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Wednesday, March 7, 2018

ARIES - मेष

       BEHAVIOUR  -   स्वभाव   

      राशि चक्र की प्रथम राशि है जो मंगल की दाहक अग्नि से परिपूर्ण ,निडर और निर्भीक राशि है . इस राशि के जातकों को सामान्य भय से विचलित होता हुआ नहीं देखा जा सकता चाहे वे उम्र में छोटे ही क्यूं न हों . चर राशि होने के कारण और मंगल की असीमित उर्जा से भरे इन बालकों को आसानी से पहचाना जा सकता है कि ये है मेष का बालक जो चुपचाप नहीं बैठ पा रहा और यदि किसी कारण वश उसे एक जगह बैठना पड़ भी जाए तो  उनकी आँखें और मष्तिष्क में घुमड़ते सवाल हर नयी जगह का पूरी तरह निरीक्षण अवश्य करते हैं . मोहल्ले में जब कोई आयोजन हो तो बच्चों की फ़ौज में उनका नेतृत्व करने वाला , इस खम्भे से उस खम्भे तक दौड़ का आयोजन करने वाला नेता मेष के अलावा और कौन हो सकता है भला . डर का तो जैसे शब्द इनके शब्दकोष में होता ही नहीं है , यदि कोई इन्हें डांट रहा है तो उसे भी ये अहसास हो ही जाता है कि ये बच्चा डरता तो नहीं है बस सुन रहा है क्योंकि इसे पता है कि अभी ये कुछ कर नहीं सकता और अपनी भाव भंगिमाओं से इस बात का अहसास भी ये बालक करवा ही देते हैं ."बुखार थोड़ा ठीक होते ही गली में खेलने चला गया"- ये महाशय मेष के ही हैं , ऊर्जा रुकने नहीं देती इनको फिर बुखार की क्या औकात .
                         
                               ये व्यक्ति सदैव ही महत्वाकांक्षी होते हैं और इसे पूरा करने के लिए कर्म में कोई कमी नहीं रखते . निष्ठापूर्वक अपने कर्म में संलग्न रहते हैं . मेष लग्न के पीड़ित होने पर इनका विवेक काम नहीं करता और ये झगडालू प्रवृत्ति के हो जाते हैं तथा सदैव ही "आओ और हमसे लड़ो" की कोशिश में लगे रहते हैं या यूं कहें तो मंगल की ऊर्जा का दुरूपयोग होने लगता है और लोग इन्हें देखकर अपना रास्ता बदलना शुरू कर देते हैं कि कौन सर खपाए अपने पास तो इतनी ताक़त नहीं हैं . इनके लक्ष्य कभी भी छोटे नहीं होते और बड़े लक्ष्य की प्राप्ति का ये पुरजोर प्रयास भी करते हैं . इनके मन में सदैव सबसे आगे रहने की इच्छा बनी रहती है . किसी और के द्वारा दी गयी सलाह को नहीं मानते और यदि मानते भी हैं तो काफी सोचने के बाद जब और कोई रास्ता नहीं बचता तब .अपने मतानुसार कार्य करना ही पसंद  करते हैं , किसी और का टांग अड़ाना इन्हें पसंद नहीं होता है .

              जो वस्तु,स्थिति इन्हें पसंद नहीं होती ये उसके स्वयं बदलने का इंतज़ार नहीं करते बल्कि उसे तुरंत ही हटा देते हैं. धैर्य से बैठकर प्रतीक्षा करने की बजाय आगे बढ़कर अवसर को प्राप्त कर लेना ही उचित समझते हैं .कार्य को  जल्दी से जल्दी पूरा करने की मनोवृत्ति होती है जिसके कारण कई जगह इनको नुकसान भी होता है .
मेष राशि के पीड़ित होने पर इनके क्रोध को धधकने में देर नहीं लगती . अकस्मात् होने वाली घटनाओं से निपटने में मेष वाले सर्वाधिक् उपयुक्त होते हैं .

       एक कार्य को पूरा किये बिना दुसरे कार्य को शुरू कर लेना इनकी प्रवृत्ति होती है , जिसके पीछे इनका सभी कार्यों को एक साथ पूरा कर लेने का आत्मविश्वास छुपा होता है , जो कई बार नुकसानप्रद सिद्ध होता है .मेष राशि के पीड़ित होने पर हर मनोभाव अपने चरम पर पहुँच कर अपनी आगामी स्थिति को प्राप्त कर लेता है जैसे उत्साह उन्माद में परिवर्तित हो जाता है और साहस प्रमत्ता में. यदि किसी मनोभाव के लिए "प्रचंड" शब्द का प्रयोग किया जाए तो वह मेष के जातक ही होंगे . व्यक्ति के अन्दर का "मैं " भी मेष है , इनके अन्दर मैं का प्रबल भाव होता है . जल्दबाजी में कभी - कभार ये मूर्खतापूर्ण फैसले ले लिया करते हैं जिनके कारण इन्हें बाद में पछताना पड़ता है.

