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Thursday, October 4, 2012

धार्मिक कर्म में मौलि बंधन क्यों ?

       किसी भी शुभ कार्य से पहले जैसे कोई पूजा -  अनुष्ठान , गृह प्रवेश ,दीपावली की पूजा  या अन्य कोई भी पूजन सर्वप्रथम पंडित जी यजमान (यज्ञमान) को तिलक करते हैं और मौली बंधते हैं फिर पूजा आरम्भ होती है ! मौली बंधते वक़्त इस  मंत्र का उच्चारण  जाता है:-


        येन  बद्धो बलीराजा दावेंद्रो महाबलः !
            तेन त्वामनुबध्नामि रक्षे  माचल माचल !! 


       ये प्रथा कब शुरू हुई और इसके महत्त्व के विषय में अनेक आख्यान शास्त्रों में मौजूद हैं !मौली बंधने की परंपरा तब से चली आ रही है, जब से महान , दानवीरों में अग्रणी महाराज बलि की अमरता के लिए वामन भगवान् ने उनकी कलाई पर रक्षा सूत्र बांधा था !

            इसे रक्षा  कवच के रूप में भी  शरीर पर बांधा जाता है !इन्द्र जब वृत्रासुर से युद्ध करने जा रहे थे तब इंद्राणी शची ने इन्द्र की दाहिनी भुजा पर रक्षा-कवच के रूप में मौली को बाँध दिया था और इन्द्र इस युद्ध में विजयी हुए ! 

      स्वास्थ्य के अनुसार मौली-बंधन से वात पित्त और कफ तीनों का शरीर में संतुलन बना रहता है और शरीर नीरोग रहता है !साधारणतया हम देखते हैं,कि यदि कोई कर्मकांडी पुरोहित जो कई दिनों तक चलने वाले अनुष्ठान में  हैं और दुर्भाग्यवश उनके कुटुंब में किसी निकट संबंधी की मृत्यु हो जाती है तो भी उनको "सूतक"का दोष नहीं लगता है और वो अपना अनुष्ठान निर्विघ्न पूरा कर सकते हैं,क्योंकि क्योंकि उनहोंने पूजन आरम्भ होने पर बंधी जाने वाली मौली बाँध  रखी है!यानी की मौली के प्रभाव से उस बड़े अनुष्ठान पर बाधा ताल जाती है ! 





    

