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Saturday, February 24, 2018

RAHU - THE NODE POINT

राहु
एक ग्रह के कई कारकत्व होते हैं और प्रत्येक कारकत्व के आधार पर उसके अलग अलग प्रभाव भी होते हैं इसी के आधार पर आज राहु ग्रह की बात करते हैं -
-राहु अव्यवस्था का प्रतीक है या ऐसा भी कह सकते हैं कि किसी व्यवस्था में विघ्न उत्पन्न करना भी राहु का ही काम है.
-नाड़ी ज्योतिष के अनुसार गुफा (CAVE) पर भी राहु का आधिपत्य है या ऐसा कहें की गुफा के समान संरचना पर भी राहु का ही अधिकार है.
राहु की स्थिति यदि लग्न में हो फिर चाहे लग्न में कोई भी राशि स्थित हो ,तो ऐसा राहु दांतों में किसी न किसी प्रकार की अव्यवस्था उत्पन्न करता है , जैसे -
- दांत पर दांत चढ़ा होना .
- किसी दांत का आधा टूटा होना .
-दांतों पर लाल या काले रंग की परत का जमा होना .
- स्कर्वी रोग हो जाना .
- कीड़े पड़ने से दांतों का खोखला हो जाना इत्यादि .
कई बार ये स्थितियां जन्म से ही उपस्थित होती है जबकि कई बार ये प्रकृतिजन्य होती है , जैसे
-छोटी उम्र में गिरने पर दांत टूट जाना या दांत पर दांत का चढ़ जाना .
- चॉकलेट खाने से दांतों में कीड़े पड़ जाना .
- कई बार दांत की निरंतर सफाई न करने से भी दांतों पर कुछ दाग हमेशा के लिए जम जाते है तथा बदबू आती है .
जिन लोगों का अनुभव मैंने प्राप्त किया है उनमे से :- एक व्यक्ति जिसका मकर लग्न है तथा लग्न में शनि राहु स्थित है, के दांत की श्रृंखला टेढ़ी - मेढ़ी ( ZIG-ZAG ) है ,जिसके कारण पिछले दांतों की सफाई ठीक तरह से नहीं हो पाती और उन पर जमे हुए काले रंग की परत को आसानी से देखा जा सकता है .
दूसरी कुंडली में लग्न में केवल राहु ही स्थित है और जब मैंने पूछा कि दांतों में क्या रोग है तो बताया गया की स्कर्वी है .
अन्य अनुभवों के आधार पर कहा जा सकता है कि लग्न में स्थित राहु दन्तावली में किसी न किसी प्रकार की समस्या देता है .
अब यह समस्या किस लग्न के राहु में किस प्रकार की होगी तथा युति व दृष्टि से किस प्रकार प्रभावित होगी यह निरंतर अनुभव व शोध का विषय है .
ऐसा नहीं है कि लग्न के राहु का यही एक फल है ,अन्य फल भी होते हैं ,उनमें से यह भी एक है .


अन्य ज्योतिर्विदों के अनुभवों की अपेक्षा में आपका
श्रीराम

Saturday, August 22, 2015

कर्म और भाग्य - ३

         समझ और नासमझी का अंतर समझें या समझ समझ कर नासमझी की जिद -
                        एक प्रश्न जो हमेशा से ज्योतिष का ज्ञान रखने वाले लोगों के लिए भी उतना ही महत्वपूर्ण और पेचीदा रहा है , जितना कि सामान्य जन मानस के लिए . और वह प्रश्न है कि जीवन में कर्म अधिक महत्वपूर्ण है या भाग्य ...............
   
                 
                                     एक बार इसी ब्लॉग पर यह क्रम शुरू किया था पर किन्हीं कारणों से पूरा नहीं लिख पाया था देखें -कर्म और भाग्य - १ तथा कर्म और भाग्य - २   इन लेखों में रामचरितमानस महाभारत और रामायण के उदाहरणों से इस विषय को समझना शुरू किया था पर पूर्ण नहीं कर पाए थे . अब इस विषय पर एक और प्रयास कर रहा हूँ और इसी क्रम सबसे पहले सामान्यजन और ज्योतिष ज्ञानार्जन करने वालों से आग्रह है की वे अपने विचारों से अवगत कराएं ताकि सभी को इस विषय में भागीदारी करने का मौका मिले .............

Thursday, October 4, 2012

धार्मिक कर्म में मौलि बंधन क्यों ?

       किसी भी शुभ कार्य से पहले जैसे कोई पूजा -  अनुष्ठान , गृह प्रवेश ,दीपावली की पूजा  या अन्य कोई भी पूजन सर्वप्रथम पंडित जी यजमान (यज्ञमान) को तिलक करते हैं और मौली बंधते हैं फिर पूजा आरम्भ होती है ! मौली बंधते वक़्त इस  मंत्र का उच्चारण  जाता है:-


        येन  बद्धो बलीराजा दावेंद्रो महाबलः !
            तेन त्वामनुबध्नामि रक्षे  माचल माचल !! 


       ये प्रथा कब शुरू हुई और इसके महत्त्व के विषय में अनेक आख्यान शास्त्रों में मौजूद हैं !मौली बंधने की परंपरा तब से चली आ रही है, जब से महान , दानवीरों में अग्रणी महाराज बलि की अमरता के लिए वामन भगवान् ने उनकी कलाई पर रक्षा सूत्र बांधा था !

            इसे रक्षा  कवच के रूप में भी  शरीर पर बांधा जाता है !इन्द्र जब वृत्रासुर से युद्ध करने जा रहे थे तब इंद्राणी शची ने इन्द्र की दाहिनी भुजा पर रक्षा-कवच के रूप में मौली को बाँध दिया था और इन्द्र इस युद्ध में विजयी हुए ! 

      स्वास्थ्य के अनुसार मौली-बंधन से वात पित्त और कफ तीनों का शरीर में संतुलन बना रहता है और शरीर नीरोग रहता है !साधारणतया हम देखते हैं,कि यदि कोई कर्मकांडी पुरोहित जो कई दिनों तक चलने वाले अनुष्ठान में  हैं और दुर्भाग्यवश उनके कुटुंब में किसी निकट संबंधी की मृत्यु हो जाती है तो भी उनको "सूतक"का दोष नहीं लगता है और वो अपना अनुष्ठान निर्विघ्न पूरा कर सकते हैं,क्योंकि क्योंकि उनहोंने पूजन आरम्भ होने पर बंधी जाने वाली मौली बाँध  रखी है!यानी की मौली के प्रभाव से उस बड़े अनुष्ठान पर बाधा ताल जाती है ! 





