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Wednesday, March 7, 2018

ARIES - मेष

       BEHAVIOUR  -   स्वभाव   

      राशि चक्र की प्रथम राशि है जो मंगल की दाहक अग्नि से परिपूर्ण ,निडर और निर्भीक राशि है . इस राशि के जातकों को सामान्य भय से विचलित होता हुआ नहीं देखा जा सकता चाहे वे उम्र में छोटे ही क्यूं न हों . चर राशि होने के कारण और मंगल की असीमित उर्जा से भरे इन बालकों को आसानी से पहचाना जा सकता है कि ये है मेष का बालक जो चुपचाप नहीं बैठ पा रहा और यदि किसी कारण वश उसे एक जगह बैठना पड़ भी जाए तो  उनकी आँखें और मष्तिष्क में घुमड़ते सवाल हर नयी जगह का पूरी तरह निरीक्षण अवश्य करते हैं . मोहल्ले में जब कोई आयोजन हो तो बच्चों की फ़ौज में उनका नेतृत्व करने वाला , इस खम्भे से उस खम्भे तक दौड़ का आयोजन करने वाला नेता मेष के अलावा और कौन हो सकता है भला . डर का तो जैसे शब्द इनके शब्दकोष में होता ही नहीं है , यदि कोई इन्हें डांट रहा है तो उसे भी ये अहसास हो ही जाता है कि ये बच्चा डरता तो नहीं है बस सुन रहा है क्योंकि इसे पता है कि अभी ये कुछ कर नहीं सकता और अपनी भाव भंगिमाओं से इस बात का अहसास भी ये बालक करवा ही देते हैं ."बुखार थोड़ा ठीक होते ही गली में खेलने चला गया"- ये महाशय मेष के ही हैं , ऊर्जा रुकने नहीं देती इनको फिर बुखार की क्या औकात .
                         
                               ये व्यक्ति सदैव ही महत्वाकांक्षी होते हैं और इसे पूरा करने के लिए कर्म में कोई कमी नहीं रखते . निष्ठापूर्वक अपने कर्म में संलग्न रहते हैं . मेष लग्न के पीड़ित होने पर इनका विवेक काम नहीं करता और ये झगडालू प्रवृत्ति के हो जाते हैं तथा सदैव ही "आओ और हमसे लड़ो" की कोशिश में लगे रहते हैं या यूं कहें तो मंगल की ऊर्जा का दुरूपयोग होने लगता है और लोग इन्हें देखकर अपना रास्ता बदलना शुरू कर देते हैं कि कौन सर खपाए अपने पास तो इतनी ताक़त नहीं हैं . इनके लक्ष्य कभी भी छोटे नहीं होते और बड़े लक्ष्य की प्राप्ति का ये पुरजोर प्रयास भी करते हैं . इनके मन में सदैव सबसे आगे रहने की इच्छा बनी रहती है . किसी और के द्वारा दी गयी सलाह को नहीं मानते और यदि मानते भी हैं तो काफी सोचने के बाद जब और कोई रास्ता नहीं बचता तब .अपने मतानुसार कार्य करना ही पसंद  करते हैं , किसी और का टांग अड़ाना इन्हें पसंद नहीं होता है .

              जो वस्तु,स्थिति इन्हें पसंद नहीं होती ये उसके स्वयं बदलने का इंतज़ार नहीं करते बल्कि उसे तुरंत ही हटा देते हैं. धैर्य से बैठकर प्रतीक्षा करने की बजाय आगे बढ़कर अवसर को प्राप्त कर लेना ही उचित समझते हैं .कार्य को  जल्दी से जल्दी पूरा करने की मनोवृत्ति होती है जिसके कारण कई जगह इनको नुकसान भी होता है .
मेष राशि के पीड़ित होने पर इनके क्रोध को धधकने में देर नहीं लगती . अकस्मात् होने वाली घटनाओं से निपटने में मेष वाले सर्वाधिक् उपयुक्त होते हैं .

