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Friday, March 16, 2018

TAURUS-ZODIAC SIGN "वृषभ राशि"

              राशि चक्र की द्वितीय राशि वृषभ है जो शुक्र की ठंडक से परिपूर्ण शांत और स्थिर राशि है. इस राशि के जातक सहनशील और और निरंतर काम करने वाले तथा शक्ति होते हुए भी जंगली नहीं होते हैं , बल्कि अपनी शक्ति का सदुपयोग करना जानते हैं. इन्हें सामान्यतया उतावला होते हुए नहीं देखा जा सकता.
       
               बालकों के विषय में बात की जाए तो ऐसे बालक जिनकी माताओं को अक्सर दूसरी महिलाएं यह कहते हुए पाई जाती है की तेरा  बच्चा तो बहुत ही सयाना है एक बार कहीं पर बिठा दो तो बैठे बैठे ही खेलता रहता है और रोता भी नहीं है. सामान्यतया मुस्कुराने वाले और अपनी मुस्कुराहट से मन मोहने वाले यह बालक वृषभ के होते हैं. शुक्र की मुस्कुराहट सदैव इनके होठों पर रहती है और वृषभ की स्थिरता इनके एक जगह बैठने का कारण. माता इन्हें एक स्थान पर बिठाकर आसानी से अपना कार्य कर सकती हैं मोहल्ले के आयोजन में जब मेष राशि के बालकों द्वारा दो खंभों के बीच दौड़ का आयोजन होता है तो उस आयोजन में भाग न लेने वाले और एक स्थान पर बैठकर "चिड़िया उड़ - कबूतर उड़" के खेल खेलने वाले जातक वृषभ राशि के होते हैं. सामान्य रूप से यह ऐसा कोई कार्य नहीं करते जिसके लिए उन्हें डांट खानी पड़े लेकिन  यदाकदा ऐसा होने पर यदि कोई इन्हें  डांटता है  तो ये  बिल्कुल सौम्य बने रहते हैं.

               ये  व्यक्ति सदैव ही मेहनती होते हैं और मेहनत करने में कोई कसर नहीं छोड़ते. वृषभ राशि का प्रतीक बैल है अतः बैल की सहनशीलता,शक्ति, सामर्थ्य, लगन यह सभी वृत्तियां इन लोगों में पाई जाती हैं. ये  अपने विचार बिना डरे हुए सभी के सामने रखते हैं और अपने विचारों को बार-बार नहीं बदलते. हर किसी के मामले में टांग अड़ाने की इनकी आदत नहीं होती. ये  व्यक्ति व्यवहारिक, भरोसा करने वाले और  भरोसे के लायक तथा  शांत ,धैर्यशील  और स्नेह रखने वाले होते हैं . इनकी आत्मशक्ति बहुत ही दृढ़ होती है तथा इनकी सहनशक्ति भी असाधारण होती है. सौंदर्य, संगीत, कला इत्यादि से इन्हें बहुत लगाव होता है. ये  लोग अधिक समय तक गुस्से में नहीं रह पाते क्योंकि इनका मूल स्वभाव ही प्रसन्न रहना होता है. इनका क्रोध बहुत ही भयंकर होता है किसी ज्वालामुखी के फटने समान,क्रोध आने पर ये कई तरह से नुकसान भी कर देते हैं और कई बार स्वयं का नुकसान भी कर लेते हैं.अतः प्रयास ये किया जाना चाहिए कि इन्हें गुस्सा ना आये. वृषभ राशि में भोजन पकाने का बागवानी का  शौक भी पाया जाता है.

