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Saturday, February 24, 2018

TRIANGLE IN ASTROLOGY

ज्योतिष में त्रिकोण का बहुत अधिक महत्त्व है . भुजाओं से यदि किसी बंद आकृति का निर्माण करना है तो सबसे छोटी आकृति एक त्रिकोण ही हो सकती है और यही सिद्धांत ज्योतिष के फलित खंड पर भी लागू होता है .कोई भी एक भाव स्वयं अकेले ही किसी परिणाम को देने में समर्थ नहीं होता है उसे कम से कम दो और भावों की आवश्यकता होती है जिनके सहारे वह अपना त्रिकोण पूरा करे और परिणाम जातक को प्राप्त हो , इसी सिद्धांत का प्रयोग प्रो.के.एस.कृष्णमूर्ति ने अपनी तारकीय ज्योतिष पद्धति में किया है , उनहोंने हर घटना के लिए एक मुख्य भाव और दो या दो से अधिक सहायक भाव भी लिए हैं , जी हाँ त्रिकोण के अलावा बन्ने वाली चतुश्कोनीय आकृति भी फल प्रदान करने में सक्षम है . त्रिकोण तो कम से कम होना ही चाहिए .


जैसे
अल्पायु :- लग्न,द्वितीय,सप्तम और मारक स्थान .
लम्बी आयु :- १,३,5,8,१० .
प्रसिद्ध :- १,१०,३,११.
अत्याधिक धन सम्पदा :- 2,6,१०,११.
लाभ:- 2,6,१०.
यात्रा :-३,12,१.
समझौता :-३,१,९.
ऐसे बहुत से समूह हैं जिनका प्रयोग किया जा सकता है , धीरे - धीरे उदाहरणों से समझने का प्रयत्न करेंगे .

SATURN AND VENUS

शनि और शुक्र
यदि इन दोनों ग्रहों में से एक ग्रह भी उच्च राशि में स्थित हो, तो जब शनि की महादशा में शुक्र की अन्तर्दशा या शुक्र की महादशा में शनि की अन्तर्दशा आती है तो वह उस जातक के लिए बड़ा ही संघर्षपूर्ण होता है .
जब इस नियम की जांच करनी शुरू की तो तीन ऐसे लोगों से मुलाकात हुई जिनकी जन्मपत्रिका में इन दोनों में से एक ग्रह उच्च राशि में स्थित है और वो इस दशा से भी गुजर चुके हैं ,उनसे पूछने पर उनहोंने अपने उस समयावधि के बारे में जो बताया उसे बिन्दुवार लिख रहा हूँ .
१. प्रथम जातक जिसकी जन्मपत्रिका में कन्या लग्न है तथा शुक्र अपनी उच्च राशि में स्थित है , ४५ वर्ष की उम्र हो चुकी है अब तक विवाह नहीं हुआ है . इस जातक को शनि में शुक्र की अन्तर्दशा के दौरान अपने घर से निकाल दिया गया तथा इसे अपने दोस्तों के घर, होटल तथा धर्मशालाओं में रहकर इस समय को व्यतीत करना पडा तथा धनाभाव निरंतर बना रहा . इस दशा के समाप्त होने के बाद यह पुनः अपने परिवार के साथ रहने लगा है .
२. द्वितीय जातक भी कन्या लग्न का है जिसका शनि अपनी उच्च राशि तुला में स्थित है यह जातक अपने ननिहाल में रहता था लेकिन शुक्र मैं शनि की अन्तर्दशा के समय इसे ननिहाल से वापस भेज दिया गया तथा अपने पिता का मकान बहुत छोटा होने के कारण मंदिर के एक कमरे में इस समय को व्यतीत करना पड़ा तथा धनाभाव भी निरंतर बना रहा .
३. तृतीय जातक एक विधायक है जिसे लम्बे समय की चुनावी जीत के पश्चात इस दशा समय में चुनावी हार का सामना करना पडा अर्थात विधानसभा से बाहर रहना पडा . धनाभाव तो नहीं रहा लेकिन शक्ति और अधिकार का अभाव बना रहा .
और भी कुछ जातक है जिनके शनि या शुक्र उच्च राशि में स्थित है लेकिन अभी यह दशा क्रम आना बाकी है .
इस नियम का सही होना इतना सामान्य नहीं है , यह वास्तव में बहुत ही महत्वपूर्ण है क्योंकि यह घटना विंशोत्तरी दशा क्रम की सटीकता को भी प्रतिपादित करती है .
इसका विपरीत योग भी बिलकुल सटीक है जिसके बारे फिर कभी चर्चा करूंगा .