       एक कार्य को पूरा किये बिना दुसरे कार्य को शुरू कर लेना इनकी प्रवृत्ति होती है , जिसके पीछे इनका सभी कार्यों को एक साथ पूरा कर लेने का आत्मविश्वास छुपा होता है , जो कई बार नुकसानप्रद सिद्ध होता है .मेष राशि के पीड़ित होने पर हर मनोभाव अपने चरम पर पहुँच कर अपनी आगामी स्थिति को प्राप्त कर लेता है जैसे उत्साह उन्माद में परिवर्तित हो जाता है और साहस प्रमत्ता में. यदि किसी मनोभाव के लिए "प्रचंड" शब्द का प्रयोग किया जाए तो वह मेष के जातक ही होंगे . व्यक्ति के अन्दर का "मैं " भी मेष है , इनके अन्दर मैं का प्रबल भाव होता है . जल्दबाजी में कभी - कभार ये मूर्खतापूर्ण फैसले ले लिया करते हैं जिनके कारण इन्हें बाद में पछताना पड़ता है.

             बीमार नहीं रह सकते ये , इन्हें जल्दी से ठीक होना होता है. अन्दर छटपटाहट मची रहती हैं ठीक होने की , आंतरिक ऊर्जा एक जगह रुकने नहीं देती और रोगी को आराम करना होता है . ये स्थिति इन्हें शारीरिक से  अधिक मानसिक रूप से बेचैन कर देती है .

        काम , क्रोध और लड़ना ये गुण प्रधान होते हैं . यदि मेष राशि पीड़ित न हो तो इनका सकारात्मक परिणाम प्राप्त होता है जो गृहस्थ जीवन में पूर्णता , गलत के विरुद्ध क्रोध और संघर्ष को बताता है जबकि मेष राशि पीड़ित हो तो इन तीनों मनोभावों का विकृतीकरण हो जाता हैं काम के पूर्ण न होने पर क्रोध की उत्पत्ति तथा क्रोध से लड़ाई का ये सिलसिला अनवरत जारी रहता है जब तक कि मेष की ऊर्जा क्षीण नहीं हो जाती .



अगले लेख में मेष राशि के बारे में अन्य जानकारियों के साथ उपस्थित होता हूँ.
आपका -  ज्योतिष विद्यार्थी
               श्री राम बिस्सा

          

Tuesday, February 27, 2018

READERS OF ASTROLOGY

                           एक लम्बे अरसे तक ज्योतिष पर लेखनी ने विराम रखा ,पर मष्तिष्क ने विचारों के क्षीर सागर में गहरे पैठना कहाँ छोड़ा था . ज्योतिष अध्ययन और परीक्षण  के साथ ही साथ ज्योतिष पर लेखन को लेकर कुछ विचार दिमाग में आवागमन करते रहे और इस आवागमन की छूट हमने भी दे ही रखी थी ताकि अनुकूल विचारों को एकत्रित किया जा सके.

    विचार कुछ यूं थे कि ज्योतिष जैसे गंभीर विषय पर जब हज़ारों वर्षों से काफी कुछ लिखा जा चुका है और आज भी यह कार्य अनवरत है फिर मेरे द्वारा जो लिखा जा रहा है वास्तव में इन लेखों का  पाठक कौन हैं और वो इनसे  किस प्रकार प्रभावित होता हैं . मेरे द्वारा लिखे गए लेख उनके लिए किस प्रकार उपयोगी सिद्ध हो सकते हैं .
            सबसे महत्वपूर्ण बात तो  यह है  कि प्रत्येक श्रेणी के पाठकों के लिए ऐसा कुछ लिखा जा सके जो उनके लिए उपयोगी हो . इस मसले पर सबसे अहम तो ये हो गया कि सर्वप्रथम  पाठकों को विभिन्न श्रेणियों में रखकर ये समझा जाए कि किस श्रेणी के लोगों को किस प्रकार के लेख उपयोगी सिद्ध हो सकते हैं और इसी क्रम में मैंने ज्योतिष लेखों के जिज्ञासु पाठकों का एक संक्षिप्त वर्गीकरण करने का प्रयास किया  है :-

1.      प्रथम प्रकार में वे लोग आते हैं जो ज्योतिष  के अच्छे जानकार  होने के साथ ही साथ व्यावसायिक रूप से ज्योतिष का काम  करते हैं  तथा ज्योतिष,ज्योतिषी.ज्योतिर्विद,ज्योतिषाचार्य,ज्योतिष शास्त्री   दैवज्ञ,ASTROLOGER,ASTROLOGY CONSULTANT  जैसे विशेषण इनके साथ जुड़े होते हैं . ऐसे लोगों के लिए किसी विषय विशेष पर किया गया गहन विश्लेष्णात्मक लेख ही विशिष्ट प्रयोजन का हो सकता है क्योंकि सामान्य नियमों व सिद्धांतों की इनको भली भांति जानकारी होती है और अनुभव भी .