             इनकी कद काठी के विषय में यदि बात की जाए तो मेरा ऐसा मानना है कि यदि शारीरिक कद काठी से ज्योतिषीय राशि को पहचानना हो तो सबसे आसानी से पहचान में आने वाले जातक वृषभ और तुला के ही होते हैं. इनका शरीर गोलाई लिए हुए चेहरा चौड़ा  और चौकोर, गर्दन मोटी ,आंखें भूरे रंग और काले रंग की मिश्रित, कंधे बड़े और मांसपेशियां काफी उन्नत होती है. इन्हें देख कर आसानी से यह पता लगाया जा सकता है कि यह जातक वृषभ या तुला के हैं, लेकिन वृषभ और तुला में अंतर स्पष्ट पता करने के लिए काफी अनुभव की आवश्यकता होती है,

              जब धैर्य का उदाहरण देना हो तो लोग वृषभ वाले व्यक्तियों का उदाहरण दिया करते हैं अतः ये लोग दूसरों के लिए प्रेरणा स्रोत भी होते है. इनकी इच्छा शक्ति बहुत ही प्रबल होती है और धन पर सदैव इनकी पैनी निगाह बनी रहती है. ये  लोग उत्सव धर्मी होते हैं तथा विभिन्न उत्सव में भोजन का विशेष रूप से मिठाई का पूर्ण आनंद उठाते हैं.  ग्रहणशील होना इन की सबसे बड़ी विशेषता है, ये  पने दोस्तों के लिए व परिवार के लिए सदैव समर्थन का वातावरण बनाए रखते हैं अतः इन सभी का विश्वास जीतने में सफल रहते हैं. प्राकृतिक सुंदरता को देखकर ये सदैव ही प्रफुल्लित होते हैं. निरर्थक बातें नहीं करते तथा अपने अंतर्ज्ञान और ज्ञान से अनुभूत बातें ही साझा करते हैं तथा अपने विचारों पर अडिग रहते हैं. यह श्रेष्ठ दीर्घकालिक योजनाएं बनाते हैं और उन पर अमल भी करते हैंतथा आलोचना के उपरांत भी अपनी योजना के कार्यान्वयन में लगे रहते हैं और लंबे संघर्ष के बाद सफल होने पर विजय का उत्सव भी मनाते हैं.

              जिन लोगों को ये चाहते हैं उनके प्रति सदैव ही निष्कपट होते हैं. सत्य और ईमानदारी सदैव आपकी सफलता का मूलमंत्र होता हैतथा  आपके द्वारा की गई  आलोचना सच्ची होती है और सच्ची आलोचना करने से आप घबराते नहींहैं . धैर्य, त्याग और स्वीकार्यता क्या है यह उदाहरण आप लोगों के समक्ष प्रस्तुत करते हैं.
         
          किसी न किसी प्रकार की कला से इन्हें विशेष प्रेम होता है. धनोपार्जन से यह कभी भी सकुचाते  नहीं है और इनकी दृढ मान्यता होती है कि "जल्दी का काम शैतान का". क्रोधित होने पर कई बारी है प्रचंड रूप धारण कर लेते हैं तथा भयंकर भी हो जाते हैं अतः इन लोगों को अपने इस स्वभाव पर नियंत्रण करना सीखना चाहिए.इन लोगों में ऊर्जा की सदैव प्रचुरता होती है. ये लोग शारीरिक असमर्थता को स्वीकार नहीं कर सकते और रोगों को प्रकट किए बिना लंबे समय तक साधारण जीवन यापन करते रहते हैं. इनकी आरोग्य शक्तियां संतुष्टि जनक नहीं होती अतः रोग होने पर लंबे समय के बाद ही रोग मुक्ति संभव हो पाती है.
                                                            Related image
                वृषभ राशि कंठ को सूचित करती है शुभ प्रभाव होने पर ये लोग गायक हो सकते हैं तथा अशुभ प्रभाव होने पर कंठ से जुड़ी समस्याओं का समस्याओं का शिकार भी हो सकते हैं. भचक्र की द्वितीय राशि वृषभ को कोषागार की राशि कहा गया है अतः इन लोगों में धन को इकट्ठा करने की प्रवृत्ति पाई जाती है चाहे वह रकम छोटी हो या बड़ी इन लोगों के द्वारा संचित अवश्य की जाती है तथा खर्च होने की स्थिति आने पर भी यह उस धन का कुछ अंश सदैव बचा कर रखते हैं क्योंकि यह आर्थिक संकटों का सामना नहीं करना चाहते अतः कभी भी अनावश्यक खर्च नहीं करते.  विशेष रूप से कहा जाए तो "ये लोग किसी के लिए हानिकारक नहीं होते."