Who gives the results : Planets Or ........ (आखिर फल कौन देता है )

       अक्सर जब साधारण जन मानस के बीच ज्योतिष की चर्चा देखने व सुनने का अवसर मिलता है तो हमेशा कुछ बातें उनके बीच सामान्य होती हैं जैसे कि यदि किसी को शनि की दशा चल रही है तो संवादों के बीच सशक्त रूप से सुनने को मिलता है , कि "शनि चल रहा है तब तो तेरा समय खराब है ,तू तो शनि के मंदिर जाया कर और ये दान किया कर वरना बहुत मुश्किल हो जायेगी !" और दुसरी ओर  जब पता चलता है , कि किसीको गुरू की दशा चल रही है , तो कहा जाता है , कि "तेरे तो अभी मौज है , गुरू तो बहुत अच्छा ग्रह है तुझे पूरी तरह सेट कर देगा -फलां फलां ". तो क्या जिस जिस व्यक्ति को शनि की दशा चलेगी वह समस्याओं से जूझता ही रहेगा और गुरू की दशा वाला व्यक्ति आनंद करेगा ? क्या शनि कभी किसी का कुछ अच्छा नहीं कर सकता ? आइये कुछ चर्चा हो जाये इस बात पर ! 
जितना अपने अल्पकालीन विद्यार्थी जीवन में सीखा है उस आधार पर स्पष्ट करने का प्रयास करता हूँ  
        सर्वप्रथम तो ये बात जानना बहुत आवश्यक है , कि फल  देता कौन है ! हालाँकि ये बात थोड़ी दार्शनिक लग सकती है लेकिन सत्य है , कि फल हमारा कर्म ही देता है और वही दे सकता है, ग्रहों में ये शक्ति नहीं कि हमें फल प्रदान करें वे तो कर्म फलों के संचरण का माध्यम मात्र हैं ! गहन विचार करने पर मन में यही प्रस्फुटित होता है , कि जब मनुष्य पैदा होता है , तो उस मनुष्य को उसके जीवन काल में जो कुछ भी मिलना होता है ईश्वर वह सब कुछ उसके साथ एक बड़े होटल में भेज देता है ! इस होटल  में बारह कमरे होते हैं जिनमें वो सामान रखा होता है जो उसे इस जीवन काल में काम लेना होता है ! इन्हीं कमरों में कुछ खाली स्थान भी होता है जहाँ वह व्यक्ति इस जीवन काल में कुछ कमाकर वहाँ रख सकता है ,लेकिन ये स्थान सीमित होता है ! इन सामानों को उस व्यक्ति तक पहुँचाने वाले नौ कर्मचारी  उस होटल में काम करते हैं जो अपने अपने कार्य समय के हिसाब से अपने अपने कमरों से सामान उस व्यक्ति तक पहुंचाते रहते हैं !  
         अब मान लीजिए की उस व्यक्ति ने किसी डिश का आर्डर किया और वो डिश किसी कमरे में है ही नहीं तो उसे कैसे मिल सकती है ! हाँ वो खुद कमा  सकता है लेकिन यदि उसने अपने होटल के कमरों के खाली स्थान को पूर्णतया भर दिया है तो फिर कोई उपाय नहीं है ! फिर एक बात समझ में नहीं आई की ग्रहों ने क्या दिया ! ग्रह तो केवल सप्लाई का काम करते हैं , तो फिर शनि खराब कैसे और गुरू अच्छा कैसे ! अब यदि शनि के कमरे में केवल अच्छा सामान ही रखा होगा तो अपने कार्यसमय में वह केवल अच्छा ही दे पाएगा बुरा नहीं और गुरू के कमरे मैं सबकुछ खराब रखा  है तो वह अच्छा कैसे देगा सोचें , हाँ परोसने का ढंग उनका अपना अपना हो सकता है लेकिन परोसेंगे तो वही जो पीछे से मिलेगा ! यही वो बात जिसे समझने का प्रयत्न मेरे जैसे और भी नए ज्योतिष विद्यार्थियों को करना  चाहिए ताकि अच्छे बुरे का दोष ग्रहों के सर न मढा  जाऐ  और व्यक्ति स्वयं इसके लिए जिम्मेदार रहे , कि मिल तो वही रहा है जो मैंने जमा किया है ग्रह तो केवल माध्यम है !इस विषय पर चर्चा आगे भी जारी रहेगी ............