2.     द्वितीय प्रकार में वे पाठक आते हैं जिन्होंने ज्योतिष को सीखने व इस विषय में पारंगत होने के लिए इसका अध्ययन प्रारम्भ किया है पर वे अभी अपने शुरूआती दौर में हैं तो उनके लिए ज्योतिष के आधारभूत सिद्धांतों से लेकर कई महत्वपूर्ण नियमों से सुसज्जित लेख ,जिसमें उदाहरण भी सम्मिलित हों काम के होंगे .

3.    तृतीय प्रकार के पाठक वे हैं जो ज्योतिष सीखना नहीं चाहते बस इस विषय में उनकी रूचि है और इसे पढने में उन्हें आनंद की अनुभूति होती है तो इनके लिए छोटी छोटी बातें जो ज्योतिष में काफी महत्व रखती हैं और अन्य सभी प्रकार के लेख जिन्हें ये समझ सकते हैं इनके लिए महत्वपूर्ण हैं .

4.  चतुर्थ श्रेणी में वे पाठक हैं जो इन्टरनेट पर अपनी समस्या का ज्योतिषीय उपचार खोजते हैं और विभिन्न लेखों को पढ़कर उनमे बताये अनुसार उपचार प्रारंभ कर देते हैं इन्हें ज्योतिष की TERMINOLOGY से कोई मतलब नहीं होता इन्हें बस पता होता है कि इनकी राशि क्या है और उनको शनि की साढे- साती  चल रही है या काल सर्प दोष है जो इन्हें कोई भी ज्योतिष पढने वाला या अखबार से पता लग जाता है और ये नेट पर पढ़कर उपचार करने में जुट जाते हैं कि कुछ अच्छा होगा . ऐसे पाठकों के लिए ऐसे लेखों की आवश्यकता है कि ज्योतिष जैसे गूढ़ विषय को इतने हलके में न लिया जाए और ज्योतिषीय उपचार अपना अलग  महत्त्व रखते हैं सो उन्हें ऐसे ही एकांगी लेख को पढ़कर प्रयोग में न लाया जाए बल्कि किसी विद्वान् ज्योतिषी की सलाह लेने के पश्चात ही किया जाए  .

5.  इन चार प्रकार के पाठकों के अतिरिक्त  भी एक और प्रकार है पाठकों का जो ज्योतिष के लेख इसलिए पढ़ता  हैं कि कहीं भी यदि ज्योतिष से सम्बंधित कुछ बातचीत हो तो वो भी कुछ कह सकें या अपना पक्ष रख सकें.


                    संभव हैं पाठकों के प्रकार और भी हों पर मैंने अपनी समझ व अनुभव के अनुसार ज्योतिष विषय के लेखों को पढने वाले लोगों का वर्गीकरण किया है . इस वर्गीकरण का मूल उद्देश्य यह है कि प्रत्येक श्रेणी के पाठकों को ध्यान में रखते हुए उनके लिए कुछ महत्वपूर्ण लिखा जा सके.सभी पाठकों से एक निवेदन है कि  ज्योतिषीय उपचारों के लिए किसी योग्य ज्योतिर्विद की सलाह अवश्य लें और किसी योग के बारे में बुरा पढ़कर चिंतित न हों क्योंकि ज्योतिष एक बहुआयामी विषय है एक अनुभवी ज्योतिषी ही भली- भाँति आकलन कर सकता है कि कोई योग अच्छा है या बुरा अतः पढने तक ठीक है परन्तु किसी निर्णय पर पहुँचने से पहले विषय के विशेषज्ञ से सलाह अवश्य लें .

     इन्हीं पाठकों के विभिन्न प्रकारों को ध्यान में रखते हुए ज्योतिषीय लेखों की एक श्रृंखला शुरू करने का मानस बना है तो शीघ्र ही एक ज्योतिष विषयक लेख के साथ मिलता हूँ .