Monday, August 24, 2015

तैंतीस कोटि या तैंतीस करोड़ देवता

                                             देवताओं की संख्या के बारे में बाकी जानकारी तो आप इन्टरनेट पर से कहीं भी हासिल कर सकते हैं मुझे जो बात कुछ विशेष लगी उसका जिक्र यहाँ कर रहा हूँ  . देवी - देवताओं की संख्या को लेकर मैं भी यही सोचता रहा था , कि देवता तो तैंतीस करोड़ होते हैं . एक बार मैंने सुना कि जोधपुर में तैंतीस  करोड़ देवी - देवता का मंदिर है वहाँ गया भी पर कुछ समझ नहीं आया ..... अब फिर वही उधेड़बुन शुरू हो चुकी थी ............ पर किया जाये तो क्या ?


                                                         फिर एक दिन सिद्धार्थ भाईसाब (Astrologer Sidharth ) ने बताया की देवता तैंतीस प्रकार के होते हैं . कोटि का आशय प्रकार से है न कि करोड़ से . बात समझ तो आ चुकी थी लेकिन यह सब कहाँ वर्णित है इसकी खोज के दौरान जो पता चला वह लिखे देता हूँ -

१. ऋग्वेद १/१३९/११ के अनुसार कुल तैंतीस देवता हैं जिनमें से ११ पृथ्वी में , ११ अन्तरिक्ष में और ११ द्युलोक में है .
२. शतपथ ब्राह्मण ११/६/३/५ के अनुसार ८ वसु , ११ रूद्र ,१२ आदित्य ,१ इंद्र और एक प्रजापति कुल तैंतीस देवता हैं .
                       यहाँ "कोटि" शब्द प्रकार - वाचक है संख्या - वाचक नहीं . 

Thursday, October 4, 2012

धार्मिक कर्म में मौलि बंधन क्यों ?

       किसी भी शुभ कार्य से पहले जैसे कोई पूजा -  अनुष्ठान , गृह प्रवेश ,दीपावली की पूजा  या अन्य कोई भी पूजन सर्वप्रथम पंडित जी यजमान (यज्ञमान) को तिलक करते हैं और मौली बंधते हैं फिर पूजा आरम्भ होती है ! मौली बंधते वक़्त इस  मंत्र का उच्चारण  जाता है:-


        येन  बद्धो बलीराजा दावेंद्रो महाबलः !
            तेन त्वामनुबध्नामि रक्षे  माचल माचल !! 


       ये प्रथा कब शुरू हुई और इसके महत्त्व के विषय में अनेक आख्यान शास्त्रों में मौजूद हैं !मौली बंधने की परंपरा तब से चली आ रही है, जब से महान , दानवीरों में अग्रणी महाराज बलि की अमरता के लिए वामन भगवान् ने उनकी कलाई पर रक्षा सूत्र बांधा था !

            इसे रक्षा  कवच के रूप में भी  शरीर पर बांधा जाता है !इन्द्र जब वृत्रासुर से युद्ध करने जा रहे थे तब इंद्राणी शची ने इन्द्र की दाहिनी भुजा पर रक्षा-कवच के रूप में मौली को बाँध दिया था और इन्द्र इस युद्ध में विजयी हुए ! 

      स्वास्थ्य के अनुसार मौली-बंधन से वात पित्त और कफ तीनों का शरीर में संतुलन बना रहता है और शरीर नीरोग रहता है !साधारणतया हम देखते हैं,कि यदि कोई कर्मकांडी पुरोहित जो कई दिनों तक चलने वाले अनुष्ठान में  हैं और दुर्भाग्यवश उनके कुटुंब में किसी निकट संबंधी की मृत्यु हो जाती है तो भी उनको "सूतक"का दोष नहीं लगता है और वो अपना अनुष्ठान निर्विघ्न पूरा कर सकते हैं,क्योंकि क्योंकि उनहोंने पूजन आरम्भ होने पर बंधी जाने वाली मौली बाँध  रखी है!यानी की मौली के प्रभाव से उस बड़े अनुष्ठान पर बाधा ताल जाती है ! 