गृह लक्ष्मी

घर और मकान में अंतर है - मकान ईंट और सीमेंट से बनता है जबकि घर सदस्यों और उनके प्रेम से . किसी भी घर में प्रेम,सौहार्द और शांति बनाए रखने और सब कुछ कुशल मंगल रखने में स्त्रियों का महत्वपूर्ण योगदान होता है . ज्योतिषीय दृष्टिकोण से घर के माहौल पर स्त्रियों का क्या प्रभाव होता है ,यहाँ बात करते हैं :- 
             ज्योतिष के अनुसार मन की शांति और आत्मिक प्रेम के लिए जो  ग्रह  जिम्मेदार होते हैं :-

१ . चन्द्रमा :- मन ( चन्द्रमा मनसो  जातः )
२ . शुक्र :- आत्मिक प्रेम ( नेमिचंद्र शास्त्री: भारतीय ज्योतिष  )

                      ज्योतिष के अनुसार ये दोनों ही ग्रह स्त्रियों पर अपना आधिपत्य रखते है . चन्द्रमा माता का कारक होता है और शुक्र पत्नी का !
               अतः जिस प्रकार मन की शांति  और आत्मिक प्रेम के लिए चन्द्रमा और शुक्र का अच्छी स्थिति में होना आवश्यक है ,उसी प्रकार घर के शांतिमय माहौल के लिए घर के शुक्र ( पत्नी ) और घर के चन्द्रमा ( माता ) का अच्छी स्थिति में होना आवश्यक है !
           यहाँ कुछ बातों के बारे में जिक्र करना चाहूँगा जिनके अनुसरण के द्वारा स्त्रियाँ अपने घर की आत्मा में नयी उमंग फूंक सकती है :-

१ . सुबह सबसे पहले उठें और सर्वप्रथम कार्य हो , कि आप नित्य कर्म से निवृत्त हो स्नान करें .
२ . घर की सफाई के बाद देहली पूजन अवश्य करें .
३ . सुबह एक बार धुप जलाकर पूरे घर में आरती करें .
४ . आवाज़ में हमेशा सौम्यता रखें .
              सबसे महत्वपूर्ण बात कि यदि चद्र और शुक्र का शुभ संयोग हो तो जीवन में चार चाँद लग जाते हैं , उसी प्रकार यदि घर में भी इन दोनों का शुभ  संयोग हो तो घर के सभी सदस्यों के जीवन में चार चाँद लग जाते हैं . अब यदि मन प्रसन्न हो और आत्मा में प्रेम हो तो जीवन की कल्पना सहज ही की जा सकती है !
                 सुखमय जीवन की शुभकामनाओं के साथ आंशिक विराम लेता हूँ ...... शुभम .