निरंतरता बनाये रखने का प्रयत्न करूंगा .
श्रद्धावनत
आपका
ज्योतिष विद्यार्थी  श्रीराम बिस्सा





Saturday, February 24, 2018

TRIANGLE IN ASTROLOGY

ज्योतिष में त्रिकोण का बहुत अधिक महत्त्व है . भुजाओं से यदि किसी बंद आकृति का निर्माण करना है तो सबसे छोटी आकृति एक त्रिकोण ही हो सकती है और यही सिद्धांत ज्योतिष के फलित खंड पर भी लागू होता है .कोई भी एक भाव स्वयं अकेले ही किसी परिणाम को देने में समर्थ नहीं होता है उसे कम से कम दो और भावों की आवश्यकता होती है जिनके सहारे वह अपना त्रिकोण पूरा करे और परिणाम जातक को प्राप्त हो , इसी सिद्धांत का प्रयोग प्रो.के.एस.कृष्णमूर्ति ने अपनी तारकीय ज्योतिष पद्धति में किया है , उनहोंने हर घटना के लिए एक मुख्य भाव और दो या दो से अधिक सहायक भाव भी लिए हैं , जी हाँ त्रिकोण के अलावा बन्ने वाली चतुश्कोनीय आकृति भी फल प्रदान करने में सक्षम है . त्रिकोण तो कम से कम होना ही चाहिए .


जैसे
अल्पायु :- लग्न,द्वितीय,सप्तम और मारक स्थान .
लम्बी आयु :- १,३,5,8,१० .
प्रसिद्ध :- १,१०,३,११.
अत्याधिक धन सम्पदा :- 2,6,१०,११.
लाभ:- 2,6,१०.
यात्रा :-३,12,१.
समझौता :-३,१,९.
ऐसे बहुत से समूह हैं जिनका प्रयोग किया जा सकता है , धीरे - धीरे उदाहरणों से समझने का प्रयत्न करेंगे .

SATURN AND VENUS

शनि और शुक्र
यदि इन दोनों ग्रहों में से एक ग्रह भी उच्च राशि में स्थित हो, तो जब शनि की महादशा में शुक्र की अन्तर्दशा या शुक्र की महादशा में शनि की अन्तर्दशा आती है तो वह उस जातक के लिए बड़ा ही संघर्षपूर्ण होता है .
जब इस नियम की जांच करनी शुरू की तो तीन ऐसे लोगों से मुलाकात हुई जिनकी जन्मपत्रिका में इन दोनों में से एक ग्रह उच्च राशि में स्थित है और वो इस दशा से भी गुजर चुके हैं ,उनसे पूछने पर उनहोंने अपने उस समयावधि के बारे में जो बताया उसे बिन्दुवार लिख रहा हूँ .
१. प्रथम जातक जिसकी जन्मपत्रिका में कन्या लग्न है तथा शुक्र अपनी उच्च राशि में स्थित है , ४५ वर्ष की उम्र हो चुकी है अब तक विवाह नहीं हुआ है . इस जातक को शनि में शुक्र की अन्तर्दशा के दौरान अपने घर से निकाल दिया गया तथा इसे अपने दोस्तों के घर, होटल तथा धर्मशालाओं में रहकर इस समय को व्यतीत करना पडा तथा धनाभाव निरंतर बना रहा . इस दशा के समाप्त होने के बाद यह पुनः अपने परिवार के साथ रहने लगा है .
२. द्वितीय जातक भी कन्या लग्न का है जिसका शनि अपनी उच्च राशि तुला में स्थित है यह जातक अपने ननिहाल में रहता था लेकिन शुक्र मैं शनि की अन्तर्दशा के समय इसे ननिहाल से वापस भेज दिया गया तथा अपने पिता का मकान बहुत छोटा होने के कारण मंदिर के एक कमरे में इस समय को व्यतीत करना पड़ा तथा धनाभाव भी निरंतर बना रहा .
३. तृतीय जातक एक विधायक है जिसे लम्बे समय की चुनावी जीत के पश्चात इस दशा समय में चुनावी हार का सामना करना पडा अर्थात विधानसभा से बाहर रहना पडा . धनाभाव तो नहीं रहा लेकिन शक्ति और अधिकार का अभाव बना रहा .
और भी कुछ जातक है जिनके शनि या शुक्र उच्च राशि में स्थित है लेकिन अभी यह दशा क्रम आना बाकी है .
इस नियम का सही होना इतना सामान्य नहीं है , यह वास्तव में बहुत ही महत्वपूर्ण है क्योंकि यह घटना विंशोत्तरी दशा क्रम की सटीकता को भी प्रतिपादित करती है .
इसका विपरीत योग भी बिलकुल सटीक है जिसके बारे फिर कभी चर्चा करूंगा .