    

Monday, January 9, 2012

4.रोहिणी


नक्षत्र:रोहिणी

                                                                     4.रोहिणी 
रोहिणी नक्षत्र का वैदिक नाम रोहिणी ही है!इस नक्षत्र में पांच तारे मिलकर शकट अर्थात गाड़ी की आकृति का निर्माण करते हैं!संहिता ग्रंथों में रोहिणी को शकट-भेदन कहा गया है!रोहिणी का अर्थ है ऊपर की ओर बढ़्ने वाली वस्तुएं!इस नक्षत्र का स्वामी ब्रह्मा को माना गया है!नौ ग्रहों में चंद्र रोहिणी नक्षत्र का अधिपति है!यह स्थिर नक्षत्र है,अर्थात इसमें स्थिरता वाले कार्य जैसे गृह-प्रवेश,बिजाई,व्यापार शुरू करना,मंदिर बनाना आदि कार्य शुरू किये जा सकते हैं!यह ऊर्ध्वमुख नक्षत्र है अर्थात ऊपर की ओर बढ़ने वाले कार्य जैसे नौकरी शुरू करना,बड़े पद को ग्रहण करना,और विकासशील कार्य शुरू किये जा सकते हैं!चैत्र मास का रोहिणी नक्षत्र शून्यसंज्ञक होता है,इस दिन कोई शुभ कार्य नहीं करना चाहिए!शनिवार को रोहिणी नक्षत्र हो तो अमृतसिद्धि योग का निर्माण होता है और यही नक्षत्र सोमवार को हो सर्वार्थसिद्धि योग का निर्माण होता है!अपवाद के रूप में शनिवार को रोहिणी नक्षत्र हो और उसी दिन एकादशी भी हो तो विषयोग का निर्माण होता है,जो सभी शुभ कार्यों के लिए वर्जित है!इस नक्षत्र के लिए जामुन की पूजा की जाती है!रोहिणी नक्षत्र की जाति किसान,मजदूर या हलवाहे की होती है!यह नक्षत्र स्त्रीसंज्ञक होता है!गोत्र का संबंध अत्रि मुनि से है!इसकी नाड़ी अन्त्या,गण मनुष्य और योनि सर्प की होती है!यह कालपुरुष की आँखों का स्वामित्व रखता है!अनुमष्तिष्क,ग्रीवा कशेरुक और तालू पर इसी नक्षत्र का अधिकार होता है!भूसे की गाडी के आकार जैसा यह नक्षत्र फरवरी माह मे रात को 9 बजे तक दिखाई देता है!
कारकत्व:-रोहिणी नक्षत्र अधिकता से सम्बंधित है जैसे कोई आपको प्रश्न करे कि बारिश होगी क्या? उस वक्त चंद्र और लग्न का सम्बन्ध रोहिणी नक्षत्र से हो तो अच्छी बारिश होती है!जुबान के पक्के,व्यापारी,अधिकारी,योगी,पानी के जीव,खेती करने वाले,जंगली प्रदेश!
नक्षत्रफल:-रोहिणी का संबंध विकास से है!सत्यवादी,चतुर,तेजस्वी,स्थिति को भांप लेने वाले,निडर,सांसारिक सुखों में तल्लीन,खेती से प्रेम,वाक्-पटु होते हैं!
पदार्थ:-रस वाले पदार्थ,ऊन,समय सात दिन!
व्यक्ति:-इनकी आँखें बड़ी-बड़ी होती है!अपने लक्ष्य के प्रति निष्ठावान होता है!नए विचार व परिवर्तन का स्वागत करता है!व्यवस्थित ढ़ग से काम करना रोहिणी नक्षत्र का विशिष्ट गुण है!जलचर,कृषक,राजसिक प्रवृत्ति के लोग,ट्रेवल एजेंट,जहाज का कप्तान इत्यादि!
रोहिणी नक्षत्र का वैदिक मंत्र:-ब्रह्मजज्ञानं प्रथमम्पुरस्ताद्विसीमः सुरुचे वेन आयवः सबुध्न्या उपमा अस्य विष्ठा: सतश्च योनिमसतश्च विध: !!  
बीमारियाँ:-गले की खराश,पाँव व छाती में दर्द,स्त्रियों को अनियमित मासिक!
मानसिक गुण:-सौंदर्य-प्रेमी,मधुर भाषी,स्थिर मानसिकता,प्रिय मिजाज वाला,शुद्ध ह्रदय,परोपकारी!
व्यवसाय:-यह कृ्षि उत्पादन व खनिज उद्योग से जुडा़ है!यात्रा वृत्तांत लेखक,आवास का क्रय-विक्रय करने वाला,
विशेष:-पौराणिक कथाओं के अनुसार रोहिणी चन्द्रमा की सत्ताईस पत्नियों में सबसे सुदर है!कृष्ण जी का जन्म भाद्रपद मास की कृष्णपक्ष अष्टमी तिथि को रोहिणी नक्षत्र में हुआ था!

