसके लिए उतना ही अच्छा है ! ये कार्य किसी दूसरे के द्वारा किया जाये ऐसा इसलिए लिखा क्योंकि वो स्वयं ऐसा कभी करना नहीं चाहेगा ! और कभी मानने को तैयार नहीं होगा कि वो किसी दुष्प्रभाव में है !
! जय गणेश !
!! जय जय गणेश !!