RAHU - THE NODE POINT

राहु
एक ग्रह के कई कारकत्व होते हैं और प्रत्येक कारकत्व के आधार पर उसके अलग अलग प्रभाव भी होते हैं इसी के आधार पर आज राहु ग्रह की बात करते हैं -
-राहु अव्यवस्था का प्रतीक है या ऐसा भी कह सकते हैं कि किसी व्यवस्था में विघ्न उत्पन्न करना भी राहु का ही काम है.
-नाड़ी ज्योतिष के अनुसार गुफा (CAVE) पर भी राहु का आधिपत्य है या ऐसा कहें की गुफा के समान संरचना पर भी राहु का ही अधिकार है.
राहु की स्थिति यदि लग्न में हो फिर चाहे लग्न में कोई भी राशि स्थित हो ,तो ऐसा राहु दांतों में किसी न किसी प्रकार की अव्यवस्था उत्पन्न करता है , जैसे -
- दांत पर दांत चढ़ा होना .
- किसी दांत का आधा टूटा होना .
-दांतों पर लाल या काले रंग की परत का जमा होना .
- स्कर्वी रोग हो जाना .
- कीड़े पड़ने से दांतों का खोखला हो जाना इत्यादि .
कई बार ये स्थितियां जन्म से ही उपस्थित होती है जबकि कई बार ये प्रकृतिजन्य होती है , जैसे
-छोटी उम्र में गिरने पर दांत टूट जाना या दांत पर दांत का चढ़ जाना .
- चॉकलेट खाने से दांतों में कीड़े पड़ जाना .
- कई बार दांत की निरंतर सफाई न करने से भी दांतों पर कुछ दाग हमेशा के लिए जम जाते है तथा बदबू आती है .
जिन लोगों का अनुभव मैंने प्राप्त किया है उनमे से :- एक व्यक्ति जिसका मकर लग्न है तथा लग्न में शनि राहु स्थित है, के दांत की श्रृंखला टेढ़ी - मेढ़ी ( ZIG-ZAG ) है ,जिसके कारण पिछले दांतों की सफाई ठीक तरह से नहीं हो पाती और उन पर जमे हुए काले रंग की परत को आसानी से देखा जा सकता है .
दूसरी कुंडली में लग्न में केवल राहु ही स्थित है और जब मैंने पूछा कि दांतों में क्या रोग है तो बताया गया की स्कर्वी है .
अन्य अनुभवों के आधार पर कहा जा सकता है कि लग्न में स्थित राहु दन्तावली में किसी न किसी प्रकार की समस्या देता है .
अब यह समस्या किस लग्न के राहु में किस प्रकार की होगी तथा युति व दृष्टि से किस प्रकार प्रभावित होगी यह निरंतर अनुभव व शोध का विषय है .
ऐसा नहीं है कि लग्न के राहु का यही एक फल है ,अन्य फल भी होते हैं ,उनमें से यह भी एक है .


अन्य ज्योतिर्विदों के अनुभवों की अपेक्षा में आपका
श्रीराम

Who gives the results : Planets Or ........ (आखिर फल कौन देता है )