3.कृतिका


नक्षत्र:कृतिका

कृतिका नक्षत्र या सात बहने                                  3.कृतिका
कृतिका नक्षत्र में छः तारे मिलकर खुरपे या फरसे की आकृति का निर्माण करते हैं!वैदिक साहित्य में कृतिका नक्षत्र में सात तारे माने गए है!तैत्तिरीय ब्राह्मण में कृतिका नक्षत्र में सात आहुतियों का प्रावधान है!इस नक्षत्र पर अग्निदेव का स्वामित्व है!ग्रहों में सूर्य इस नक्षत्र का अधिष्ठाता है!कृतिका नक्षत्र दो तरह का माना जा सकता है,पहला भाग जो मंगल की मेष राशि के अंतर्गत आता है और दूसरा जो शुक्र की वृषभ राशि के अंतर्गत आता है!यह मिश्र नक्षत्र है,इसमें लगभग सभी कार्य किये जा सकते हैं!कृतिका भी अधोमुख नक्षत्र है,अतः इसमें भी भरणी के समान अधोगमन वाले कार्य किये जा सकते हैं!कार्तिक मास में कृतिका नक्षत्र के दिन कोई भी शुभ या विशेष कार्य नहीं करना चाहिए क्योंकि यह शून्यसंज्ञक होता है!मंगलवार को कृतिका नक्षत्र सर्वार्थसिद्धि योग का निर्माण करता है,इस नक्षत्र से अमृतसिद्धि योग नहीं बनता!इस नक्षत्र के लिए गूलर के वृक्ष की पूजा की जाती है!कृतिका ब्राह्मण जाति का नक्षत्र है!यह स्त्री जाति का नक्षत्र है और काल पुरुष के शरीर में भौहों का आधिपत्य रखता है!इसका राशि स्वामी मंगल,योनी मेष,नदी अन्त्य और गण राक्षस का होता है!आँखें और कार्निया पर भी इसी नक्षत्र का नियंत्रण होता है!कंठ नली और निचले जबड़े पर इस नक्षत्र का स्वामित्व होता है!
कारकत्व:-सुनार,लुहार,अग्नि से सम्बंधित कार्य करने वाले,ज्वलनशील पदार्थों का कार्य,तेज़ाब,गैस,यज्ञ कार्य करने वाले,गुप्त धन से सम्बंधित,तिजोरी,सुरंग,सफ़ेद फूलों के पदार्थ,BEAUTY PARLOUR,भाषा शास्त्र,व्याकरणाचार्य,ज्योतिषी,श्मशान,खान के कार्मिक इत्यादि!
नक्षत्रफल:-कम खाने वाले(वृष में हो तो अधिक खाने वाले)तेजस्वी "जहां जाये छा जाये"दानी,विपरीत लिंग के बारे में बातचीत के शौक़ीन,अनुशासित,तुनक मिजाज और लगनशील होते हैं!धार्मिक,संस्कारी,धनी और स्वाध्याय करने वाले होते हैं!नक्षत्र पीड़ित हो तो परस्त्रीगामी होते हैं!
पदार्थ:-तिल,जौ,हीरेसोना,चांदी,ताम्बा,लोहा आदि धातु!समय (आठ मास)!
व्यक्ति:-अग्निपूजक,पारसी,कर्मकांडी,अग्नि से जीविकोपार्जन करने वाले,मन्त्रज्ञ,R.B.I. के अधिकारी,हजामत बनाने वाले(नाई),INCOME-TAX,SALES-TAX,SERVICE-TAX,पंचांग व कैलेंडर छापने वाले!
कृतिका नक्षत्र का वैदिक मंत्र:-अग्निमूर्धादिवः ककुत्पतिः पृथिव्यामयम्!अपा गुं रेता गुं सिजिंवतिः!! 
बीमारियाँ:-कील-मुंहासे,दृष्टि-दोष,गर्दन के रोग,गले में रोग,घुटने पर निशान!
मानसिक गुण:-दोस्तों के झुण्ड में रहने वाला,आदर सत्कार में कुशल,विलासी,सामाजिक,रचनात्मक प्रवृत्ति,सरकार व राज्य कर्मचारियों से लाभ!
व्यवसाय:-सरकारी विभागों से लाभ,ऋणग्रस्त भी हो सकता है!कलाकार,शिल्पी,दवा का काम,अंतर्राष्ट्रीय व्यापारी,फोटोग्राफी का काम करने वाला!TAX-COLLECTOR,केशों का काम,इत्र का व्यापार इत्यादि!