Monday, August 24, 2015

तैंतीस कोटि या तैंतीस करोड़ देवता

                                             देवताओं की संख्या के बारे में बाकी जानकारी तो आप इन्टरनेट पर से कहीं भी हासिल कर सकते हैं मुझे जो बात कुछ विशेष लगी उसका जिक्र यहाँ कर रहा हूँ  . देवी - देवताओं की संख्या को लेकर मैं भी यही सोचता रहा था , कि देवता तो तैंतीस करोड़ होते हैं . एक बार मैंने सुना कि जोधपुर में तैंतीस  करोड़ देवी - देवता का मंदिर है वहाँ गया भी पर कुछ समझ नहीं आया ..... अब फिर वही उधेड़बुन शुरू हो चुकी थी ............ पर किया जाये तो क्या ?


                                                         फिर एक दिन सिद्धार्थ भाईसाब (Astrologer Sidharth ) ने बताया की देवता तैंतीस प्रकार के होते हैं . कोटि का आशय प्रकार से है न कि करोड़ से . बात समझ तो आ चुकी थी लेकिन यह सब कहाँ वर्णित है इसकी खोज के दौरान जो पता चला वह लिखे देता हूँ -

१. ऋग्वेद १/१३९/११ के अनुसार कुल तैंतीस देवता हैं जिनमें से ११ पृथ्वी में , ११ अन्तरिक्ष में और ११ द्युलोक में है .
२. शतपथ ब्राह्मण ११/६/३/५ के अनुसार ८ वसु , ११ रूद्र ,१२ आदित्य ,१ इंद्र और एक प्रजापति कुल तैंतीस देवता हैं .
                       यहाँ "कोटि" शब्द प्रकार - वाचक है संख्या - वाचक नहीं . 