Monday, January 9, 2012

4.रोहिणी


नक्षत्र:रोहिणी

                                                                     4.रोहिणी 
रोहिणी नक्षत्र का वैदिक नाम रोहिणी ही है!इस नक्षत्र में पांच तारे मिलकर शकट अर्थात गाड़ी की आकृति का निर्माण करते हैं!संहिता ग्रंथों में रोहिणी को शकट-भेदन कहा गया है!रोहिणी का अर्थ है ऊपर की ओर बढ़्ने वाली वस्तुएं!इस नक्षत्र का स्वामी ब्रह्मा को माना गया है!नौ ग्रहों में चंद्र रोहिणी नक्षत्र का अधिपति है!यह स्थिर नक्षत्र है,अर्थात इसमें स्थिरता वाले कार्य जैसे गृह-प्रवेश,बिजाई,व्यापार शुरू करना,मंदिर बनाना आदि कार्य शुरू किये जा सकते हैं!यह ऊर्ध्वमुख नक्षत्र है अर्थात ऊपर की ओर बढ़ने वाले कार्य जैसे नौकरी शुरू करना,बड़े पद को ग्रहण करना,और विकासशील कार्य शुरू किये जा सकते हैं!चैत्र मास का रोहिणी नक्षत्र शून्यसंज्ञक होता है,इस दिन कोई शुभ कार्य नहीं करना चाहिए!शनिवार को रोहिणी नक्षत्र हो तो अमृतसिद्धि योग का निर्माण होता है और यही नक्षत्र सोमवार को हो सर्वार्थसिद्धि योग का निर्माण होता है!अपवाद के रूप में शनिवार को रोहिणी नक्षत्र हो और उसी दिन एकादशी भी हो तो विषयोग का निर्माण होता है,जो सभी शुभ कार्यों के लिए वर्जित है!इस नक्षत्र के लिए जामुन की पूजा की जाती है!रोहिणी नक्षत्र की जाति किसान,मजदूर या हलवाहे की होती है!यह नक्षत्र स्त्रीसंज्ञक होता है!गोत्र का संबंध अत्रि मुनि से है!इसकी नाड़ी अन्त्या,गण मनुष्य और योनि सर्प की होती है!यह कालपुरुष की आँखों का स्वामित्व रखता है!अनुमष्तिष्क,ग्रीवा कशेरुक और तालू पर इसी नक्षत्र का अधिकार होता है!भूसे की गाडी के आकार जैसा यह नक्षत्र फरवरी माह मे रात को 9 बजे तक दिखाई देता है!
कारकत्व:-रोहिणी नक्षत्र अधिकता से सम्बंधित है जैसे कोई आपको प्रश्न करे कि बारिश होगी क्या? उस वक्त चंद्र और लग्न का सम्बन्ध रोहिणी नक्षत्र से हो तो अच्छी बारिश होती है!जुबान के पक्के,व्यापारी,अधिकारी,योगी,पानी के जीव,खेती करने वाले,जंगली प्रदेश!
नक्षत्रफल:-रोहिणी का संबंध विकास से है!सत्यवादी,चतुर,तेजस्वी,स्थिति को भांप लेने वाले,निडर,सांसारिक सुखों में तल्लीन,खेती से प्रेम,वाक्-पटु होते हैं!
पदार्थ:-रस वाले पदार्थ,ऊन,समय सात दिन!
व्यक्ति:-इनकी आँखें बड़ी-बड़ी होती है!अपने लक्ष्य के प्रति निष्ठावान होता है!नए विचार व परिवर्तन का स्वागत करता है!व्यवस्थित ढ़ग से काम करना रोहिणी नक्षत्र का विशिष्ट गुण है!जलचर,कृषक,राजसिक प्रवृत्ति के लोग,ट्रेवल एजेंट,जहाज का कप्तान इत्यादि!
रोहिणी नक्षत्र का वैदिक मंत्र:-ब्रह्मजज्ञानं प्रथमम्पुरस्ताद्विसीमः सुरुचे वेन आयवः सबुध्न्या उपमा अस्य विष्ठा: सतश्च योनिमसतश्च विध: !!  
बीमारियाँ:-गले की खराश,पाँव व छाती में दर्द,स्त्रियों को अनियमित मासिक!
मानसिक गुण:-सौंदर्य-प्रेमी,मधुर भाषी,स्थिर मानसिकता,प्रिय मिजाज वाला,शुद्ध ह्रदय,परोपकारी!
व्यवसाय:-यह कृ्षि उत्पादन व खनिज उद्योग से जुडा़ है!यात्रा वृत्तांत लेखक,आवास का क्रय-विक्रय करने वाला,
विशेष:-पौराणिक कथाओं के अनुसार रोहिणी चन्द्रमा की सत्ताईस पत्नियों में सबसे सुदर है!कृष्ण जी का जन्म भाद्रपद मास की कृष्णपक्ष अष्टमी तिथि को रोहिणी नक्षत्र में हुआ था!

Friday, June 3, 2011

MONEY WITH शनि (SATURN)