    

Monday, January 9, 2012

4.रोहिणी


नक्षत्र:रोहिणी

                                                                     4.रोहिणी 
रोहिणी नक्षत्र का वैदिक नाम रोहिणी ही है!इस नक्षत्र में पांच तारे मिलकर शकट अर्थात गाड़ी की आकृति का निर्माण करते हैं!संहिता ग्रंथों में रोहिणी को शकट-भेदन कहा गया है!रोहिणी का अर्थ है ऊपर की ओर बढ़्ने वाली वस्तुएं!इस नक्षत्र का स्वामी ब्रह्मा को माना गया है!नौ ग्रहों में चंद्र रोहिणी नक्षत्र का अधिपति है!यह स्थिर नक्षत्र है,अर्थात इसमें स्थिरता वाले कार्य जैसे गृह-प्रवेश,बिजाई,व्यापार शुरू करना,मंदिर बनाना आदि कार्य शुरू किये जा सकते हैं!यह ऊर्ध्वमुख नक्षत्र है अर्थात ऊपर की ओर बढ़ने वाले कार्य जैसे नौकरी शुरू करना,बड़े पद को ग्रहण करना,और विकासशील कार्य शुरू किये जा सकते हैं!चैत्र मास का रोहिणी नक्षत्र शून्यसंज्ञक होता है,इस दिन कोई शुभ कार्य नहीं करना चाहिए!शनिवार को रोहिणी नक्षत्र हो तो अमृतसिद्धि योग का निर्माण होता है और यही नक्षत्र सोमवार को हो सर्वार्थसिद्धि योग का निर्माण होता है!अपवाद के रूप में शनिवार को रोहिणी नक्षत्र हो और उसी दिन एकादशी भी हो तो विषयोग का निर्माण होता है,जो सभी शुभ कार्यों के लिए वर्जित है!इस नक्षत्र के लिए जामुन की पूजा की जाती है!रोहिणी नक्षत्र की जाति किसान,मजदूर या हलवाहे की होती है!यह नक्षत्र स्त्रीसंज्ञक होता है!गोत्र का संबंध अत्रि मुनि से है!इसकी नाड़ी अन्त्या,गण मनुष्य और योनि सर्प की होती है!यह कालपुरुष की आँखों का स्वामित्व रखता है!अनुमष्तिष्क,ग्रीवा कशेरुक और तालू पर इसी नक्षत्र का अधिकार होता है!भूसे की गाडी के आकार जैसा यह नक्षत्र फरवरी माह मे रात को 9 बजे तक दिखाई देता है!
कारकत्व:-रोहिणी नक्षत्र अधिकता से सम्बंधित है जैसे कोई आपको प्रश्न करे कि बारिश होगी क्या? उस वक्त चंद्र और लग्न का सम्बन्ध रोहिणी नक्षत्र से हो तो अच्छी बारिश होती है!जुबान के पक्के,व्यापारी,अधिकारी,योगी,पानी के जीव,खेती करने वाले,जंगली प्रदेश!
नक्षत्रफल:-रोहिणी का संबंध विकास से है!सत्यवादी,चतुर,तेजस्वी,स्थिति को भांप लेने वाले,निडर,सांसारिक सुखों में तल्लीन,खेती से प्रेम,वाक्-पटु होते हैं!
पदार्थ:-रस वाले पदार्थ,ऊन,समय सात दिन!
व्यक्ति:-इनकी आँखें बड़ी-बड़ी होती है!अपने लक्ष्य के प्रति निष्ठावान होता है!नए विचार व परिवर्तन का स्वागत करता है!व्यवस्थित ढ़ग से काम करना रोहिणी नक्षत्र का विशिष्ट गुण है!जलचर,कृषक,राजसिक प्रवृत्ति के लोग,ट्रेवल एजेंट,जहाज का कप्तान इत्यादि!
रोहिणी नक्षत्र का वैदिक मंत्र:-ब्रह्मजज्ञानं प्रथमम्पुरस्ताद्विसीमः सुरुचे वेन आयवः सबुध्न्या उपमा अस्य विष्ठा: सतश्च योनिमसतश्च विध: !!  
बीमारियाँ:-गले की खराश,पाँव व छाती में दर्द,स्त्रियों को अनियमित मासिक!
मानसिक गुण:-सौंदर्य-प्रेमी,मधुर भाषी,स्थिर मानसिकता,प्रिय मिजाज वाला,शुद्ध ह्रदय,परोपकारी!
व्यवसाय:-यह कृ्षि उत्पादन व खनिज उद्योग से जुडा़ है!यात्रा वृत्तांत लेखक,आवास का क्रय-विक्रय करने वाला,
विशेष:-पौराणिक कथाओं के अनुसार रोहिणी चन्द्रमा की सत्ताईस पत्नियों में सबसे सुदर है!कृष्ण जी का जन्म भाद्रपद मास की कृष्णपक्ष अष्टमी तिथि को रोहिणी नक्षत्र में हुआ था!

Saturday, September 17, 2011

नक्षत्र


नक्षत्र : अश्विनी

: नक्षत्र :

एक स्थान से दुसरे स्थान पर पृथ्वी के अयन चलने के कारण खिसकते प्रतीत होने वाले तारामंडलों का नाम नक्षत्र है!तैत्तिरीय संहिता में कहा गया है सृष्टि सर्वत्र जल में रहने पर सृष्टि की शुरुआत में जो तर गए वे तारे हैं!
                                                                           1. अश्विनी 
अश्विनी नक्षत्र का वैदिक नाम अश्वयुज है!अश्विनी नक्षत्र में कुल तीन तारे होते हैं,जो आपस में मिलकर घोड़े के मुख जैसी आकृति का निर्माण करते हैं!
अश्विनी नक्षत्र का मालिक अश्विनी कुमार है,और ग्रहों में इस नक्षत्र का मालिक है केतु !यह क्षिप्र नक्षत्र है,अतः इसमें खरीद-बेच,यात्रारम्भ,विद्यारंभ किया जा सकता है!तिर्यक मुख नक्षत्र होने के कारण जलयात्रा,विमान यात्रा,मशीनरी चालू करना आदि कार्य किये जा सकते हैं!चैत्र मास में अश्विनी नक्षत्र को कोई भी शुभ कार्य नहीं करना चाहिए क्योंकि इसका प्रभाव शून्य होता है!मंगलवार को अश्विनी नक्षत्र होने पर अमृतसिद्धि और रविवार को अश्विनी नक्षत्र होने पर सर्वार्थसिद्धि नक्षत्र का योग करता है!रविवार को अश्विनी नक्षत्र आनंद योग का निर्माण करता है!अपवादस्वरूप अमृतसिद्धि योग यदि सप्तमी तिथी को पड़े तो विष का निर्माण करता है,अर्थात त्याज्य है!अश्विनी नक्षत्र गंडांत संज्ञक होता है इसकी शुरुआत की दो घड़ी अर्थात 48 मिनट गंडांत होते हैं!परन्तु रविवार को अश्विनी नक्षत्र में जन्म होने पर गंडांत का दोष काफी हद तक कम हो जाता है!अश्विनी नक्षत्र के लिए केले,आक व धतूरे के वृक्ष की पूजा करनी चाहिए!अश्विनी नक्षत्र पुरुष संज्ञक और मरीचि गोत्र का होता है!पञ्च तत्वों में इसका तत्व पृथ्वी है!यह नक्षत्र-पुरुष के सर का अधिष्ठाता होता है!इस नक्षत्र की योनी अश्व,नाड़ी आद्या और गण देव होता है!
कारकत्व:-घोड़ों से सम्बंधित लोग,आधुनिक काल के हिसाब से वाहनों से सम्बंधित लोग!सेनापति,शरीर की चिकित्सा करने वाले चिकित्सक!अधीनस्थता में काम करने वाले लोग!रूपाजीवी अर्थात सुंदरता से धन कमाने वाले लोग!कृषि कर्म करने वाले !