Thursday, September 15, 2011


ग्रह:सूर्य

                                                                  1.सूर्य

                                             "सूर्य आत्मा जगत्स्तथुषश्च"
 सूर्य ग्रहों में राजा है!इसकी जाति राजक्षत्रिय है!इसका रंग रक्त के समान है!सूर्य के देवता अग्नि है!इसके अधिपति शिव है!सूर्य की दिशा पूर्व दिशा है!यह नैसर्गिक पाप ग्रह ना होकर नैसर्गिक क्रूर ग्रह है!
वैज्ञानिक दृष्टिकोण:-सूर्य वास्तव में एक तारा है,जो हमारे सौरमंडल को बाँधे रखने का कार्य करता है!सूर्य ही सौरमंडल का केंद्र बिंदु है,जिसके चारों ओर ग्रह और उपग्रह घूर्णन करते हैं!इसका कारण है,कि सूर्य से ही सभी पिंडों को जीवनी शक्ति प्राप्त होती है!सूर्य के बिना हमारे सौरमंडल और जीवन की कल्पना भी नहीं की जा सकती!यह पृथ्वी के सबसे नजदीक का तारा है!इसीलिये अन्य तारों की अपेक्षा अधिक चमकदार और बड़ा प्रतीत होता है!सूर्य पर हाइड्रोजन गैस का भण्डार है,जिसकी आपस में संयोजित होने की क्रिया से जो असीमित ऊर्जा विसर्जित होती है उसके अंश मात्र से पृथ्वी पर जीवन है,सभी ग्रहों का वातावरण है!
पौराणिक विवेचन:-पुराणों में आलेख मिलते हैं,कि दक्ष प्रजापति की दो कन्याओं दिति और अदिति का विवाह कश्यप मुनि के साथ हुआ था!अदिति के गर्भ से सूर्य का जन्म हुआ इसीलिये इसे आदित्य कहा जाता है!पौराणिक मान्यताओं के अनुसार सूर्य के रथ में सात घोड़े जुते होते हैं!सूर्य ने संज्ञा और छाया से विवाह किया!छाया से शनि नामक पुत्र उत्पन्न हुआ जो पिता के समान बलशाली है!
पर्यायवाची:-सूर्य को अंग्रेजी में SUN,अरबी मैं आफताब,फारसी में खुरशेद कहते हैं!हिन्दी में इसे आदित्य,अर्क,अर्यमा,अंशुमाली,ग्रहपति,दिनकर,दिवाकर,प्रभाकर,भानु,मार्तंड,रवि,सविता,भास्कर,मिहिर,दिनेश इत्यादि नामों से जाना जाता है!
वैदिक मंत्र:-  ॐआकृष्णेन रजसा वर्त्तमानो निवेशयन्नमृतं मर्त्यन्च !
                      हिरण्ययेन सविता रथेना देवो याति भुवनानि पश्यन !!
तांत्रिक मंत्र:- ॐ ह्राँ ह्रीं ह्रौं सः सूर्याय नमः !!
स्वामित्व:-रवि सौरमंडल की आत्मा है,इसके बिना सौरमंडल का अस्तित्व संभव नहीं है!अर्थात जीवन के लिए जितनी भी आवश्यक वस्तुएं हैं उन सब पर सूर्य का ही अधिकार है!हो सकता है पढ़कर ऐसा प्रतीत हो,कि जीवन के लिए तो वायु,भोजन और जल तीनों ही आवश्यक है,फिर इन सब पर सूर्य का अधिकार कैसे है!सूर्य के कारण ही पृथ्वी के पास वह शक्ति है,कि वायु और जल पृथ्वी की सतह पर उपलब्ध है और हमें भोजन प्रदान करने वाला वनस्पति जगत भी अस्तित्वमान है!रवि की ऊष्मा शरीर को जलाने वाली नहीं बल्कि शरीर के जीवित रहने के लिए जरूरी होती है!अतः आत्मा पर सूर्य का स्वामित्व है!आत्मा लौ के रूप में ऊर्ध्वगामी होकर ह्रदय में अवस्थित होती है अतः ह्रदय पर भी इसी ग्रह का अधिकार है!ह्रदय से जुड़े विभिन्न प्रकार के भाव जैसे क्षमाशीलता,अनुशासन भी सूर्य के ही अधिकार में है!
शारीरिक लक्षण एवं रचना:-इनकी आँखों का रंग धुप के जैसा होता है!अब बात आती है,कि धूप का रंग कैसा है तो गौर से देखने पर पता चलेगा कि धूप का रंग शहद के समान हल्का भूरा होता है!इनके शरीर में भी एक शहद जैसे रंग की एक परत चढी महसूस होती है!इनका चेहरा गोल होता है!यह हृदय का कारक है!पुरुषों में दांयी और स्त्रियों में बाँई आँख पर इसका स्वामित्व होता है!पेट में पाई जाने वाली जठराग्नि पर भी सूर्य का अधिकार है!