             बीमार नहीं रह सकते ये , इन्हें जल्दी से ठीक होना होता है. अन्दर छटपटाहट मची रहती हैं ठीक होने की , आंतरिक ऊर्जा एक जगह रुकने नहीं देती और रोगी को आराम करना होता है . ये स्थिति इन्हें शारीरिक से  अधिक मानसिक रूप से बेचैन कर देती है .

        काम , क्रोध और लड़ना ये गुण प्रधान होते हैं . यदि मेष राशि पीड़ित न हो तो इनका सकारात्मक परिणाम प्राप्त होता है जो गृहस्थ जीवन में पूर्णता , गलत के विरुद्ध क्रोध और संघर्ष को बताता है जबकि मेष राशि पीड़ित हो तो इन तीनों मनोभावों का विकृतीकरण हो जाता हैं काम के पूर्ण न होने पर क्रोध की उत्पत्ति तथा क्रोध से लड़ाई का ये सिलसिला अनवरत जारी रहता है जब तक कि मेष की ऊर्जा क्षीण नहीं हो जाती .



अगले लेख में मेष राशि के बारे में अन्य जानकारियों के साथ उपस्थित होता हूँ.
आपका -  ज्योतिष विद्यार्थी
               श्री राम बिस्सा

          

Saturday, February 24, 2018

RAHU - THE NODE POINT

राहु
एक ग्रह के कई कारकत्व होते हैं और प्रत्येक कारकत्व के आधार पर उसके अलग अलग प्रभाव भी होते हैं इसी के आधार पर आज राहु ग्रह की बात करते हैं -
-राहु अव्यवस्था का प्रतीक है या ऐसा भी कह सकते हैं कि किसी व्यवस्था में विघ्न उत्पन्न करना भी राहु का ही काम है.
-नाड़ी ज्योतिष के अनुसार गुफा (CAVE) पर भी राहु का आधिपत्य है या ऐसा कहें की गुफा के समान संरचना पर भी राहु का ही अधिकार है.
राहु की स्थिति यदि लग्न में हो फिर चाहे लग्न में कोई भी राशि स्थित हो ,तो ऐसा राहु दांतों में किसी न किसी प्रकार की अव्यवस्था उत्पन्न करता है , जैसे -
- दांत पर दांत चढ़ा होना .
- किसी दांत का आधा टूटा होना .
-दांतों पर लाल या काले रंग की परत का जमा होना .
- स्कर्वी रोग हो जाना .
- कीड़े पड़ने से दांतों का खोखला हो जाना इत्यादि .
कई बार ये स्थितियां जन्म से ही उपस्थित होती है जबकि कई बार ये प्रकृतिजन्य होती है , जैसे
-छोटी उम्र में गिरने पर दांत टूट जाना या दांत पर दांत का चढ़ जाना .
- चॉकलेट खाने से दांतों में कीड़े पड़ जाना .
- कई बार दांत की निरंतर सफाई न करने से भी दांतों पर कुछ दाग हमेशा के लिए जम जाते है तथा बदबू आती है .
जिन लोगों का अनुभव मैंने प्राप्त किया है उनमे से :- एक व्यक्ति जिसका मकर लग्न है तथा लग्न में शनि राहु स्थित है, के दांत की श्रृंखला टेढ़ी - मेढ़ी ( ZIG-ZAG ) है ,जिसके कारण पिछले दांतों की सफाई ठीक तरह से नहीं हो पाती और उन पर जमे हुए काले रंग की परत को आसानी से देखा जा सकता है .
दूसरी कुंडली में लग्न में केवल राहु ही स्थित है और जब मैंने पूछा कि दांतों में क्या रोग है तो बताया गया की स्कर्वी है .
अन्य अनुभवों के आधार पर कहा जा सकता है कि लग्न में स्थित राहु दन्तावली में किसी न किसी प्रकार की समस्या देता है .
अब यह समस्या किस लग्न के राहु में किस प्रकार की होगी तथा युति व दृष्टि से किस प्रकार प्रभावित होगी यह निरंतर अनुभव व शोध का विषय है .
ऐसा नहीं है कि लग्न के राहु का यही एक फल है ,अन्य फल भी होते हैं ,उनमें से यह भी एक है .