नक्षत्रफल:-सुरूप चमकयुक्त बड़ी आँखें!आकर्षक उभारयुक्त ललाट,कार्यदक्ष,बुद्धिमान,अच्छी नीरोग शक्ति वाला,बातों से प्रभावित करने वाला होता है!दृढ़ निश्चय या यूं कहें की अड़ियलपन इनकी खास पहचान होती है!
पदार्थ:-चावल,घी,अनाज,कपडा,घास,चारा,जड़ी-बूटियाँ,केमिकल आदि!
व्यक्ति:-घोड़ों के व्यापारी,प्रशिक्षक,घुडदौड कराने वाले,वाहन उद्योग से सम्बंधित लोग,चिकित्सक,कर्मचारी वर्ग,विज्ञापन की दुनिया से जुड़े लोग!
अश्विनी नक्षत्र का वैदिक मंत्र:- "अश्विना तेजसाचक्षु: प्रIणेन सरस्वतीवीर्यम् ! वाचेंद्रो बलेनेंद्रा यदद्युरिन्द्रयम्"
बीमारियाँ:-सर में चोट,दुर्बलता,मिर्गी,सर के आधे भाग में दर्द,मूर्छा,असाधारण नींद,पक्षाघात,मलेरिया,छोटी चेचक!
मानसिक गुण:-भाईयों से मतभेद,विवेक शून्य,हनुमान जी की पूजा,लोभी,भूमि के लिए चिंतित!
व्यवसाय:-पुलिस,सेना,चिकित्सा,रेलवे,मशीनरी,लोहा,घुडसवार,जेल,अदालत,कारखाना!

Thursday, September 15, 2011


ग्रह:सूर्य

                                                                  1.सूर्य

                                             "सूर्य आत्मा जगत्स्तथुषश्च"
 सूर्य ग्रहों में राजा है!इसकी जाति राजक्षत्रिय है!इसका रंग रक्त के समान है!सूर्य के देवता अग्नि है!इसके अधिपति शिव है!सूर्य की दिशा पूर्व दिशा है!यह नैसर्गिक पाप ग्रह ना होकर नैसर्गिक क्रूर ग्रह है!
वैज्ञानिक दृष्टिकोण:-सूर्य वास्तव में एक तारा है,जो हमारे सौरमंडल को बाँधे रखने का कार्य करता है!सूर्य ही सौरमंडल का केंद्र बिंदु है,जिसके चारों ओर ग्रह और उपग्रह घूर्णन करते हैं!इसका कारण है,कि सूर्य से ही सभी पिंडों को जीवनी शक्ति प्राप्त होती है!सूर्य के बिना हमारे सौरमंडल और जीवन की कल्पना भी नहीं की जा सकती!यह पृथ्वी के सबसे नजदीक का तारा है!इसीलिये अन्य तारों की अपेक्षा अधिक चमकदार और बड़ा प्रतीत होता है!सूर्य पर हाइड्रोजन गैस का भण्डार है,जिसकी आपस में संयोजित होने की क्रिया से जो असीमित ऊर्जा विसर्जित होती है उसके अंश मात्र से पृथ्वी पर जीवन है,सभी ग्रहों का वातावरण है!
पौराणिक विवेचन:-पुराणों में आलेख मिलते हैं,कि दक्ष प्रजापति की दो कन्याओं दिति और अदिति का विवाह कश्यप मुनि के साथ हुआ था!अदिति के गर्भ से सूर्य का जन्म हुआ इसीलिये इसे आदित्य कहा जाता है!पौराणिक मान्यताओं के अनुसार सूर्य के रथ में सात घोड़े जुते होते हैं!सूर्य ने संज्ञा और छाया से विवाह किया!छाया से शनि नामक पुत्र उत्पन्न हुआ जो पिता के समान बलशाली है!
पर्यायवाची:-सूर्य को अंग्रेजी में SUN,अरबी मैं आफताब,फारसी में खुरशेद कहते हैं!हिन्दी में इसे आदित्य,अर्क,अर्यमा,अंशुमाली,ग्रहपति,दिनकर,दिवाकर,प्रभाकर,भानु,मार्तंड,रवि,सविता,भास्कर,मिहिर,दिनेश इत्यादि नामों से जाना जाता है!
वैदिक मंत्र:-  ॐआकृष्णेन रजसा वर्त्तमानो निवेशयन्नमृतं मर्त्यन्च !
                      हिरण्ययेन सविता रथेना देवो याति भुवनानि पश्यन !!
तांत्रिक मंत्र:- ॐ ह्राँ ह्रीं ह्रौं सः सूर्याय नमः !!
स्वामित्व:-रवि सौरमंडल की आत्मा है,इसके बिना सौरमंडल का अस्तित्व संभव नहीं है!अर्थात जीवन के लिए जितनी भी आवश्यक वस्तुएं हैं उन सब पर सूर्य का ही अधिकार है!हो सकता है पढ़कर ऐसा प्रतीत हो,कि जीवन के लिए तो वायु,भोजन और जल तीनों ही आवश्यक है,फिर इन सब पर सूर्य का अधिकार कैसे है!सूर्य के कारण ही पृथ्वी के पास वह शक्ति है,कि वायु और जल पृथ्वी की सतह पर उपलब्ध है और हमें भोजन प्रदान करने वाला वनस्पति जगत भी अस्तित्वमान है!रवि की ऊष्मा शरीर को जलाने वाली नहीं बल्कि शरीर के जीवित रहने के लिए जरूरी होती है!अतः आत्मा पर सूर्य का स्वामित्व है!आत्मा लौ के रूप में ऊर्ध्वगामी होकर ह्रदय में अवस्थित होती है अतः ह्रदय पर भी इसी ग्रह का अधिकार है!ह्रदय से जुड़े विभिन्न प्रकार के भाव जैसे क्षमाशीलता,अनुशासन भी सूर्य के ही अधिकार में है!