                       विज्ञानं ज्योतिष और दर्शन को मिलाने के बाद इस छोटी पोस्ट को लिखने का मन बनाया है !शनि के बारे में विस्तार से चर्चा तो किसी आगामी लेख में  करेंगे लेकिन यहाँ शनि और MONEY (धन)के बारे में एक विचार मन में प्रस्फुटित हुआ उसी को यहाँ लिखने का प्रयास कर रहा हूँ ! आशा है विधु पाठकगण सार ग्रहण करने का प्रयास करेंगे ! शनि ग्रह  की  एक विशेषता यह भी होती है , कि वह सोखने या आकर्षित करने का गुण रखता है !जैसे यहाँ देखें :-
१ . भैंस सूर्य के ताप को अत्यधिक सोखती है !
२ .पूर्णतया शनि से प्रभावित साधू स्वतः आकर्षण का कारक  होता है !
३ .विज्ञान में भी सूर्य के ताप और प्रकाश का पूर्ण अवशोषण करने के लिए  काले रंग का इस्तेमाल किया जाता है !" भौतिक विज्ञान की आदर्श क्रिश्निका  "इसका अच्छा उदहारण है !
४ . एक साधारण कहावत का उदहारण भी यहाँ देना चाहूँगा जो हम लोग अक्सर कहा करते है "इसकी आँखों में शनि है " क्यों करते है या नहीं !
  अतः कहा जा सकता है , कि शनि की स्थिति आपके लिए श्रेष्ठ है तो जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में सफल हो सकते हैं !अब ये शनि श्रेष्ठ है या नहीं और अगर नहीं तो क्या करें की यह अच्छी स्थिति में आ जाये इसकी चर्चा अगले लेखों में की जायेगी ! सभी ग्रहों का विस्तार से वर्णन मेरे मुख पृष्ठ के पास " ज्योतिष योग संग्रह " वाले पेज पर करूँगा !जिज्ञासु पाठक वहाँ देख सकते हैं !
     मेरे लेख ज्योतिष के जिज्ञासू विद्यार्थियों के साथ - साथ सभी साधारण लोगों के लिए उपयोगी हो सके इसलिए मुख पृष्ठ पर हमेशा साधारण जीवन और ज्योतिष , अध्यात्म और दर्शन का मिलाजुला लेख लिखने का प्रयास करता हूँ !  ज्योतिषी लोग  "ज्योतिष योग संग्रह " पृष्ठ पर अधिक जानकारी के लिए देख सकते हैं !
आज का टिप :- शनि की दशा,या दुसरे प्रभाव युक्त समय में प्रतिदिन २ से ३ किलोमीटर की पैदल यात्रा अवश्य करनी चाहिए !इससे शनि का  SIDE - EFFECT  खत्म हो जाता है !
! जय गणेश ! 
!! जय जय गणेश !!
                    