अन्य ज्योतिर्विदों के अनुभवों की अपेक्षा में आपका
श्रीराम

Saturday, August 22, 2015

कर्म और भाग्य - ३

         समझ और नासमझी का अंतर समझें या समझ समझ कर नासमझी की जिद -
                        एक प्रश्न जो हमेशा से ज्योतिष का ज्ञान रखने वाले लोगों के लिए भी उतना ही महत्वपूर्ण और पेचीदा रहा है , जितना कि सामान्य जन मानस के लिए . और वह प्रश्न है कि जीवन में कर्म अधिक महत्वपूर्ण है या भाग्य ...............
   
                 
                                     एक बार इसी ब्लॉग पर यह क्रम शुरू किया था पर किन्हीं कारणों से पूरा नहीं लिख पाया था देखें -कर्म और भाग्य - १ तथा कर्म और भाग्य - २   इन लेखों में रामचरितमानस महाभारत और रामायण के उदाहरणों से इस विषय को समझना शुरू किया था पर पूर्ण नहीं कर पाए थे . अब इस विषय पर एक और प्रयास कर रहा हूँ और इसी क्रम सबसे पहले सामान्यजन और ज्योतिष ज्ञानार्जन करने वालों से आग्रह है की वे अपने विचारों से अवगत कराएं ताकि सभी को इस विषय में भागीदारी करने का मौका मिले .............

Wednesday, October 5, 2011

नक्षत्र:भरणी


नक्षत्र:भरणी

                                                                  2.भरणी
भरणी नक्षत्र का वैदिक नाम अपभरणी है!
भरणी नक्षत्र में तीन तारे होते हैं,जो स्त्री योनि के आकार में आकाश में अवस्थित होते हैं!इस नक्षत्र का स्वामित्व यम देवता के पास होता है!नौ ग्रहों में से शुक्र भरणी नक्षत्र का अधिपति है!यह उग्रसंज्ञक नक्षत्र है अतः उग्र कार्य जैसे तंत्र प्रयोग,मुक़दमा करना,शत्रुपर आक्रमण,चालाकी के कार्य इसमें अनुकूल होते हैं!अधोमुख नक्षत्र होने के कारण अधोगमन वाले कार्य जैसे कुआं खोदना,UNDERGROUND बनाना,बोरिंग कराना,सुरंग बनाना इत्यादि नीचे की ओर गतिशील कार्य किये जा सकते हैं!भाद्रपद मास में भरणी नक्षत्र वाले दिन कोई भी कार्य नहीं करना चाहिए क्योंकि यह प्रभावशून्य होता है!भरणी नक्षत्र अमृतसिद्धि और सर्वार्थसिद्धि योग का निर्माण नहीं करता है!भरणी नक्षत्र के लिए केले व आंवले की पूजा की जानी चाहिए!भरणी चांडाल जाति का नक्षत्र है!भरणी नक्षत्र स्त्री संज्ञक और वशिष्ठ गोत्र का होता है!इस नक्षत्र की योनि गज,नाड़ी मध्य और गण मनुष्य होता है!यह कालपुरुष के माथे(ललाट) का अधिपति होता है!प्रमष्तिष्क गोलार्ध और आँखों पर इस नक्षत्र का ही आधिपत्य है!
कारकत्व:-रक्त व मांस से सम्बंधित लोग जैसे कि रक्त का परीक्षण करने वाले मांस का व्यापार करने वाले,हिंसक प्राणी,कसाई,आतंकवादी,भूसे वाले सभी अनाज,नीच स्वभाव और नीच कुल के लोग,तांत्रिक और मृत शरीरों पर तंत्र साधना करने वाले तांत्रिक,जहर,शस्त्र,अस्त्र,कोर्ट व युद्ध भी इसी नक्षत्र से सम्बंधित है!
नक्षत्रफल:-दृढ़ निश्चय वाले सत्यवादी और सुखी,जिस काम को करने की सोच ले उसे करके ही छोड़ते हैं!TIME MANAGEMENT बहुत अच्छा होता है!खाना कम खाते हैं!व्यक्तित्व आकर्षक होता है!मनोविनोद में इनका मन अधिक लगता है!शराब और स्त्री दोनों का पूर्ण लाभ लेना चाहते हैं!
पदार्थ:-भूसी वाले अनाज,ज्वारबाजरा,रंग,जहर व जहरीले पदार्थ,विभिन्न रसायन इत्यादि !
व्यक्ति:-BLOOD BANK के कर्मचारी,स्वार्थी लोग,अत्यधिक धूम्रपान करने वाले,शराब के शौक़ीन,रसिक मिजाज वाले,साधारणतया रोगों से मुक्त रहने वाला!
भरणी नक्षत्र का वैदिक मंत्र:-यमाय त्वान्गिरस्यते पित्रीमते स्वाहा स्वाहा धर्माय स्वाहा धर्मपित्रे!
बीमारियाँ:-सिर में चोट,आँखों के पास चोट,नशे की लत,कफ रोग इत्यादि!
मानसिक गुण:-खाने का शौक़ीन,क्रूर व्यक्तित्व,अपने से निचले तबके के लोगों के साथ रहने वाला अपने लक्ष्य को सदैव प्राप्त करता है!चतुर व्यक्तित्व का मालिक!इनके जीवन में प्रेम सर्वाधिक महत्वपूर्ण होता है और दिमाग की बजाय दिल से अधिक सोचते है!इनके व्यक्तित्व में सदैव एक कवि  रहता है!
व्यवसाय:-संगीत,खेल-कूद,प्रचारक,चांदी के बर्तनों का काम,शादी करवाने वाले मध्यस्थ,कसाईखाना,होटल,रतिरोग,MATERNITY HOSPITAL,संपत्ति का मूल्यांकन करने वाला!