       अक्सर जब साधारण जन मानस के बीच ज्योतिष की चर्चा देखने व सुनने का अवसर मिलता है तो हमेशा कुछ बातें उनके बीच सामान्य होती हैं जैसे कि यदि किसी को शनि की दशा चल रही है तो संवादों के बीच सशक्त रूप से सुनने को मिलता है , कि "शनि चल रहा है तब तो तेरा समय खराब है ,तू तो शनि के मंदिर जाया कर और ये दान किया कर वरना बहुत मुश्किल हो जायेगी !" और दुसरी ओर  जब पता चलता है , कि किसीको गुरू की दशा चल रही है , तो कहा जाता है , कि "तेरे तो अभी मौज है , गुरू तो बहुत अच्छा ग्रह है तुझे पूरी तरह सेट कर देगा -फलां फलां ". तो क्या जिस जिस व्यक्ति को शनि की दशा चलेगी वह समस्याओं से जूझता ही रहेगा और गुरू की दशा वाला व्यक्ति आनंद करेगा ? क्या शनि कभी किसी का कुछ अच्छा नहीं कर सकता ? आइये कुछ चर्चा हो जाये इस बात पर ! 
जितना अपने अल्पकालीन विद्यार्थी जीवन में सीखा है उस आधार पर स्पष्ट करने का प्रयास करता हूँ  
        सर्वप्रथम तो ये बात जानना बहुत आवश्यक है , कि फल  देता कौन है ! हालाँकि ये बात थोड़ी दार्शनिक लग सकती है लेकिन सत्य है , कि फल हमारा कर्म ही देता है और वही दे सकता है, ग्रहों में ये शक्ति नहीं कि हमें फल प्रदान करें वे तो कर्म फलों के संचरण का माध्यम मात्र हैं ! गहन विचार करने पर मन में यही प्रस्फुटित होता है , कि जब मनुष्य पैदा होता है , तो उस मनुष्य को उसके जीवन काल में जो कुछ भी मिलना होता है ईश्वर वह सब कुछ उसके साथ एक बड़े होटल में भेज देता है ! इस होटल  में बारह कमरे होते हैं जिनमें वो सामान रखा होता है जो उसे इस जीवन काल में काम लेना होता है ! इन्हीं कमरों में कुछ खाली स्थान भी होता है जहाँ वह व्यक्ति इस जीवन काल में कुछ कमाकर वहाँ रख सकता है ,लेकिन ये स्थान सीमित होता है ! इन सामानों को उस व्यक्ति तक पहुँचाने वाले नौ कर्मचारी  उस होटल में काम करते हैं जो अपने अपने कार्य समय के हिसाब से अपने अपने कमरों से सामान उस व्यक्ति तक पहुंचाते रहते हैं !  
         अब मान लीजिए की उस व्यक्ति ने किसी डिश का आर्डर किया और वो डिश किसी कमरे में है ही नहीं तो उसे कैसे मिल सकती है ! हाँ वो खुद कमा  सकता है लेकिन यदि उसने अपने होटल के कमरों के खाली स्थान को पूर्णतया भर दिया है तो फिर कोई उपाय नहीं है ! फिर एक बात समझ में नहीं आई की ग्रहों ने क्या दिया ! ग्रह तो केवल सप्लाई का काम करते हैं , तो फिर शनि खराब कैसे और गुरू अच्छा कैसे ! अब यदि शनि के कमरे में केवल अच्छा सामान ही रखा होगा तो अपने कार्यसमय में वह केवल अच्छा ही दे पाएगा बुरा नहीं और गुरू के कमरे मैं सबकुछ खराब रखा  है तो वह अच्छा कैसे देगा सोचें , हाँ परोसने का ढंग उनका अपना अपना हो सकता है लेकिन परोसेंगे तो वही जो पीछे से मिलेगा ! यही वो बात जिसे समझने का प्रयत्न मेरे जैसे और भी नए ज्योतिष विद्यार्थियों को करना  चाहिए ताकि अच्छे बुरे का दोष ग्रहों के सर न मढा  जाऐ  और व्यक्ति स्वयं इसके लिए जिम्मेदार रहे , कि मिल तो वही रहा है जो मैंने जमा किया है ग्रह तो केवल माध्यम है !इस विषय पर चर्चा आगे भी जारी रहेगी ............



गृह लक्ष्मी

घर और मकान में अंतर है - मकान ईंट और सीमेंट से बनता है जबकि घर सदस्यों और उनके प्रेम से . किसी भी घर में प्रेम,सौहार्द और शांति बनाए रखने और सब कुछ कुशल मंगल रखने में स्त्रियों का महत्वपूर्ण योगदान होता है . ज्योतिषीय दृष्टिकोण से घर के माहौल पर स्त्रियों का क्या प्रभाव होता है ,यहाँ बात करते हैं :- 
             ज्योतिष के अनुसार मन की शांति और आत्मिक प्रेम के लिए जो  ग्रह  जिम्मेदार होते हैं :-

१ . चन्द्रमा :- मन ( चन्द्रमा मनसो  जातः )
२ . शुक्र :- आत्मिक प्रेम ( नेमिचंद्र शास्त्री: भारतीय ज्योतिष  )