Wednesday, July 6, 2011

ज्योतिष : पुरातन विवेचन :- आचार्य राज


आज बात कर रहा हूँ अपने पूजनीय गुरु श्री आचार्य राज द्वारा बताये गए एक पौराणिक किस्से का जिनका जिक्र उन्होंने अपनी पुस्तक "सितारों के अक्षर किरणों की भाषा" में भी किया है ! एक बात गुरूजी की किताबों के बारे में भी बताना चाहूँगा कि इनकी किताबें वास्तव में प्रसिद्द लेखिका अमृता प्रीतम के साथ संवाद है जिनका स्वरुप बाद में पुस्तकमय कर इनको प्रकाशित किया गया है ! दिल्ली के "किताब घर" से इनका प्रकाशन होता है ! इनकी दूसरी पुस्तक का नाम है "सितारों के संकेत"जिसमें आचार्य का स्वप्न ज्योतिष का गूढ़ ज्ञान दृष्टिगोचर होता है ! पुनः विषय पर आगे बढते हैं,आचार्य ने अपनी पुस्तक में ज्योतिष के उद्गम का विवेचन किया है, जिसका जिक्र मैं यहाँ उन्हीं के शब्दों में करने का प्रयास कर रहा हूँ ! 
     ज्योतिष की उत्पत्ति वेदों से होती है या ऐसा  कहें कि ज्योतिष वेदों का ही एक अंग हैं जिसे वेदों के नेत्र की संज्ञा दी गयी है !क्योंकि देखने का सामर्थ्य नेत्रों में होता है और ज्योतिष भी देखने का कार्य करता है !इस प्रकार सृष्टि के आरम्भ में ज्योतिष पर मूलतः प्रजापति ब्रह्मा का स्वामित्व था !जब जगन्नियन्ता परम पिता परमात्मा के आदेश से उन्होंने इस जगत के निर्माण का कार्य शुरू किया तो सर्वप्रथम उन्होंने तप के द्वारा सृष्टि के निर्माण की शुरुआत की !लेकिन कई युग बीत जाने पर उनके तप बल से आठ मानसिक पुत्रों को उन्होंने उत्पन्न किया !ये आठ पुत्र है सप्तर्षि और देवर्षि नारद !इसके बाद ब्रह्मा जी ने विचार किया कि इस प्रकार से मानसिक सृष्टि करने में तो करोड़ों युग बीत जायेंगे तो क्या किया जाय तब उनके मन में मैथुनी सृष्टि का विचार उत्पन्न हुआ ! उन्होंने अपने आठों पुत्रों को बुलाया और उनके समक्ष मैथुनी सृष्टि के विचार को रखा !उनके सात पुत्र तो मैथुनी सृष्टि स्वीकार करने के लिए तैयार हो गए "ये थे सप्तर्षि" लेकिन उनका एक पुत्र ने मैथुनी सृष्टि को स्वीकार नहीं किया और वो थे "नारद"!तब मैथुनी सृष्टि के विचार को अपनाने वाले पुत्रों के लिए ब्रह्मा ने स्त्री के निर्माण का कार्य शुरू कर दिया लेकिन काफी समय के बाद जब वे इस कार्य में पूर्ण रूप से सफल नहीं हो सके तो उन्होंने देवाधिदेव महादेव की शरण ली और महादेव ने प्रसन्न होकर पहले अर्धनारीश्वर रूप ग्रहण किया फिर नारी स्वरुप को अपने शरीर से अलग कर स्त्री जाति की उत्पत्ति की !