शारीरिक लक्षण एवं रचना:-इनकी आँखों का रंग धुप के जैसा होता है!अब बात आती है,कि धूप का रंग कैसा है तो गौर से देखने पर पता चलेगा कि धूप का रंग शहद के समान हल्का भूरा होता है!इनके शरीर में भी एक शहद जैसे रंग की एक परत चढी महसूस होती है!इनका चेहरा गोल होता है!यह हृदय का कारक है!पुरुषों में दांयी और स्त्रियों में बाँई आँख पर इसका स्वामित्व होता है!पेट में पाई जाने वाली जठराग्नि पर भी सूर्य का अधिकार है!
चरित्र में निहित विशेषताएं:-निःस्वार्थ प्रेम सूर्य की सबसे बड़ी विशेषता है!यह बिना भेदभाव के सबके लिए समान व्यवहार रखता है!इसकी दूसरी विशेषता है नियमित होना जिस प्रकार सूर्य नियमित होता है उसी प्रकार सूर्य के प्रभाव क्षेत्र में आने वाला व्यक्ति भी नियमित होता है!ईश्वर के प्रति सच्चा प्रेम होता है!ये ताकतवर किन्तु न्यायप्रिय होते हैं!इच्छाशक्ति बहुत ही प्रबल होती है!ये कभी थकते नहीं हैं!इनके व्यक्तित्व में एक विशेष आकर्षण होता है!दूसरों पर शासन करने की कला और ऊर्जा होती है!ईमानदारी इनकी चारित्रिक विशेषता में चार चाँद लगा देती है!
बीमारियाँ:-दिल से सम्बंधित बीमारियाँ,गर्मी के कारण होने वाले रोग,ज्वर,दृष्टि-दोष,रीढ़ सम्बन्धित रोग,पाचन से सम्बंधित समस्याएं,आत्म शक्ति की कमी!ब्लड-प्रेशर भी रवि के आधिपत्य में है क्योंकि रक्त का प्रवाह धीरे होगा या तेज यह हृदय के आकुंचन पर निर्भर करता है और हृदय पर सूर्य का अधिकार है!सूर्य के पीड़ित होने पर मुंह से थूक आता रहता है!
व्यवसाय:-राजकीय सेवा,ऊर्जा उत्पादन,दवाइयों से जुड़े व्यवसाय,धन,अनाज के कारोबार,प्रकाश देने वाली चीजें जैसे बल्ब,ट्यूब लाईट के कारोबार,डॉक्टर इत्यादि!सोने का कारोबार!सूर्य स्थिरता का कारक है यह जीवन में स्थायित्व को निर्देशित करता है!पिता द्वारा प्रदत्त स्वयं का काम!
स्टॉक मार्केट:-POWER SECTOR,NUCLEAR ENERGY,GOVT. PUBLIC SECTOR UNITS,MEDIA.
COMMODITY MARKET:-सोना,ताम्बा,कांसा,GUN METAL,माणक,गेंहू,पटाखे,ग्रेफाईट और सल्फर!
राजनीतिक दृष्टिकोण:-प्रशासकों को निर्देशित करता है!राजा,तानाशाह,बड़े शाही नेता,विभागों के अध्यक्ष,वे लोग जिनके पास शक्ति व अधिकार है!ये एक होता है,जो सभी को नियंत्रित करता है यदि इस लिहाज से देखा जाये तो सूर्य के सभी गुण राजशाही में राजा के अंदर देखने को मिलेंगे लोकतंत्र में नहीं क्योंकि लोकतंत्र में तो शासक जनता होती है शक्ति का मुख्य पुंज नागरिक होते है और नेता तो केवल कार्यवाहक होते है या यूं कहें तो नौकर होते है इसलिए मुझे ऐसा लगता है,कि विभागाध्यक्ष तो फिर भी सूर्य के प्रभाव में हो सकते हैं पर नेता तो सेवक हैं मालिक नहीं हाँ ये बात और हैकि ये लोग आगे जाकर स्वयं को लोकतंत्र का उत्तराधिकारी समझने लगें!
पदार्थ:-अखरोट,नारियल,इलाइची,केसर,अजवायन,चावल,मिर्ची,बादाम,मूंगफली,पाइन,विदेशी मुद्रा,दवाएं,
बाजार और संस्थान:-रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया,स्टॉक एक्सचेंज,सरकारी दफ्तर,सोना और इसकी कीमतों में उतार चढ़ाव,सरकारी ऋण इत्यादि!
पेड़-पौधे:-कांटेदार पेड़,बादाम,संतरे,केसर,शीशम,गुलाब और केदार के पेड़ व पौधे!इनके अलावा चिकित्सकीय प्रयोग में आने वाले पादप!
स्थान:-जंगल,शिव मंदिर,सरकारी ऑफिस,पंचायत समिति,ऊर्जा विद्युत केंद्र,विद्युत निर्माण केंद्र,दवाई की दूकान इत्यादि!
अंक:-"एक" पर निर्विवाद रूप से सूर्य का अधिकार है!
दिन,राशि और नक्षत्र:-रविवार का मालिक सूर्य है!राशियों में सिंह राशि का स्वामित्व सूर्य के पास है!सत्ताईस नक्षत्रों में से कृतिका,उत्तराफाल्गुनी और उत्तराषाढा नक्षत्रों का मालिक भी सूर्य है!
रत्न:-माणक सूर्य का प्रमुख रत्न है!इसे सोने में मढवाकर पहना जा सकता है!यह रोगप्रतिरोधक क्षमता को बढाने के साथ-साथ सरकारी साख भी बढाता है!
जीव-जंतु:-शेर,घोडा,मवेशी और जंगल में रहने वाले अन्य जंगली जानवर!
       सूर्य ग्रीष्म ऋतु का मालिक होता है!यह एक माह तक एक राशि में रहता है और इसकी एक दिन की गति लगभग एक अंश होती है!सौरमंडल में सूर्य के गति को अयनांश कहा जाता है!घर में सूर्य का स्थान पूजन-कक्ष होता है!सूर्य प्रभावित व्यक्तियों के घर का दरवाजा पूर्व दिशा मैं होता है!सूर्य चालित व्यक्ति के दांये नितंब पर निशान बना होता है!