                      ज्योतिष के अनुसार ये दोनों ही ग्रह स्त्रियों पर अपना आधिपत्य रखते है . चन्द्रमा माता का कारक होता है और शुक्र पत्नी का !
               अतः जिस प्रकार मन की शांति  और आत्मिक प्रेम के लिए चन्द्रमा और शुक्र का अच्छी स्थिति में होना आवश्यक है ,उसी प्रकार घर के शांतिमय माहौल के लिए घर के शुक्र ( पत्नी ) और घर के चन्द्रमा ( माता ) का अच्छी स्थिति में होना आवश्यक है !
           यहाँ कुछ बातों के बारे में जिक्र करना चाहूँगा जिनके अनुसरण के द्वारा स्त्रियाँ अपने घर की आत्मा में नयी उमंग फूंक सकती है :-

१ . सुबह सबसे पहले उठें और सर्वप्रथम कार्य हो , कि आप नित्य कर्म से निवृत्त हो स्नान करें .
२ . घर की सफाई के बाद देहली पूजन अवश्य करें .
३ . सुबह एक बार धुप जलाकर पूरे घर में आरती करें .
४ . आवाज़ में हमेशा सौम्यता रखें .
              सबसे महत्वपूर्ण बात कि यदि चद्र और शुक्र का शुभ संयोग हो तो जीवन में चार चाँद लग जाते हैं , उसी प्रकार यदि घर में भी इन दोनों का शुभ  संयोग हो तो घर के सभी सदस्यों के जीवन में चार चाँद लग जाते हैं . अब यदि मन प्रसन्न हो और आत्मा में प्रेम हो तो जीवन की कल्पना सहज ही की जा सकती है !
                 सुखमय जीवन की शुभकामनाओं के साथ आंशिक विराम लेता हूँ ...... शुभम .



Thursday, October 4, 2012

धार्मिक कर्म में मौलि बंधन क्यों ?

       किसी भी शुभ कार्य से पहले जैसे कोई पूजा -  अनुष्ठान , गृह प्रवेश ,दीपावली की पूजा  या अन्य कोई भी पूजन सर्वप्रथम पंडित जी यजमान (यज्ञमान) को तिलक करते हैं और मौली बंधते हैं फिर पूजा आरम्भ होती है ! मौली बंधते वक़्त इस  मंत्र का उच्चारण  जाता है:-


        येन  बद्धो बलीराजा दावेंद्रो महाबलः !
            तेन त्वामनुबध्नामि रक्षे  माचल माचल !! 


       ये प्रथा कब शुरू हुई और इसके महत्त्व के विषय में अनेक आख्यान शास्त्रों में मौजूद हैं !मौली बंधने की परंपरा तब से चली आ रही है, जब से महान , दानवीरों में अग्रणी महाराज बलि की अमरता के लिए वामन भगवान् ने उनकी कलाई पर रक्षा सूत्र बांधा था !

            इसे रक्षा  कवच के रूप में भी  शरीर पर बांधा जाता है !इन्द्र जब वृत्रासुर से युद्ध करने जा रहे थे तब इंद्राणी शची ने इन्द्र की दाहिनी भुजा पर रक्षा-कवच के रूप में मौली को बाँध दिया था और इन्द्र इस युद्ध में विजयी हुए ! 

      स्वास्थ्य के अनुसार मौली-बंधन से वात पित्त और कफ तीनों का शरीर में संतुलन बना रहता है और शरीर नीरोग रहता है !साधारणतया हम देखते हैं,कि यदि कोई कर्मकांडी पुरोहित जो कई दिनों तक चलने वाले अनुष्ठान में  हैं और दुर्भाग्यवश उनके कुटुंब में किसी निकट संबंधी की मृत्यु हो जाती है तो भी उनको "सूतक"का दोष नहीं लगता है और वो अपना अनुष्ठान निर्विघ्न पूरा कर सकते हैं,क्योंकि क्योंकि उनहोंने पूजन आरम्भ होने पर बंधी जाने वाली मौली बाँध  रखी है!यानी की मौली के प्रभाव से उस बड़े अनुष्ठान पर बाधा ताल जाती है ! 