इस प्रकार मैथुनी सृष्टि की शुरुआत हो गयी !फिर ब्रह्मा जी ने विचार किया कि मेरे सात पुत्र तो मैथुनी सृष्टि स्वीकार करके मर्त्यलोक में निवास करने चले गए अब मैं नारद को क्या दूं इस प्रकार विचार करते हुए ब्रह्मा जी ने नारद को वेदों में से ज्योतिष का ज्ञान प्रदान किया और नारद दैवज्ञ हो गए !दैवज्ञ वो होता है जो सात जन्म आगे और पीछे तक का ज्ञान ज्योतिष से प्राप्त कर लेता है !जब नारद भी इस कोटि को प्राप्त हो गए तो वह सदैव दैत्यों और देवताओं को आने वाले भविष्य के लिए पहले से ही सूचित करते रहते जिसके कारण कई बार सुनने को मिलता है , कि नारद ही देवताओं और दानवों को लड़ाने  का कार्य करते थे लेकिन वास्तव में नारद को सब कुछ पता होता था वो तो केवल आगाह करने का कार्य करते थे जो होना था वो तो निश्चित था !
             इस प्रकार ज्योतिष का पौराणिक  उद्गम "नारद पुराण"को माना जाता है !ऐसा कहा जता है , कि शुरुआत में इसमें 84 लाख श्लोक हुआ करते थे लेकिन वक्त की धुल में उड़ते - उड़ते ये श्लोक आज  नाम मात्र ही रह गए हैं !चाहें तो इस विषय पर ज्योतिषीगण नारद पुराण का पठन कर सकते हैं !  कहा जा सकता है कि वर्तमान में जो ज्योतिष का लेख विद्यमान है वह अपूर्ण है और सतत प्रयासों के द्वारा उनकी रचना पुनः करनी होगी !ज्योतिष को विभिन्न शाखाओं में विभाजन कर उनका तार्किक तरीकों से अध्ययन करना होगा !ज्योतिष फल बतलाने वाले पंडितों को ये बात समझनी होगी की विवाह की तिथी और नौकरी बताने वाला पंडित अचानक से बरसात का दिन ,चुनाव की जीत ,ज्वालामुखी का फटना आदि नहीं बता सकता क्योंकि ये ज्योतिष की अलग - अलग शाखाएं हैं लेकिन इस बात को समझे बिना पांडित्य को बरकरार रखने के लिए फलादेश किया जाता है और गलत होने पर पंडित जी के साथ साथ इस विषय को भी खामियाजा भुगतना पड़ता है !इसलिए बिना ज्ञान के ज्योतिष की विभिन्न शाखाओं में फलादेश करने से बचना चाहिए और पहले एक शाखा पर पूरी पकड़ करने का प्रयास करना चाहिए !मैं आह्वान करता हूँ भारत के उन सभी ज्योतिष से जुड़े लोगों का कि वो आगे बढे और जिस तरह से भी कर सकते हैं इस विषय को प्रामाणिक और उपयोगी बनाने में मदद करें ! गणेश जी हमें हमारे कार्य में सफल करे ! जय गणेश !

! जय गणेश ! 
! जय जय गणेश !!