Wednesday, July 6, 2011

ज्योतिष : पुरातन विवेचन :- आचार्य राज


आज बात कर रहा हूँ अपने पूजनीय गुरु श्री आचार्य राज द्वारा बताये गए एक पौराणिक किस्से का जिनका जिक्र उन्होंने अपनी पुस्तक "सितारों के अक्षर किरणों की भाषा" में भी किया है ! एक बात गुरूजी की किताबों के बारे में भी बताना चाहूँगा कि इनकी किताबें वास्तव में प्रसिद्द लेखिका अमृता प्रीतम के साथ संवाद है जिनका स्वरुप बाद में पुस्तकमय कर इनको प्रकाशित किया गया है ! दिल्ली के "किताब घर" से इनका प्रकाशन होता है ! इनकी दूसरी पुस्तक का नाम है "सितारों के संकेत"जिसमें आचार्य का स्वप्न ज्योतिष का गूढ़ ज्ञान दृष्टिगोचर होता है ! पुनः विषय पर आगे बढते हैं,आचार्य ने अपनी पुस्तक में ज्योतिष के उद्गम का विवेचन किया है, जिसका जिक्र मैं यहाँ उन्हीं के शब्दों में करने का प्रयास कर रहा हूँ ! 
     ज्योतिष की उत्पत्ति वेदों से होती है या ऐसा  कहें कि ज्योतिष वेदों का ही एक अंग हैं जिसे वेदों के नेत्र की संज्ञा दी गयी है !क्योंकि देखने का सामर्थ्य नेत्रों में होता है और ज्योतिष भी देखने का कार्य करता है !इस प्रकार सृष्टि के आरम्भ में ज्योतिष पर मूलतः प्रजापति ब्रह्मा का स्वामित्व था !जब जगन्नियन्ता परम पिता परमात्मा के आदेश से उन्होंने इस जगत के निर्माण का कार्य शुरू किया तो सर्वप्रथम उन्होंने तप के द्वारा सृष्टि के निर्माण की शुरुआत की !लेकिन कई युग बीत जाने पर उनके तप बल से आठ मानसिक पुत्रों को उन्होंने उत्पन्न किया !ये आठ पुत्र है सप्तर्षि और देवर्षि नारद !इसके बाद ब्रह्मा जी ने विचार किया कि इस प्रकार से मानसिक सृष्टि करने में तो करोड़ों युग बीत जायेंगे तो क्या किया जाय तब उनके मन में मैथुनी सृष्टि का विचार उत्पन्न हुआ ! उन्होंने अपने आठों पुत्रों को बुलाया और उनके समक्ष मैथुनी सृष्टि के विचार को रखा !उनके सात पुत्र तो मैथुनी सृष्टि स्वीकार करने के लिए तैयार हो गए "ये थे सप्तर्षि" लेकिन उनका एक पुत्र ने मैथुनी सृष्टि को स्वीकार नहीं किया और वो थे "नारद"!तब मैथुनी सृष्टि के विचार को अपनाने वाले पुत्रों के लिए ब्रह्मा ने स्त्री के निर्माण का कार्य शुरू कर दिया लेकिन काफी समय के बाद जब वे इस कार्य में पूर्ण रूप से सफल नहीं हो सके तो उन्होंने देवाधिदेव महादेव की शरण ली और महादेव ने प्रसन्न होकर पहले अर्धनारीश्वर रूप ग्रहण किया फिर नारी स्वरुप को अपने शरीर से अलग कर स्त्री जाति की उत्पत्ति की !इस प्रकार मैथुनी सृष्टि की शुरुआत हो गयी !फिर ब्रह्मा जी ने विचार किया कि मेरे सात पुत्र तो मैथुनी सृष्टि स्वीकार करके मर्त्यलोक में निवास करने चले गए अब मैं नारद को क्या दूं इस प्रकार विचार करते हुए ब्रह्मा जी ने नारद को वेदों में से ज्योतिष का ज्ञान प्रदान किया और नारद दैवज्ञ हो गए !दैवज्ञ वो होता है जो सात जन्म आगे और पीछे तक का ज्ञान ज्योतिष से प्राप्त कर लेता है !जब नारद भी इस कोटि को प्राप्त हो गए तो वह सदैव दैत्यों और देवताओं को आने वाले भविष्य के लिए पहले से ही सूचित करते रहते जिसके कारण कई बार सुनने को मिलता है , कि नारद ही देवताओं और दानवों को लड़ाने  का कार्य करते थे लेकिन वास्तव में नारद को सब कुछ पता होता था वो तो केवल आगाह करने का कार्य करते थे जो होना था वो तो निश्चित था !
             इस प्रकार ज्योतिष का पौराणिक  उद्गम "नारद पुराण"को माना जाता है !ऐसा कहा जता है , कि शुरुआत में इसमें 84 लाख श्लोक हुआ करते थे लेकिन वक्त की धुल में उड़ते - उड़ते ये श्लोक आज  नाम मात्र ही रह गए हैं !चाहें तो इस विषय पर ज्योतिषीगण नारद पुराण का पठन कर सकते हैं !  कहा जा सकता है कि वर्तमान में जो ज्योतिष का लेख विद्यमान है वह अपूर्ण है और सतत प्रयासों के द्वारा उनकी रचना पुनः करनी होगी !ज्योतिष को विभिन्न शाखाओं में विभाजन कर उनका तार्किक तरीकों से अध्ययन करना होगा !ज्योतिष फल बतलाने वाले पंडितों को ये बात समझनी होगी की विवाह की तिथी और नौकरी बताने वाला पंडित अचानक से बरसात का दिन ,चुनाव की जीत ,ज्वालामुखी का फटना आदि नहीं बता सकता क्योंकि ये ज्योतिष की अलग - अलग शाखाएं हैं लेकिन इस बात को समझे बिना पांडित्य को बरकरार रखने के लिए फलादेश किया जाता है और गलत होने पर पंडित जी के साथ साथ इस विषय को भी खामियाजा भुगतना पड़ता है !इसलिए बिना ज्ञान के ज्योतिष की विभिन्न शाखाओं में फलादेश करने से बचना चाहिए और पहले एक शाखा पर पूरी पकड़ करने का प्रयास करना चाहिए !मैं आह्वान करता हूँ भारत के उन सभी ज्योतिष से जुड़े लोगों का कि वो आगे बढे और जिस तरह से भी कर सकते हैं इस विषय को प्रामाणिक और उपयोगी बनाने में मदद करें ! गणेश जी हमें हमारे कार्य में सफल करे ! जय गणेश !

! जय गणेश ! 
! जय जय गणेश !!