Saturday, May 28, 2011

स्त्रियाँ :- एक विलक्षण तथ्य

इस ब्लॉग के लेखों को दिए गए लिंक पर स्थानांतरित कर दिया गया है।

zyotish.blogspot.in

Sunday, May 22, 2011

कौन सा जीवन श्रेष्ठ - गृहस्थ या संन्यास




काफी लम्बे समय के चिंतन मनन के बाद इस पोस्ट को लिखने का मन बनाया है , कि गृहस्थ जीवन अधिक श्रेष्ठ है या संन्यासमय जीवन !आपके अनुसार कौन सा अधिक श्रेष्ठ है और क्यों अवगत अवश्य कराएँ ! मैं यहाँ अपने विचार व्यक्त कर रहा हूँ !
   बात शुरू करते हैं एक ऐतिहासिक स्थान और घटना से " एक बार राजा परीक्षित जंगल से गुजर रहे थे , तो उन्होंने एक बैल को एक टांग पर खड़ा देखा ! जब राजा ने बैल से पूछा तो उसने कुछ स्पष्ट नहीं बताया क्योंकि वे और कोई और नहीं बल्कि स्वयं साक्षात् धर्मराज और धर्मराज कैसे किसी निंदा कर सकते थे! तब परीक्षित ने ध्यान बल से पता लगाया कि इनकी ऐसी दशा का जिम्मेदार कलियुग है !राजा ने सोचा कि कलियुग के आने पर संसार में चारों तरफ लूट - पट चोरी डकैती आदि नाना प्रकार के पापकर्मों की वृद्धि हो जायेगी अतः इस कलियुग का अंत कर देना चाहिए ! जब उन्होंने कलियुग का अंत करने का पूरा मानस बना लिया था तभी उनके मन में एक विचार आया , जिसके कारण उन्होंने कलियुग का अंत करने का विचार त्याग दिया ! उन्होंने सोचा कि कलियुग में सभी प्रकार की बुराइयां हैं , लेकिन इस में एक बहुत बड़ी अच्छाई भी है , जिसका लाभ कलियुग में सबको प्राप्त होगा और वो यह है , कि कलियुग में ईश्वर की प्राप्ति के लिए लोगों को बड़े - बड़े यज्ञ नहीं करने पड़ेंगे ! सालों - साल तक तपस्या नहीं करनी पड़ेगी केवल एक बार सच्चे मन से जो व्यक्ति एक बार ईश्वर के नाम का उच्चारण करेगा और ईश्वर को याद करेगा बस उसे ही ईश्वर की प्राप्ति हो जायेगी यह सोचकर उन्होंने उस समय कलियुग पर केवल पूर्णतया नियंत्रण कर लिया लेकिन उसका वध नहीं किया !जिसका उल्लेख तुलसीदास जी ने रामचरितमानस में भी किया है , देखिये
         " कलियुग केवल नाम अधारा,सुमिर-सुमिर नर उतरहिं पारा "
               खैर इस कथा का यहाँ जिक्र करने का उद्देश्य भी यही है , कि हमारा गृहस्थ जीवन भी कुछ ऐसा ही है , हम अपने दैनिक जीवन और सांसारिक मोह माया में फंसे रहकर भी यदि सच्चे मन से ईश्वर का कुछ पल के लिए ध्यान करते हैं , तो उसका काफी महत्त्व होता है ! और इसका कारण वास्तविकता में यह है , कि गृहस्थ में सच्चे मन से समय निकालकर पूरी श्रद्धा और आस्था से ईश्वर का ध्यान करना बड़ा ही मुश्किल कार्य है ! जो गृहस्थ  इसको करने में सफल होता है , उसे ईश्वर की प्राप्ति होती है इसमें कोई संशय भी नहीं है ! सन्यासी जीवन के बारे में कुछ कहना उचित नहीं है , गृहस्थ की व्याख्या में संन्यास की व्याख्या स्वतः ही छुपी है ! कोई बन्धु यदि कुछ विचार रखते हैं , तो अवगत करवाएं !
  एक बात और कहना चाहूँगा कि संन्यास का मतलब केवल घर छोड़कर चले जाना ही नहीं है य़ा फिर जंगलों में जाकर तप करना ही संन्यास नहीं है ! संन्यास का अर्थ है ( सम + न्यास ) अर्थात सबकुछ सामान यदि गृहस्थी व्यक्ति भी सभी से सामान व्यवहार करे सभी को समान रूप से आदर , महत्त्व प्रदान करे तो वह गृहस्थ में रहते हुए भी संन्यासी है ! लेकिन सभी अच्छी तरह से जानते हैं,कि गृहस्थ में रहते हुए ऐसा होना कितना मुश्किल है , क्यों है ना................???
    फिर भी प्रयास किया जा सकता है ! खैर प्रयास ना करना चाहें भी , तो गृहस्थ जीवन श्रेष्ठ है , क्योंकि इतनी समस्याओं और मोह माया के बंधनों में रहते हुए भी यदि व्यक्ति कुछ देर के लिए ईश्वर में चित्त को स्थिर कर सकता है तो ईश्वर ऐसे गृहस्थी व्यक्तियों का इंतज़ार कर रहे हैं !
                         गीता में श्रीकृष्ण कहते भी हैं :-
               !! सर्वधर्मानपरित्यज्यं मामेकं शरणम् व्रजः !
             अहम् त्वIम् सर्वपापेभ्यो मोक्षयिश्यामीमाशुचः !!


आज का टिप :- यदि मन में स्थिरता की कमी हो ,मन में व्यर्थ चिंताएं हो उहापोह की स्थिति हो तो शिवमहिम्नः स्तोत्र का पठन य़ा श्रवण करना चाहिए ! धार्मिक कारण तो शिव की आराधना हो गयी !क्योंकि मन पर चन्द्रमा का अधिकार है और चन्द्र शिव का घनिष्ठ सम्बन्ध है !और दूसरा कारण ये कि इस स्तोत्र की रचना "शिखिरिणी" छंद में की गयी है इस छंद का VIBRATION मानसिक रूप से आराम प्रदान कर एकाग्रता बढ़ता है ! अनुभूत है यकीन ना हो तो एक दिन के लिए सुबह - सुबह एकाग्रचित्त होकर श्रवण करें पता चल जायेगा !
शेष शुभम
! जय गणेश !
!! जय जय गणेश !!