Thursday, September 15, 2011


ग्रह:सूर्य

                                                                  1.सूर्य

                                             "सूर्य आत्मा जगत्स्तथुषश्च"
 सूर्य ग्रहों में राजा है!इसकी जाति राजक्षत्रिय है!इसका रंग रक्त के समान है!सूर्य के देवता अग्नि है!इसके अधिपति शिव है!सूर्य की दिशा पूर्व दिशा है!यह नैसर्गिक पाप ग्रह ना होकर नैसर्गिक क्रूर ग्रह है!
वैज्ञानिक दृष्टिकोण:-सूर्य वास्तव में एक तारा है,जो हमारे सौरमंडल को बाँधे रखने का कार्य करता है!सूर्य ही सौरमंडल का केंद्र बिंदु है,जिसके चारों ओर ग्रह और उपग्रह घूर्णन करते हैं!इसका कारण है,कि सूर्य से ही सभी पिंडों को जीवनी शक्ति प्राप्त होती है!सूर्य के बिना हमारे सौरमंडल और जीवन की कल्पना भी नहीं की जा सकती!यह पृथ्वी के सबसे नजदीक का तारा है!इसीलिये अन्य तारों की अपेक्षा अधिक चमकदार और बड़ा प्रतीत होता है!सूर्य पर हाइड्रोजन गैस का भण्डार है,जिसकी आपस में संयोजित होने की क्रिया से जो असीमित ऊर्जा विसर्जित होती है उसके अंश मात्र से पृथ्वी पर जीवन है,सभी ग्रहों का वातावरण है!
पौराणिक विवेचन:-पुराणों में आलेख मिलते हैं,कि दक्ष प्रजापति की दो कन्याओं दिति और अदिति का विवाह कश्यप मुनि के साथ हुआ था!अदिति के गर्भ से सूर्य का जन्म हुआ इसीलिये इसे आदित्य कहा जाता है!पौराणिक मान्यताओं के अनुसार सूर्य के रथ में सात घोड़े जुते होते हैं!सूर्य ने संज्ञा और छाया से विवाह किया!छाया से शनि नामक पुत्र उत्पन्न हुआ जो पिता के समान बलशाली है!
पर्यायवाची:-सूर्य को अंग्रेजी में SUN,अरबी मैं आफताब,फारसी में खुरशेद कहते हैं!हिन्दी में इसे आदित्य,अर्क,अर्यमा,अंशुमाली,ग्रहपति,दिनकर,दिवाकर,प्रभाकर,भानु,मार्तंड,रवि,सविता,भास्कर,मिहिर,दिनेश इत्यादि नामों से जाना जाता है!
वैदिक मंत्र:-  आकृष्णेन रजसा वर्त्तमानो निवेशयन्नमृतं मर्त्यन्च !
                      हिरण्ययेन सविता रथेना देवो याति भुवनानि पश्यन !!
तांत्रिक मंत्र:-  ह्राँ ह्रीं ह्रौं सः सूर्याय नमः !!
स्वामित्व:-रवि सौरमंडल की आत्मा है,इसके बिना सौरमंडल का अस्तित्व संभव नहीं है!अर्थात जीवन के लिए जितनी भी आवश्यक वस्तुएं हैं उन सब पर सूर्य का ही अधिकार है!हो सकता है पढ़कर ऐसा प्रतीत हो,कि जीवन के लिए तो वायु,भोजन और जल तीनों ही आवश्यक है,फिर इन सब पर सूर्य का अधिकार कैसे है!सूर्य के कारण ही पृथ्वी के पास वह शक्ति है,कि वायु और जल पृथ्वी की सतह पर उपलब्ध है और हमें भोजन प्रदान करने वाला वनस्पति जगत भी अस्तित्वमान है!रवि की ऊष्मा शरीर को जलाने वाली नहीं बल्कि शरीर के जीवित रहने के लिए जरूरी होती है!अतः आत्मा पर सूर्य का स्वामित्व है!आत्मा लौ के रूप में ऊर्ध्वगामी होकर ह्रदय में अवस्थित होती है अतः ह्रदय पर भी इसी ग्रह का अधिकार है!ह्रदय से जुड़े विभिन्न प्रकार के भाव जैसे क्षमाशीलता,अनुशासन भी सूर्य के ही अधिकार में है!
शारीरिक लक्षण एवं रचना:-इनकी आँखों का रंग धुप के जैसा होता है!अब बात आती है,कि धूप का रंग कैसा है तो गौर से देखने पर पता चलेगा कि धूप का रंग शहद के समान हल्का भूरा होता है!इनके शरीर में भी एक शहद जैसे रंग की एक परत चढी महसूस होती है!इनका चेहरा गोल होता है!यह हृदय का कारक है!पुरुषों में दांयी और स्त्रियों में बाँई आँख पर इसका स्वामित्व होता है!पेट में पाई जाने वाली जठराग्नि पर भी सूर्य का अधिकार है!