Tuesday, June 28, 2011

श्री गणेश कहते हैं

          आज तक हमने सिर्फ ये सुना और जाना है,कि किसी भी पूजा के करने से पहले गणेश जी पूजा करनी चाहिए आइये आज गणेश जी के प्रथम पूज्य होने के अलावा उनके अन्य पक्षों पर दृष्टिपात करते हैं ! श्री गणेश केवल उपदेशात्मक रूप से नहीं बल्कि इस मोह माया युक्त संसार में जीवन को किस प्रकार व्यतीत करना चाहिए इसके बारे में अपने प्रत्येक अंग से कुछ न कुछ कहते हैं !आइये जानते हैं उन सभी नियमों के बारे में जो हमें गणेश जी प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से अपने शरीर के विभिन्न अंगों के द्वारा बता रहे  हैं !
मस्तक :- गणेश जी का मस्तक काफी बड़ा होता है जो हमें अपनी सोच को बड़ा बनाये रखने की और बड़े विचारों को मस्तिष्क में स्थिरता रखने की सलाह देता है !
आँखें :- गणेश जी आँखें काफी छोटी - छोटी होती है जो हमें  सन्देश देती है , कि जीवन में सफल होने के लिए एकाग्रता का होना सर्वाधिक महत्वपूर्ण है !एकाग्रता के बिना सरल से सरल काम को भी पूर्ण नहीं किया जा सकता है और एकाग्रता हो तो पानी में देखकर भी घूमती हुई मछली की आँख को निशाना बनाया जा सकता है ! 
कान :- गणेश जी के कान काफी बड़े होते हैं और ये बड़े कान हमें एक अच्छा श्रोता बनने का सन्देश देते हैं !अर्थात हमारे अंदर धैर्य और एकाग्रता पूर्वक अच्छी बातों को सुनने का सामर्थ्य होन चाहिए ! 
कुल्हाड़ी :- गणेश जी के दांये हाथ की कुल्हाड़ी हमें ये प्रेरणा देती है , कि हमें सांसारिक बंधनों की असत्य डोरियों को काटकर एकमात्र सत्य ईश्वर की और अग्रसर होने का प्रयत्न करना चाहिए ! 
रस्सी :-गणेश जी के बांये हाथ की रस्सी स्वयं को अपने जीवन के चरम लक्ष्य की और खींच कर ले जाने का संकेत देती है और यह लक्ष्य है स्वयं श्री गणेश !
मुख :-गणेश जी का मुख काफी छोटा होता है परन्तु ये हमें दो संकेत देता है , कि एक तो हमें कम बोलना चाहिए !कम बोलने से तात्पर्य है कि जितनी आवश्यकता हो उतना ही बोलना चाहिए अधिक नहीं ! दूसरा संकेत जो हमें गणेश जी के मुख से प्राप्त होता है वह है ,कि हमें  कम खाना चाहिए अर्थात जीवन के लिए भोजन करना चाहिए न कि केवल स्वाद के लिए !
दांत :-गणेश जी का  केवल एक ही दन्त होता है दूसरा नहीं अर्थात हमें केवल अच्छी वस्तुओं का संग्रह करना चाहिए बुरी वस्तुओं का नहीं !दूसरा संकेत हमें ये प्राप्त होता है , कि यह शरीर नश्वर होता है जिसे एक दिन अवश्य ही खत्म हो जाना है !इसलिए शरीर का अधिक मोह नहीं करना चाहिए !लेकिन "शरीर माध्यम खलु धर्मंसाधनं"के विचार को महत्व देते हुए हमें शरीर को नीरोग रखने का पूरा कर्म करना चाहिए क्योंकि शरीर ही संसार में सभी धर्मों को पूरा करने का माध्यम है और मोक्ष का माध्यम है !
सूंड :- गणेश जी की सूंड मानव शरीर की adaptibility का सर्वश्रेष्ठ उदहारण है !यह सूंड हमें शरीर में दुसरे परिवर्तनों को सहेजने और उनके साथ उसी कुशलता से काम करने का सन्देश देती है !जिस प्रकार स्वयं गणेश जी ने हाथी की सूंड का सामंजस्य स्वयं के शरीर के साथ करते हुए अपने मुख के सभी कार्य सूंड के साथ निर्विघ्न्तापूर्ण संपन्न किये !
हस्त :- गणेश जी का दांया हाथ जो आशीर्वाद  देने की मुद्रा में उठा हुआ है ,वो सभी जीवों को सुखपूर्वक जीने का आशीर्वाद दे रहा है !और साथ ही साथ संसार से ईश्वर तक जाने वाले उस दिव्य पथ को भी आलोकित कर रहा है ! 
मोदक अर्थात लड्डू :-मोदक हमें इस बात की सूचना देता है कि यदि आप कोई कर्म करते हैं तो आपको उसका फल तो मिलेगा ही लेकिन यदि आपका कर्म और उसके प्रभाव नश्वर होते हैं तो आपको नष्ट  होने वाला फल ही प्राप्त होगा लेकिन यदि आपके कर्म ईश्वर प्राप्ति के मार्ग को प्रशस्त करने वाले हैं तो आपका प्रसाद भी अलौकिक ,दिव्य और गणेश जी के मोदक के समान अनश्वर होगा ! (अर्थात साधना का फल है मोदक)
बड़ा पेट  :-गणेश जी का बड़ा पेट हमें इस बात की शिक्षा देता है ,कि हमें जीवन में जो कुछ भी हो रहां है उसे शांतिपूर्वक पचा लेना चाहिए!चाहे वह अच्छा हो रहा है या बुरा ! 
प्रसाद :- गणेश जी सामने रखा हुआ प्रसाद ये बता रहा  है , कि सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड आपके कदमों में है और आपके आदेश की प्रतीक्षा कर रहा है ! 
मूषक(चूहा):- मूषक अर्थात गणेश जी का वाहन !मूषक के द्वारा गणेश जी ये बताना चाह रहे हैं ,कि ऐसी इच्छाएं जो हमारे वश में नहीं होती हैं वो नुकसान पहुंचा सकती है इसलिए इच्छाएं सदैव उस आकार की ही होनी चाहिए कि हम उन पर सवारी कर सकें यदि यदि इच्छाएं हम पर सवारी करना शुरू कर देती है तो मुश्किल हो जाती है !विशालकाय गणेश जी का वाहन छोटा सा मूषक इसी बात की दार्शनिक व्याख्या करता नजर आता है  !
         क्यों गणेश का केवल मुख नहीं अंग - अंग बोलता है और वो भी लाजवाब !गणेश जी ने इतनी बुद्धि और अवसर दिया ताकि उनकी यशगाथा में शामिल हो सकूं इसके लिए उनका धन्यवाद ! 
! जय गणेश ! 