चरित्र में निहित विशेषताएं:-निःस्वार्थ प्रेम सूर्य की सबसे बड़ी विशेषता है!यह बिना भेदभाव के सबके लिए समान व्यवहार रखता है!इसकी दूसरी विशेषता है नियमित होना जिस प्रकार सूर्य नियमित होता है उसी प्रकार सूर्य के प्रभाव क्षेत्र में आने वाला व्यक्ति भी नियमित होता है!ईश्वर के प्रति सच्चा प्रेम होता है!ये ताकतवर किन्तु न्यायप्रिय होते हैं!इच्छाशक्ति बहुत ही प्रबल होती है!ये कभी थकते नहीं हैं!इनके व्यक्तित्व में एक विशेष आकर्षण होता है!दूसरों पर शासन करने की कला और ऊर्जा होती है!ईमानदारी इनकी चारित्रिक विशेषता में चार चाँद लगा देती है!
बीमारियाँ:-दिल से सम्बंधित बीमारियाँ,गर्मी के कारण होने वाले रोग,ज्वर,दृष्टि-दोष,रीढ़ सम्बन्धित रोग,पाचन से सम्बंधित समस्याएं,आत्म शक्ति की कमी!ब्लड-प्रेशर भी रवि के आधिपत्य में है क्योंकि रक्त का प्रवाह धीरे होगा या तेज यह हृदय के आकुंचन पर निर्भर करता है और हृदय पर सूर्य का अधिकार है!सूर्य के पीड़ित होने पर मुंह से थूक आता रहता है!
व्यवसाय:-राजकीय सेवा,ऊर्जा उत्पादन,दवाइयों से जुड़े व्यवसाय,धन,अनाज के कारोबार,प्रकाश देने वाली चीजें जैसे बल्ब,ट्यूब लाईट के कारोबार,डॉक्टर इत्यादि!सोने का कारोबार!सूर्य स्थिरता का कारक है यह जीवन में स्थायित्व को निर्देशित करता है!पिता द्वारा प्रदत्त स्वयं का काम!
स्टॉक मार्केट:-POWER SECTOR,NUCLEAR ENERGY,GOVT. PUBLIC SECTOR UNITS,MEDIA.
COMMODITY MARKET:-सोना,ताम्बा,कांसा,GUN METAL,माणक,गेंहू,पटाखे,ग्रेफाईट और सल्फर!
राजनीतिक दृष्टिकोण:-प्रशासकों को निर्देशित करता है!राजा,तानाशाह,बड़े शाही नेता,विभागों के अध्यक्ष,वे लोग जिनके पास शक्ति व अधिकार है!ये एक होता है,जो सभी को नियंत्रित करता है यदि इस लिहाज से देखा जाये तो सूर्य के सभी गुण राजशाही में राजा के अंदर देखने को मिलेंगे लोकतंत्र में नहीं क्योंकि लोकतंत्र में तो शासक जनता होती है शक्ति का मुख्य पुंज नागरिक होते है और नेता तो केवल कार्यवाहक होते है या यूं कहें तो नौकर होते है इसलिए मुझे ऐसा लगता है,कि विभागाध्यक्ष तो फिर भी सूर्य के प्रभाव में हो सकते हैं पर नेता तो सेवक हैं मालिक नहीं हाँ ये बात और हैकि ये लोग आगे जाकर स्वयं को लोकतंत्र का उत्तराधिकारी समझने लगें!
पदार्थ:-अखरोट,नारियल,इलाइची,केसर,अजवायन,चावल,मिर्ची,बादाम,मूंगफली,पाइन,विदेशी मुद्रा,दवाएं,
बाजार और संस्थान:-रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया,स्टॉक एक्सचेंज,सरकारी दफ्तर,सोना और इसकी कीमतों में उतार चढ़ाव,सरकारी ऋण इत्यादि!
पेड़-पौधे:-कांटेदार पेड़,बादाम,संतरे,केसर,शीशम,गुलाब और केदार के पेड़ व पौधे!इनके अलावा चिकित्सकीय प्रयोग में आने वाले पादप!
स्थान:-जंगल,शिव मंदिर,सरकारी ऑफिस,पंचायत समिति,ऊर्जा विद्युत केंद्र,विद्युत निर्माण केंद्र,दवाई की दूकान इत्यादि!
अंक:-"एक" पर निर्विवाद रूप से सूर्य का अधिकार है!
दिन,राशि और नक्षत्र:-रविवार का मालिक सूर्य है!राशियों में सिंह राशि का स्वामित्व सूर्य के पास है!सत्ताईस नक्षत्रों में से कृतिका,उत्तराफाल्गुनी और उत्तराषाढा नक्षत्रों का मालिक भी सूर्य है!
रत्न:-माणक सूर्य का प्रमुख रत्न है!इसे सोने में मढवाकर पहना जा सकता है!यह रोगप्रतिरोधक क्षमता को बढाने के साथ-साथ सरकारी साख भी बढाता है!
जीव-जंतु:-शेर,घोडा,मवेशी और जंगल में रहने वाले अन्य जंगली जानवर!
       सूर्य ग्रीष्म ऋतु का मालिक होता है!यह एक माह तक एक राशि में रहता है और इसकी एक दिन की गति लगभग एक अंश होती है!सौरमंडल में सूर्य के गति को अयनांश कहा जाता है!घर में सूर्य का स्थान पूजन-कक्ष होता है!सूर्य प्रभावित व्यक्तियों के घर का दरवाजा पूर्व दिशा मैं होता है!सूर्य चालित व्यक्ति के दांये नितंब पर निशान बना होता है!