Wednesday, May 18, 2011

साधारण दिनचर्या में योग

                        !! प्राणाय नमो यस्य सर्वमिदं वशे !!
        अर्थात - "मैं प्राण को प्रणाम करता हूँ इस प्राण के वश में ये सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड है ! यदि प्राण को वश में कर लिया जाये तो सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड को वश में किया जा सकता है !"
   आज मेरा विषय है योग जिसके बारे में प्रत्येक हिन्दू ये गर्व करता है , कि योग भारत की देन है ! लेकिन योग का अभ्यास कितने भारतीय नियमित रूप से करते हैं ??? इसका कारण शायद ये भी हो सकता है , कि आज की भागदौड़ भरी जिन्दगी में लोगों के पास योग को देने के लिए अधिक समय न हो ! या फिर ये भी हो सकता है , कि अपनी भारी - भरकम तनख्वाह वाली नौकरी के आगे वे योग को एक तुच्छ चीज मानते हो या और भी कई कारण हो सकते हैं जो हमें इस पूर्ण रूपेण भारतीय विज्ञान पर केवल झूठा गर्व करना ही सिखाता है उसका निरंतर अभ्यास करना नहीं ! हो सकता है , कि कई लोगों को ये बात अच्छी ना लगे लेकिन ये वास्तविकता है ! यदि बाबा रामदेव से पहले का समय याद करें तो सच्चाई समझ आ जायेगी ! खैर मेरे लेख का विषय योग का सरलीकरण पेश करना है , जो कई महापुरुषों ने अपने जीवन में प्रयुक्त किया है ! और शायद आप सब के भी काम आ सके क्योंकि मैं भी कम समय में ही योग का अभ्यास करने के लिए इस योग सारणी का अभ्यास करता रहा हूँ !
         इस योग सारणी का प्रयोग प्रत्येक व्यक्ति चाहे वो किसी भी पेशे में हो आसानी से कर सकता है !
                   प्राणायाम के तीन कवच ( बंधत्रय )
               इन्हें योग की भाषा में बंधत्रय कहा जाता है , लेकिन मैंने "कवच" नाम इसलिए दिया है , क्योंकि ये शरीर से बाहर जाने वाली ऊर्जा को रोककर उसे अंतर्मुखी करने का कार्य करते हैं ! प्राणायाम शुरू करने से पहले इनका अभ्यास करना अत्यंत ही लाभदायक रहता है ! शुरुआत में ४ मिनट फिर धीरे - धीरे ८ मिनट तक का समय दिया जा सकता है !
१ . जालंधर बंध :- पद्मासन में बैठकर श्वास अन्दर भरें , दोनों हाथ घुटनों पर टिकाकर ठोडी को कंठकूप पर लगाएं छाती को आगे के और तान कर रखें और दृष्टी भ्रूमध्य में स्थिर करना ही जालंधर बंध है !( एक मिनट )
२ . उड्डीयान बंध :- खड़े होकर दोनों हाथों को घुटनों से लगाकर श्वास बाहर छोडें और पेट को ढीला छोड़कर छाती को ऊपर उठाएं ! पेट को कमर से लगा दें ! शुरुआत में तीन बार पर्याप्त है !
३ . मूलबंध :- पद्मासन या सिद्धासन में बैठकर गुदाभाग और मूत्रेन्द्रिय को ऊपर के और आकर्षित करें ! ( एक मिनट )
४ . महा बंध :- तीनों बंध एक साथ लगाएं ! ( एक मिनट )
                       अब प्राणायाम शुरू करते हैं :--
१ . भस्त्रिका :- सुविधानुसार बैठकर दोनों नासिकाओं से श्वास को डायफ्राम तक भरना और सहजता से बाहर छोड़ना ही भस्त्रिका है ! एक मिनट में १२ बार होता है ५ मिनट प्रतिदिन करें !
   * HIGH B.P. वाले तेजी से ना करें ! ( ५ मिनट )
२ . कपालभाति :- श्वास को भरने के लिए विशेष प्रयत्न ना करें बल्कि जितना श्वास सहजता से अन्दर चला जाता है उसे पूरी एकाग्रता के साथ बाहर निकलने का प्रयत्न करें !एक मिनट ,में ४५ बार ५ मिनट करें ( ५ मिनट )
३ . अनुलोम - विलोम :- इससे कई लोग परिचित होंगे बहुत ही प्रसिद्ध प्राणायाम है ! लेकिन ये प्रसिद्ध ऐसे ही नहीं है,इसकी विशेषताएं ही ऐसी हैं ! पद्मासन में बैठकर दोनों हाथ को उठाकर अंगूठे के द्वारा दायीं नासिका को बंद करें और अनामिका और मध्यमा अँगुलियों के द्वारा (अंगूठे से दूसरी और तीसरी) बायीं नासिका को बंद करें और श्वास लेकर छोड़ने का क्रम प्रत्येक नासिका के द्वारा करें ! विशेष :- (इस प्राणायाम को करने से ७२ लाख ७२ हज़ार १० हज़ार २१० नाडिया शुद्ध हो जाती हैं !)
४ . भ्रामरी :- श्वास को पूरा अन्दर भरकर दोनों हाथों के अंगूठों से दोनों कानों को बंद कर लें और मध्यमा अंगुलिओं के द्वारा नासिका मूल को दबाएँ फिर भंवरे की तरह गुंजन करते हुए नाद रूप में "ॐ" का उच्चारण करते हुए श्वास को बाहर छोडें !( ५ मिनट ) ( विशेष:- डिप्रेशन , माइग्रेन और नेत्र रोग में लाभदायक )
५ . उदगीथ :- ३ से ६ सेकण्ड में श्वास को एक लय क साथ अन्दर भरना और १८ से २० सेकण्ड में बाहर छोड़ना ! (५ मिनट )
*** भ्रामरी और उदगीथ से किसी प्रकार की हानि होने की सम्भावना नहीं है !
६ . ध्यान :- अंत में ५ मिनट मौन रहकर समस्त विचारों को मन से निकालकर शिव का ध्यान करें ! ( ५ मिनट )
             ये पूरा अभ्यास ३४ मिनट का है , यदि अधिक समय लग तो ४० मिनट का समय मन जा एकता है लेकिन ये समय आपके जीवन को नयी ऊर्जाओं से भर देगा !
समय के साथ - साथ इन अभ्यासों के समय व संख्याओं को बढाया भी जा सकता है !
आज के इस लेख में मैं केवल अपनी दिनचर्या में शामिल करने योग्य नियमित योग सारणी का ही उल्लेख किया है , लेख का कलेवर अधिक विस्तृत ना हो जाये इसलिए इनके लाभ या अन्य बातों का उल्लेख नहीं किया और भाषा को भी अति संक्षिप्त रखने का प्रयास किया है , यदि इसमें फिर भी किसी प्रकार की त्रुटि रह गयी हो तो पाठक गण मेरा सहयोग करेंगे ऐसी आशा करता हूँ !साथ ही कुछ हिदायतें भी है अपनाने के लिए ! प्राणायाम का अभ्यास हमेशा स्वच्छ स्थान पर किया जाना चाहिए !आसन कुचालक यथा कम्बल या कुशा का होना चाहिए !
            सबसे महत्वपूर्ण बात ये , कि योग का अभ्यास करते समय धैर्य रखना चाहिए क्योंकि उतावलापन समस्याएं उत्पन्न कर सकता है !
              यथा सिंहो गजो व्याघ्रो भवेद वश्यः शनैः शनैः !
                  तथैव वश्यते वायुरन्यथा हन्ति साधकं !!
    अर्थात जिस प्रकार शेर , बाघ और हाथी जैसे प्राणियों को धीरे - धीरे वश में किया जाता है वरना ये हमला भी कर सकते हैं , उसी प्रकार प्राणायाम को धीरे - धीरे बढ़ाते हुए प्राण को वश में करना चाहिए !
        योग का अभ्यास करने वाले या ना करने वाले सभी को गीता का ये श्लोक अवश्य व्यवहार में लाना चाहिए :-
                                             