    

Monday, January 9, 2012

4.रोहिणी


नक्षत्र:रोहिणी

                                                                     4.रोहिणी 
रोहिणी नक्षत्र का वैदिक नाम रोहिणी ही है!इस नक्षत्र में पांच तारे मिलकर शकट अर्थात गाड़ी की आकृति का निर्माण करते हैं!संहिता ग्रंथों में रोहिणी को शकट-भेदन कहा गया है!रोहिणी का अर्थ है ऊपर की ओर बढ़्ने वाली वस्तुएं!इस नक्षत्र का स्वामी ब्रह्मा को माना गया है!नौ ग्रहों में चंद्र रोहिणी नक्षत्र का अधिपति है!यह स्थिर नक्षत्र है,अर्थात इसमें स्थिरता वाले कार्य जैसे गृह-प्रवेश,बिजाई,व्यापार शुरू करना,मंदिर बनाना आदि कार्य शुरू किये जा सकते हैं!यह ऊर्ध्वमुख नक्षत्र है अर्थात ऊपर की ओर बढ़ने वाले कार्य जैसे नौकरी शुरू करना,बड़े पद को ग्रहण करना,और विकासशील कार्य शुरू किये जा सकते हैं!चैत्र मास का रोहिणी नक्षत्र शून्यसंज्ञक होता है,इस दिन कोई शुभ कार्य नहीं करना चाहिए!शनिवार को रोहिणी नक्षत्र हो तो अमृतसिद्धि योग का निर्माण होता है और यही नक्षत्र सोमवार को हो सर्वार्थसिद्धि योग का निर्माण होता है!अपवाद के रूप में शनिवार को रोहिणी नक्षत्र हो और उसी दिन एकादशी भी हो तो विषयोग का निर्माण होता है,जो सभी शुभ कार्यों के लिए वर्जित है!इस नक्षत्र के लिए जामुन की पूजा की जाती है!रोहिणी नक्षत्र की जाति किसान,मजदूर या हलवाहे की होती है!यह नक्षत्र स्त्रीसंज्ञक होता है!गोत्र का संबंध अत्रि मुनि से है!इसकी नाड़ी अन्त्या,गण मनुष्य और योनि सर्प की होती है!यह कालपुरुष की आँखों का स्वामित्व रखता है!अनुमष्तिष्क,ग्रीवा कशेरुक और तालू पर इसी नक्षत्र का अधिकार होता है!भूसे की गाडी के आकार जैसा यह नक्षत्र फरवरी माह मे रात को 9 बजे तक दिखाई देता है!
कारकत्व:-रोहिणी नक्षत्र अधिकता से सम्बंधित है जैसे कोई आपको प्रश्न करे कि बारिश होगी क्या? उस वक्त चंद्र और लग्न का सम्बन्ध रोहिणी नक्षत्र से हो तो अच्छी बारिश होती है!जुबान के पक्के,व्यापारी,अधिकारी,योगी,पानी के जीव,खेती करने वाले,जंगली प्रदेश!
नक्षत्रफल:-रोहिणी का संबंध विकास से है!सत्यवादी,चतुर,तेजस्वी,स्थिति को भांप लेने वाले,निडर,सांसारिक सुखों में तल्लीन,खेती से प्रेम,वाक्-पटु होते हैं!
पदार्थ:-रस वाले पदार्थ,ऊन,समय सात दिन!
व्यक्ति:-इनकी आँखें बड़ी-बड़ी होती है!अपने लक्ष्य के प्रति निष्ठावान होता है!नए विचार व परिवर्तन का स्वागत करता है!व्यवस्थित ढ़ग से काम करना रोहिणी नक्षत्र का विशिष्ट गुण है!जलचर,कृषक,राजसिक प्रवृत्ति के लोग,ट्रेवल एजेंट,जहाज का कप्तान इत्यादि!
रोहिणी नक्षत्र का वैदिक मंत्र:-ब्रह्मजज्ञानं प्रथमम्पुरस्ताद्विसीमः सुरुचे वेन आयवः सबुध्न्या उपमा अस्य विष्ठा: सतश्च योनिमसतश्च विध: !!  
बीमारियाँ:-गले की खराश,पाँव व छाती में दर्द,स्त्रियों को अनियमित मासिक!
मानसिक गुण:-सौंदर्य-प्रेमी,मधुर भाषी,स्थिर मानसिकता,प्रिय मिजाज वाला,शुद्ध ह्रदय,परोपकारी!
व्यवसाय:-यह कृ्षि उत्पादन व खनिज उद्योग से जुडा़ है!यात्रा वृत्तांत लेखक,आवास का क्रय-विक्रय करने वाला,
विशेष:-पौराणिक कथाओं के अनुसार रोहिणी चन्द्रमा की सत्ताईस पत्नियों में सबसे सुदर है!कृष्ण जी का जन्म भाद्रपद मास की कृष्णपक्ष अष्टमी तिथि को रोहिणी नक्षत्र में हुआ था!