चरित्र में निहित विशेषताएं:-निःस्वार्थ प्रेम सूर्य की सबसे बड़ी विशेषता है!यह बिना भेदभाव के सबके लिए समान व्यवहार रखता है!इसकी दूसरी विशेषता है नियमित होना जिस प्रकार सूर्य नियमित होता है उसी प्रकार सूर्य के प्रभाव क्षेत्र में आने वाला व्यक्ति भी नियमित होता है!ईश्वर के प्रति सच्चा प्रेम होता है!ये ताकतवर किन्तु न्यायप्रिय होते हैं!इच्छाशक्ति बहुत ही प्रबल होती है!ये कभी थकते नहीं हैं!इनके व्यक्तित्व में एक विशेष आकर्षण होता है!दूसरों पर शासन करने की कला और ऊर्जा होती है!ईमानदारी इनकी चारित्रिक विशेषता में चार चाँद लगा देती है!
बीमारियाँ:-दिल से सम्बंधित बीमारियाँ,गर्मी के कारण होने वाले रोग,ज्वर,दृष्टि-दोष,रीढ़ सम्बन्धित रोग,पाचन से सम्बंधित समस्याएं,आत्म शक्ति की कमी!ब्लड-प्रेशर भी रवि के आधिपत्य में है क्योंकि रक्त का प्रवाह धीरे होगा या तेज यह हृदय के आकुंचन पर निर्भर करता है और हृदय पर सूर्य का अधिकार है!सूर्य के पीड़ित होने पर मुंह से थूक आता रहता है!
व्यवसाय:-राजकीय सेवा,ऊर्जा उत्पादन,दवाइयों से जुड़े व्यवसाय,धन,अनाज के कारोबार,प्रकाश देने वाली चीजें जैसे बल्ब,ट्यूब लाईट के कारोबार,डॉक्टर इत्यादि!सोने का कारोबार!सूर्य स्थिरता का कारक है यह जीवन में स्थायित्व को निर्देशित करता है!पिता द्वारा प्रदत्त स्वयं का काम!
स्टॉक मार्केट:-POWER SECTOR,NUCLEAR ENERGY,GOVT. PUBLIC SECTOR UNITS,MEDIA.
COMMODITY MARKET:-सोना,ताम्बा,कांसा,GUN METAL,माणक,गेंहू,पटाखे,ग्रेफाईट और सल्फर!
राजनीतिक दृष्टिकोण:-प्रशासकों को निर्देशित करता है!राजा,तानाशाह,बड़े शाही नेता,विभागों के अध्यक्ष,वे लोग जिनके पास शक्ति व अधिकार है!ये एक होता है,जो सभी को नियंत्रित करता है यदि इस लिहाज से देखा जाये तो सूर्य के सभी गुण राजशाही में राजा के अंदर देखने को मिलेंगे लोकतंत्र में नहीं क्योंकि लोकतंत्र में तो शासक जनता होती है शक्ति का मुख्य पुंज नागरिक होते है और नेता तो केवल कार्यवाहक होते है या यूं कहें तो नौकर होते है इसलिए मुझे ऐसा लगता है,कि विभागाध्यक्ष तो फिर भी सूर्य के प्रभाव में हो सकते हैं पर नेता तो सेवक हैं मालिक नहीं हाँ ये बात और हैकि ये लोग आगे जाकर स्वयं को लोकतंत्र का उत्तराधिकारी समझने लगें!
पदार्थ:-अखरोट,नारियल,इलाइची,केसर,अजवायन,चावल,मिर्ची,बादाम,मूंगफली,पाइन,विदेशी मुद्रा,दवाएं,
बाजार और संस्थान:-रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया,स्टॉक एक्सचेंज,सरकारी दफ्तर,सोना और इसकी कीमतों में उतार चढ़ाव,सरकारी ऋण इत्यादि!
पेड़-पौधे:-कांटेदार पेड़,बादाम,संतरे,केसर,शीशम,गुलाब और केदार के पेड़ व पौधे!इनके अलावा चिकित्सकीय प्रयोग में आने वाले पादप!
स्थान:-जंगल,शिव मंदिर,सरकारी ऑफिस,पंचायत समिति,ऊर्जा विद्युत केंद्र,विद्युत निर्माण केंद्र,दवाई की दूकान इत्यादि!
अंक:-"एक" पर निर्विवाद रूप से सूर्य का अधिकार है!
दिन,राशि और नक्षत्र:-रविवार का मालिक सूर्य है!राशियों में सिंह राशि का स्वामित्व सूर्य के पास है!सत्ताईस नक्षत्रों में से कृतिका,उत्तराफाल्गुनी और उत्तराषाढा नक्षत्रों का मालिक भी सूर्य है!
रत्न:-माणक सूर्य का प्रमुख रत्न है!इसे सोने में मढवाकर पहना जा सकता है!यह रोगप्रतिरोधक क्षमता को बढाने के साथ-साथ सरकारी साख भी बढाता है!
जीव-जंतु:-शेर,घोडा,मवेशी और जंगल में रहने वाले अन्य जंगली जानवर!
       सूर्य ग्रीष्म ऋतु का मालिक होता है!यह एक माह तक एक राशि में रहता है और इसकी एक दिन की गति लगभग एक अंश होती है!सौरमंडल में सूर्य के गति को अयनांश कहा जाता है!घर में सूर्य का स्थान पूजन-कक्ष होता है!सूर्य प्रभावित व्यक्तियों के घर का दरवाजा पूर्व दिशा मैं होता है!सूर्य चालित व्यक्ति के दांये नितंब पर निशान बना होता है!