                         युक्ताहर्विहरास्य युक्तचेष्टस्य कर्मसु !
                    युक्तस्वप्नावबोधस्य योगो भवती दु:खहा !!
                   अर्थात जिसका आहार - विहार ठीक है , जिस व्यक्ति की निश्चित दिनचर्या है और जिसका सोने जागने का समय भी निश्चित है , ऐसा व्यक्ति ही योग कर सकता है और उसका योग का अनुष्ठान दु;खों का नाशक बनता है !
           आवश्यकता और रुझान महसूस होने पर आगे भी इस विषय पर चर्चा करने का प्रयत्न किया जाएगा तथा अलग - अलग रोगों के लिए योग और आयुर्वेद के नियमों का विचार करने का प्रयास करेंगे !
   आज का टिप :- राहू गन्दगी है,अतः रIहू का प्रभाव रहने पर व्यक्ति को जितना अधिक साफ़ - सुथरा रखने का प्रयत्न किया जाएगा मंदिरों में ले जाया जाएगा या आग के समीप वाले स्थानों पर ले जाने का प्रयत्न किया जाएगा उसके लिए उतना ही अच्छा है ! ये कार्य किसी दूसरे के द्वारा किया जाये ऐसा इसलिए लिखा क्योंकि वो स्वयं ऐसा कभी करना नहीं चाहेगा ! और कभी मानने को तैयार नहीं होगा कि वो किसी दुष्प्रभाव में है !
! जय गणेश !
!! जय जय गणेश !!