Friday, June 3, 2011

MONEY WITH शनि (SATURN)



                       विज्ञानं ज्योतिष और दर्शन को मिलाने के बाद इस छोटी पोस्ट को लिखने का मन बनाया है !शनि के बारे में विस्तार से चर्चा तो किसी आगामी लेख में  करेंगे लेकिन यहाँ शनि और MONEY (धन)के बारे में एक विचार मन में प्रस्फुटित हुआ उसी को यहाँ लिखने का प्रयास कर रहा हूँ ! आशा है विधु पाठकगण सार ग्रहण करने का प्रयास करेंगे ! शनि ग्रह  की  एक विशेषता यह भी होती है , कि वह सोखने या आकर्षित करने का गुण रखता है !जैसे यहाँ देखें :-
१ . भैंस सूर्य के ताप को अत्यधिक सोखती है !
२ .पूर्णतया शनि से प्रभावित साधू स्वतः आकर्षण का कारक  होता है !
३ .विज्ञान में भी सूर्य के ताप और प्रकाश का पूर्ण अवशोषण करने के लिए  काले रंग का इस्तेमाल किया जाता है !" भौतिक विज्ञान की आदर्श क्रिश्निका  "इसका अच्छा उदहारण है !
४ . एक साधारण कहावत का उदहारण भी यहाँ देना चाहूँगा जो हम लोग अक्सर कहा करते है "इसकी आँखों में शनि है " क्यों करते है या नहीं !
  अतः कहा जा सकता है , कि शनि की स्थिति आपके लिए श्रेष्ठ है तो जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में सफल हो सकते हैं !अब ये शनि श्रेष्ठ है या नहीं और अगर नहीं तो क्या करें की यह अच्छी स्थिति में आ जाये इसकी चर्चा अगले लेखों में की जायेगी ! सभी ग्रहों का विस्तार से वर्णन मेरे मुख पृष्ठ के पास " ज्योतिष योग संग्रह " वाले पेज पर करूँगा !जिज्ञासु पाठक वहाँ देख सकते हैं !
     मेरे लेख ज्योतिष के जिज्ञासू विद्यार्थियों के साथ - साथ सभी साधारण लोगों के लिए उपयोगी हो सके इसलिए मुख पृष्ठ पर हमेशा साधारण जीवन और ज्योतिष , अध्यात्म और दर्शन का मिलाजुला लेख लिखने का प्रयास करता हूँ !  ज्योतिषी लोग  "ज्योतिष योग संग्रह " पृष्ठ पर अधिक जानकारी के लिए देख सकते हैं !
आज का टिप :- शनि की दशा,या दुसरे प्रभाव युक्त समय में प्रतिदिन २ से ३ किलोमीटर की पैदल यात्रा अवश्य करनी चाहिए !इससे शनि का  SIDE - EFFECT  खत्म हो जाता है !
! जय गणेश ! 
!! जय जय गणेश !!
                    


Saturday, May 28, 2011

स्त्रियाँ :- एक विलक्षण तथ्य

इस ब्लॉग के लेखों को दिए गए लिंक पर स्थानांतरित कर दिया गया है।

zyotish.blogspot.in