Friday, August 19, 2011

ग्रहों की युति


  बात कुछ दिनों पहले की है,मेरे एक दोस्त मनीष जी गंगानगर से मुझसे मिलने बीकानेर आये हुए थे. बातों के दौरान ज्योतिष विषय पर चर्चा शुरू हुई. इसी क्रम में उन्होंने मुझसे पूछा,कि ग्रहों की युति को आप किस तरह से परिभाषित करेंगे. उसके बाद हमारी कुछ बातें इस विषय पर हुई,शायद ज्योतिष जिज्ञासुओं के लिए काम की हो इसलिए संवाद रूप में यहाँ लिख रहा हूँ.

मनीष जी:- ग्रहों की युति अपना प्रभाव किन-किन तरीकों से देती है?यदि दो ग्रह हों तो और यदि तीसरा ग्रह भी उनमें सम्मिलित हो तो उसका क्या प्रभाव पड़ता है,क्या वह पूरी तरह से युति के प्रभाव को बदल देता है या फिर कुछ और?सबसे महत्वपूर्ण बात हम फलादेश करते समय इन युतिओं को किस तरह काम में ले सकते हैं?
ज्योतिष विद्यार्थी:-सबसे पहले तो मोटी बात करते हैं ग्रहों के मैत्री आधारित युति संबंधों पर.ये सम्बन्ध मुख्यतया तीन तरह के होते हैं!
1.जब दो मित्र ग्रह युति में हों.
2.जब दो सम ग्रह युति में हों.
3.जब दो शत्रु ग्रह युति में हों.
              अब साधारण सी बात है,कि जब दो मित्र साथ-साथ होंगे तो कुछ न कुछ सार्थक होगा जैसे यदि वह किसी विषय पर चर्चा कर रहे हैं या अगर कहीं घूमने गए हैं,तो माहौल शांतिमय और माधुर्यपूर्ण होता है.अगर दो अजनबी जो एक दुसरे के पास-पास बैठे हैं,तो उनमें आपस में जान-पहचान होगी कुछ बातचीत होगी और साधारण शांतिमय माहौल होगा.अंत में बात करते हैं शत्रु ग्रहों की,अगर दो शत्रु ग्रह एक साथ हो तो वो उस स्थान को अशांतिमय कर देंगे और विध्वंसकारी प्रवृत्तियों को वहाँ केंद्रित करेंगे.
        अलग दृष्टिकोण से देखने पर मान लें की एक कमरा एक राशि है,यदि एक ग्रह उस राशि के एक किनारे पर बैठा है और दूसरा दुसरे किनारे पर तो युति प्रतीत होते हुए भी उनकी युति का फल प्राप्त नहीं होता है.अब क्या दो लोग एक कमरे के दो अलग-अलग छोर पर बैठकर बातचीत कर सकते हैं क्या?नहीं लेकिन हाँ एक कमरे के अंतिम छोर पर बैठा व्यक्ति अगले कमरे के शुरुआती छोर पर बैठे व्यक्ति से आराम से बातचीत कर सकता है.वास्तव में कई बार जन्मकुंडली में ऐसा ही देखने को मिलता है,कि एक भाव में स्थित दो ग्रहों में तो युति का फल नहीं मिलता जबकि दो अलग भावों में बैठे ग्रहों की युति का फल प्राप्त होता है.