Saturday, May 28, 2011

स्त्रियाँ :- एक विलक्षण तथ्य

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zyotish.blogspot.in

Wednesday, May 18, 2011

साधारण दिनचर्या में योग

                        !! प्राणाय नमो यस्य सर्वमिदं वशे !!
        अर्थात - "मैं प्राण को प्रणाम करता हूँ इस प्राण के वश में ये सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड है ! यदि प्राण को वश में कर लिया जाये तो सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड को वश में किया जा सकता है !"
   आज मेरा विषय है योग जिसके बारे में प्रत्येक हिन्दू ये गर्व करता है , कि योग भारत की देन है ! लेकिन योग का अभ्यास कितने भारतीय नियमित रूप से करते हैं ??? इसका कारण शायद ये भी हो सकता है , कि आज की भागदौड़ भरी जिन्दगी में लोगों के पास योग को देने के लिए अधिक समय न हो ! या फिर ये भी हो सकता है , कि अपनी भारी - भरकम तनख्वाह वाली नौकरी के आगे वे योग को एक तुच्छ चीज मानते हो या और भी कई कारण हो सकते हैं जो हमें इस पूर्ण रूपेण भारतीय विज्ञान पर केवल झूठा गर्व करना ही सिखाता है उसका निरंतर अभ्यास करना नहीं ! हो सकता है , कि कई लोगों को ये बात अच्छी ना लगे लेकिन ये वास्तविकता है ! यदि बाबा रामदेव से पहले का समय याद करें तो सच्चाई समझ आ जायेगी ! खैर मेरे लेख का विषय योग का सरलीकरण पेश करना है , जो कई महापुरुषों ने अपने जीवन में प्रयुक्त किया है ! और शायद आप सब के भी काम आ सके क्योंकि मैं भी कम समय में ही योग का अभ्यास करने के लिए इस योग सारणी का अभ्यास करता रहा हूँ !
         इस योग सारणी का प्रयोग प्रत्येक व्यक्ति चाहे वो किसी भी पेशे में हो आसानी से कर सकता है !
                   प्राणायाम के तीन कवच ( बंधत्रय )
               इन्हें योग की भाषा में बंधत्रय कहा जाता है , लेकिन मैंने "कवच" नाम इसलिए दिया है , क्योंकि ये शरीर से बाहर जाने वाली ऊर्जा को रोककर उसे अंतर्मुखी करने का कार्य करते हैं ! प्राणायाम शुरू करने से पहले इनका अभ्यास करना अत्यंत ही लाभदायक रहता है ! शुरुआत में ४ मिनट फिर धीरे - धीरे ८ मिनट तक का समय दिया जा सकता है !
१ . जालंधर बंध :- पद्मासन में बैठकर श्वास अन्दर भरें , दोनों हाथ घुटनों पर टिकाकर ठोडी को कंठकूप पर लगाएं छाती को आगे के और तान कर रखें और दृष्टी भ्रूमध्य में स्थिर करना ही जालंधर बंध है !( एक मिनट )
२ . उड्डीयान बंध :- खड़े होकर दोनों हाथों को घुटनों से लगाकर श्वास बाहर छोडें और पेट को ढीला छोड़कर छाती को ऊपर उठाएं ! पेट को कमर से लगा दें ! शुरुआत में तीन बार पर्याप्त है !
३ . मूलबंध :- पद्मासन या सिद्धासन में बैठकर गुदाभाग और मूत्रेन्द्रिय को ऊपर के और आकर्षित करें ! ( एक मिनट )
४ . महा बंध :- तीनों बंध एक साथ लगाएं ! ( एक मिनट )
                       अब प्राणायाम शुरू करते हैं :--
१ . भस्त्रिका :- सुविधानुसार बैठकर दोनों नासिकाओं से श्वास को डायफ्राम तक भरना और सहजता से बाहर छोड़ना ही भस्त्रिका है ! एक मिनट में १२ बार होता है ५ मिनट प्रतिदिन करें !
   * HIGH B.P. वाले तेजी से ना करें ! ( ५ मिनट )
२ . कपालभाति :- श्वास को भरने के लिए विशेष प्रयत्न ना करें बल्कि जितना श्वास सहजता से अन्दर चला जाता है उसे पूरी एकाग्रता के साथ बाहर निकलने का प्रयत्न करें !एक मिनट ,में ४५ बार ५ मिनट करें ( ५ मिनट )
३ . अनुलोम - विलोम :- इससे कई लोग परिचित होंगे बहुत ही प्रसिद्ध प्राणायाम है ! लेकिन ये प्रसिद्ध ऐसे ही नहीं है,इसकी विशेषताएं ही ऐसी हैं ! पद्मासन में बैठकर दोनों हाथ को उठाकर अंगूठे के द्वारा दायीं नासिका को बंद करें और अनामिका और मध्यमा अँगुलियों के द्वारा (अंगूठे से दूसरी और तीसरी) बायीं नासिका को बंद करें और श्वास लेकर छोड़ने का क्रम प्रत्येक नासिका के द्वारा करें ! विशेष :- (इस प्राणायाम को करने से ७२ लाख ७२ हज़ार १० हज़ार २१० नाडिया शुद्ध हो जाती हैं !)
४ . भ्रामरी :- श्वास को पूरा अन्दर भरकर दोनों हाथों के अंगूठों से दोनों कानों को बंद कर लें और मध्यमा अंगुलिओं के द्वारा नासिका मूल को दबाएँ फिर भंवरे की तरह गुंजन करते हुए नाद रूप में "ॐ" का उच्चारण करते हुए श्वास को बाहर छोडें !( ५ मिनट ) ( विशेष:- डिप्रेशन , माइग्रेन और नेत्र रोग में लाभदायक )
५ . उदगीथ :- ३ से ६ सेकण्ड में श्वास को एक लय क साथ अन्दर भरना और १८ से २० सेकण्ड में बाहर छोड़ना ! (५ मिनट )
*** भ्रामरी और उदगीथ से किसी प्रकार की हानि होने की सम्भावना नहीं है !
६ . ध्यान :- अंत में ५ मिनट मौन रहकर समस्त विचारों को मन से निकालकर शिव का ध्यान करें ! ( ५ मिनट )
             ये पूरा अभ्यास ३४ मिनट का है , यदि अधिक समय लग तो ४० मिनट का समय मन जा एकता है लेकिन ये समय आपके जीवन को नयी ऊर्जाओं से भर देगा !
समय के साथ - साथ इन अभ्यासों के समय व संख्याओं को बढाया भी जा सकता है !
आज के इस लेख में मैं केवल अपनी दिनचर्या में शामिल करने योग्य नियमित योग सारणी का ही उल्लेख किया है , लेख का कलेवर अधिक विस्तृत ना हो जाये इसलिए इनके लाभ या अन्य बातों का उल्लेख नहीं किया और भाषा को भी अति संक्षिप्त रखने का प्रयास किया है , यदि इसमें फिर भी किसी प्रकार की त्रुटि रह गयी हो तो पाठक गण मेरा सहयोग करेंगे ऐसी आशा करता हूँ !साथ ही कुछ हिदायतें भी है अपनाने के लिए ! प्राणायाम का अभ्यास हमेशा स्वच्छ स्थान पर किया जाना चाहिए !आसन कुचालक यथा कम्बल या कुशा का होना चाहिए !
            सबसे महत्वपूर्ण बात ये , कि योग का अभ्यास करते समय धैर्य रखना चाहिए क्योंकि उतावलापन समस्याएं उत्पन्न कर सकता है !
              यथा सिंहो गजो व्याघ्रो भवेद वश्यः शनैः शनैः !
                  तथैव वश्यते वायुरन्यथा हन्ति साधकं !!
    अर्थात जिस प्रकार शेर , बाघ और हाथी जैसे प्राणियों को धीरे - धीरे वश में किया जाता है वरना ये हमला भी कर सकते हैं , उसी प्रकार प्राणायाम को धीरे - धीरे बढ़ाते हुए प्राण को वश में करना चाहिए !
        योग का अभ्यास करने वाले या ना करने वाले सभी को गीता का ये श्लोक अवश्य व्यवहार में लाना चाहिए :-
                                             
                         युक्ताहर्विहरास्य युक्तचेष्टस्य कर्मसु !
                    युक्तस्वप्नावबोधस्य योगो भवती दु:खहा !!
                   अर्थात जिसका आहार - विहार ठीक है , जिस व्यक्ति की निश्चित दिनचर्या है और जिसका सोने जागने का समय भी निश्चित है , ऐसा व्यक्ति ही योग कर सकता है और उसका योग का अनुष्ठान दु;खों का नाशक बनता है !
           आवश्यकता और रुझान महसूस होने पर आगे भी इस विषय पर चर्चा करने का प्रयत्न किया जाएगा तथा अलग - अलग रोगों के लिए योग और आयुर्वेद के नियमों का विचार करने का प्रयास करेंगे !
   आज का टिप :- राहू गन्दगी है,अतः रIहू का प्रभाव रहने पर व्यक्ति को जितना अधिक साफ़ - सुथरा रखने का प्रयत्न किया जाएगा मंदिरों में ले जाया जाएगा या आग के समीप वाले स्थानों पर ले जाने का प्रयत्न किया जाएगा उसके लिए उतना ही अच्छा है ! ये कार्य किसी दूसरे के द्वारा किया जाये ऐसा इसलिए लिखा क्योंकि वो स्वयं ऐसा कभी करना नहीं चाहेगा ! और कभी मानने को तैयार नहीं होगा कि वो किसी दुष्प्रभाव में है !
! जय गणेश !
!! जय जय गणेश !!

Tuesday, April 12, 2011

कर्म और भाग्य -2

                                                  !! ॐ श्री गणेशाय नमः !! 
                                        
                       
                     कर्म और भाग्य के विषय में अपने इस लेख कि शुरुआत में,मैं कहना चाहूँगा कि,हमारे पूर्वज विद्वान मनीषियों ने अपने द्वारा रचित शास्त्रों और विभिन्न प्रकार के ग्रंथों में इस विषय पर अपने बहुत ही स्पष्ट विचारों को अत्यंत ही गूढ़ भाषा में और अनेक टुकड़ो में लिख रखा है I जिसे समझना इतना सहज नहीं है I लेकिन मुझे सदैव से ही ऐसा प्रतीत होता रहा है कि अवश्य ही इन शास्त्रों में आपस में कोई सम्बन्ध है I अलग - अलग प्रतीत होने वाले ये ग्रन्थ एक दुसरे से पूर्ण रूप से अंतर्ग्रथित हैं I और इन्हीं ग्रंथों और इनके संबंधों का अध्ययन करते करते ही मुझे कर्म और भाग्य रुपी इस गूढ़ विषय के बारे में अत्यंत ही स्पष्ट विचार प्राप्त हुए हैं .  ये सब मुझ पर श्री गणेश जी की असीम अनुकम्पा से संभव हुआ है , और मैं भी अपने पूर्वजों का ही अनुसरण करते हुए इस विषय का ज्ञान आप सभी विद्वतजनों की साथ बाँटने को तत्पर हूँ और आने वाले समय में धीरे -धीरे इस माध्यम से अपने सभी संकलित विचारों को भी आपके समक्ष प्रस्तुत करूँगा I