एक बात और जैसे मान लें कि एक दोस्त सड़क पर चला जा रहा है और पीछे से उसका एक दोस्त आ रहा है,तो वह उस आगे वाले दोस्त को आवाज देकर रोकता है,उससे बात करता है फिर दोनों चल पड़ते हैं. अर्थात ग्रहों की युति जब बनने वाली होती है तो वह अधिक ताकतवर होती है और जब छूट रही होती है तो कमजोर होती जाती है.ये तो बात हुई दोस्ती और दुश्मनी की लेकिन जब उन्होंने पूछा की इन युति के प्रभाव को जन्मपत्रिका में किस प्रकार देखेंगे तो कुछ देर सोचने के बाद मैंने उन्हें समझाने के लिए एक सारणी बनाई उसे यहाँ पेश कर रहा हूँ.मैंने इस सारणी में चंद्र को प्रधान ग्रह के रूप में लिया है और अन्य ग्रहों का इसके साथ युति सम्बन्ध किस तरह होगा इस पर चर्चा करने का प्रयास किया है,आशा है कि आप सब को भी पसंद आएगा.
                                                       -:चंद्र:-(विचार)
शनि(दु:ख,विषाद,कमी,निराशा)               :- मन में दु:ख,नकारात्मक सोच.
मंगल(साहस,धैर्य,तेज,क्षणिक क्रोध)        :-  विचारों में ओज,क्रांतिकारी विचार. 
बुध(वाणी,चातुर्य.हास्य)                           :- हास्य-व्यंग्य पूर्ण विचार,नए विचार.
गुरु(ज्ञान,गंभीरता,न्याय,सत्य)            :- न्याय,सत्य और ज्ञान की कसौटी पर कसे हुए गंभीर विचार.
शुक्र(स्त्री,माया,संसाधन,मिठास,सौंदर्य)     :- माया में जकड़े विचार,सुंदरता से जुड़े विचार.
सूर्य(आत्म-तेज,आदर)                            :- आदर के विचार,स्वाभिमान का विचार.
राहू(मतिभ्रम,लालच)                               :- विचारों का द्वंद्व,सही-गलत के बीच झूलते विचार.
केतु(कटाक्ष,झूठ,अफवाह)                        :- झूठ,अफवाह और सही बातों को काटने का विचार.
               यहाँ जैसे मैंने चन्द्रमा के केवल एक कारक को लेते हुए दुसरे ग्रहों के वे कारकत्व जो चंद्र से मिल सकते हैं,मिलाया है और युति का फल बतलाने का प्रयत्न किया है अब इन्हीं का फल अलग तरह से भी पता लग सकता है,जैसे ऊपर की सारणी की ही बात करें तो चंद्र माता का भी स्वामित्व रखता है,अब चंद्र रूपी माता का शनि के किस कारक से संयोग होगा यह विचार कर प्रभाव ज्ञात कर सकते हैं!यहाँ मैंने मूल तरीका बताने की कोशिश की है,कैसा लगा.यदि किसी सुधार की गुंजाइश हो तो अवश्य सूचित करें. 