      फिलहाल कर्म और भाग्य कि चर्चा को आगे बढ़ाते हुए बात करते हैं  कि ,कर्म और भाग्य के मर्म को समझने के लिए हमें महर्षि वेदव्यास,गोस्वामी तुलसीदास और अनेकानेक विद्वतजनों कि लेखनी से उद्धृत हुए विषयों का सहारा लेना पड़ेगा I

इसी क्रम मैं शुरुआत करता हूँ वेदव्यास द्वारा रचित महाभारत कथा से :- जो इस विषय कि आत्मा के समान है I

     महाभारत के भीष्म पर्व में भीष्म - युधिष्ठिर संवाद और भीष्म - कृष्ण संवाद में इस विषय की पूर्णतया नींव रख दी गई है इ जहां से ईश्वर कर्म और भाग्य की गुत्थी को सुलझाने के लिए एक डोर प्रदान करते हैं I इसलिए इस विषय को आत्मसात करने के लिए इन संवादों कि गूँज अंतर्मन में होना अत्यंत आवश्यक है I

                      भीष्म - युधिष्ठिर संवाद

दिनभर तक चले भीषण युद्ध कि समाप्ति के पश्चात शाम के समय युधिष्ठिर अपने बंधु - बांधवों के साथ शर शैय्या पर उत्तरायण की प्रतीक्षा कर कर रहे कौरव-कुल-शिरोमणि भीष्मपितामह का कुशलक्षेम पूछने के लिए उनके पास जाते हैं I वहां पहुँचने पर प्रणाम कर युधिष्ठिर पितामह के चरणों के पास खड़े हो जाते हैं I कुछ देर मौन के पश्चात :-

युधिष्ठिर :- पितामह ,इस संसार में ऐसा क्यों होता है , कि शुभ और पुण्य कर्म करने वालों को जीवन भर संघर्ष करना पड़ता है , जबकि पाप कर्मों में लिप्त और जीवन भर भोग - विलासमय जीवन व्यतीत करने वाले कभी भी समस्याओं के भंवर में फंसते हुए नहीं देखे जाते , ऐसा क्यों पितामह ? ऐसा क्यों ?

पितामह :- पुत्र मैं जानता हूँ , कि तुमने आज मुझसे यह प्रश्न कौरवों और पांडवों के सम्बन्ध में पूछा है I अतः मेरी यह बात गौर से सुनो कि मनुष्य को अपने जीवन - काल में केवल अपने कर्मों का फल ही नहीं भोगना पड़ता अपितु स्वयं के साथ - साथ उसे अपने पूर्वजों के कर्मों के फलों का लेखा जोखा भी संभालना पड़ता है I इसलिए कई बार व्यक्तियों को जीवन भर धर्मं के मार्ग पर अडिग रहते हुए भी सुख का एक भी क्षण प्राप्त नहीं होता है और कई व्यक्ति ऐसे होते है ,जो जीवन भर अधर्म में लिप्त रहते हुए भी सुख भोग करते हैं I

                           भीष्म - कृष्ण संवाद

इसी प्रकार एक बार  शर - शैय्या पर लेटे गंगापुत्र भीष्म से मिलने के लिए श्रीकृष्ण जाते हैं I वहां उनके बीच जो वार्तालाप होता है ..........
गंगापुत्र :- प्रणाम वासुदेव ! आज मेरे जीवन को स्वयं से और कुछ प्राप्त करने की अभिलाषा नहीं रह गयी है ,अन्तकाल में जिसे साक्षात् स्वयं श्री हरि का ही संयोग प्राप्त हो जाये उसे अपने जीवन से और क्या प्राप्त करना बाकी रह जाएगा ! परन्तु हे देवकीनंदन एक बात है ,जो मुझे आज तक कचोट रही है ,आज्ञा है तो पूछूँ वासुदेव

कृष्ण :- अवश्य गंगापुत्र Iआप जैसे युगपुरुष को भी यदि कोई बात कचोट रही है , तो आपका संशय दूर करना मेरे लिए परम सौभाग्य की बात होगी I

गंगापुत्र :- हे वासुदेव मुझे अपने पिछले सौ जन्म तक का सब कुछ स्पष्ट रूप से याद है और वहाँ तक मुझे एक भी ऐसा कारन प्रतीत नहीं होता जिसके कारण मुझे आज इस शर-शैय्या पर विश्राम करना पड़ रहा है I

कृष्ण :- हे गंगापुत्र जहां तक तुम्हें याद है उससे एक जन्म पहले तुम एक बार किसी जंगल से गुजर रहे थे ,रास्ते में तुम्हारे पैर पर एक कीट आकर गिर गया और तुमने अपने पैर को झटक दिया जिसके कारण वह कीट पास की एक झाड़ी में जाकर गिर गया और काँटों में फंस कर
तड़पते हुए उसके प्राण निकल गए ! शेष आप स्वयं ज्ञानी हैं पितामह  यदि इन दो वार्तालापों पर गौर करें तो स्पष्ट हो जाता है की मनुष्य के जीवन पर अपने पिछले जन्म के कर्मों के साथ - साथ अपने  पूर्वजों के कर्म को भी यथा संभव भोग करना पड़ता है I

साधारण जुबान  में हम इनका प्रयोग भी करते हैं,लेकिन इन पर कभी ध्यान नहीं दे पाते हैं I

उदहारण के तौर पर मारवाड़ी भाषा के बोलने वालों लोगों जबान से अक्सर ये बातें सुनी जा सकती है ....
*-*   देखो फलां व्यक्ति आज अपने बुजुर्गों के शुभ कर्मो का फल भोग रहा है, इसके माँ बाप बहुत सेवा पूजा करने वाले थे ,जिसके कारण ये आज

अपनी जिंदगी में इतना सफल हो रहा है I

*-*   खोटे किये हैं पिछले जनम में तो अब खोटे भुगत !

यहाँ तक चिंतन व मनन करें शेष अगले लेख में

आज का टिप :-शनि ग्रह ह्रदय मैं संतोष और दया का करक है I जब  शनि की साढ़े साती , ढैय्या या दशा चल रही हो तो ह्रदय में संतोष रखना चाहिए , होठों पर मिठास रखनी चाहिए ,दूसरों के प्रति मन में बुरे विचार नहीं रखने चाहिए और मौन रखने का प्रयास करना चाहिए
सभी से प्रेम से बात करनी चाहिए फिर देखिये  कैसे शनि  ग्रह आपको सबसे अच्छा  ग्रह लगने लगेगा !

शेष शुभम !
जय गणेश जय गणेश
जिस पर हो तेरी कृपा दृष्टि
उसके लिए इस ब्रह्माण्ड में
क्या बचा है शेष
जय गणेश जय जय गणेश