Saturday, August 13, 2011

शिव का तीसरा नेत्र :- एक रहस्य


जब कभी भी अध्यात्मिक चर्चाओं का दौर चल पड़ता है और उसी प्रवाह में भोलेनाथ अर्थात शिव के बारे में बात होने लगे तो एक तस्वीर मानस-पटल पर साफ़ रहती है,कि,शिव बड़े ही भोले देवता हैं,लेकिन क्रोधित होने पर वे तांडव करने लगते हैं,नृत्य के चरम पर उनके ललाट पर स्थित उनका तीसरा नेत्र खुलता है और सबकुछ भस्म!अब बात करें तीसरे नेत्र की तो क्या वास्तव में शिव के ललाट पर दो नेत्रों के समान तीसरा नेत्र होता है!अगर होता भी है तो उसमें ऐसा क्या है,कि वह केवल क्रोध आने पर ही खुलता है सामान्य अवस्था में बंद रहता है!                                                                                                          मैंने इस बारे में कुछ अलग विचार करना प्रारंभ किया और सोचते-सोचते आज दस पंक्तियों का विचार पककर तैयार हुआ सो आपके समक्ष पेश कर रहा हूँ!ये मेरा व्यक्तिगत विचार है,ऐसा ही होता हो आवश्यक नहीं!आशा है पाठकगण इसमें आवश्यकता होने पर सुधार का प्रयास करेंगे!    यदि आदिकाल से शुरू करें तो सृष्टि के आरम्भ में केवल पुरुषों की उत्पत्ति ब्रह्मा ने की!ब्रह्मा जब स्त्री की उत्पत्ति नहीं कर पाए तो उन्होंने शिव से प्रार्थना की तो शिव  ने आदिशक्ति माया(योगमाया) को स्त्री के रूप में उत्पन्न कर अपने शरीर से अलग किया और इसी माया ने स्त्री जाति का निर्माण किया!अतः स्त्री वास्तव में माया का ही प्रतिबिम्ब है!यह माया सदैव पुरुषों के ललाट पर ही निवास करती है,जैसे ही पुरुष के शरीर,नेत्र या मानसिक विचारों का संसर्ग स्त्री स्वरुप के साथ होता है,तो उसकी छवि सर्वप्रथम मनुष्य के ललाट पर जाकर स्थित हो जाती है!ललाट पर ही मनुष्य का ज्ञान -चक्षु स्थित होता है और यह छवि ललाट पर जाकर मनुष्य के ज्ञान-चक्षुओं पर पर्दा डाल देती है,जिसके कारण उसके दिमाग कुछ भी सोचने-विचार करने का सामर्थ्य समाप्त हो जाता है,कि वह जो कर रहा है वह सही है या गलत!उस समय केवल अंतरात्मा ही ये सन्देश देती है,कि तू जो कर रहा है वह गलत है लेकिन मष्तिष्क इस बात को मानने के लिए तैयार नहीं होता,क्योंकि वह तो माया की चपेट में होता है!अतः विचार किया जा सकता है,कि ललाट पर स्थित चक्षु कोई सामान्य नहीं बल्कि ज्ञान का बोध करवाने वाला नेत्र होता है!चूंकि साधारण मनुष्य माया के आवरण से पूर्णतया लिप्त रहता है अतः उसके ललाट पर इसका कोई अंश भी दृष्टिगोचर नहीं होता है!अब जब माया साधारण मनुष्य पर अपना त्रिगुणात्मक फंदा डालती है,तो वह पूर्णतया उसकी चपेट में आ जाता है पर जब यही प्रभाव कोई शिव पर करने का प्रयत्न करे तो वह ज्ञान रूपी अग्नि से जलकर भस्म हो जाता है!जिस प्रकार कामदेव हो गया था,जिसने शिव की माया का प्रयोग उन्हीं पर करने का प्रयत्न किया!शिव का तीसरा नेत्र शरीर मैं आज्ञा चक्र के केंद्र में स्थित है जहां विवेक बुद्धि का निवास होता है!देखा जाए तो शिव का तीसरा नेत्र ज्ञान पुंज है,जो अज्ञान रूपी अंधकार को जलाकर भस्म कर देता है!"साधारण रूप में देखें तो शिव ईश्वर हैं और बुरे लोगों को अपने तीसरे नेत्र की अग्नि से जलाकर भस्म कर देते है और यदि अलग तरह से देखने का प्रयत्न करें तो शिव का तीसरा नेत्र ज्ञान पुंज है जो अज्ञान का नाश करता है!"तो चलो तीसरा नेत्र हम भी प्राप्त करें!

Monday, June 13, 2011

कर्म और भाग्य -३


                            कर्मों की व्याख्या :-के.एस.कृष्णमूर्ति
 कृष्णमूर्ति पद्धति के बारे में बात करने से पहले मैं बात करना चाहूँगा कर्म के सिद्धांत के बारे में जिसका उल्लेख प्रो. के. एस. कृष्णमूर्ति जे ने अपनी पुस्तक "FUNDAMENTAL PRINCIPLES OF ASTROLOGY" में किया है!क्योंकि चाहे जीवन हो ज्योतिष ये सब कर्म ही तो हैं जो इनका निर्धारण करते हैं !जीवन और ज्योतिष में कर्मों के सम्बन्ध और महत्त्व को समझने लिए ही कर्मों के सिद्धांत को पहले समझना आवश्यक सा देख पड़ता है !कृष्णमूर्ति जी ने अपनी पुस्तक में में कर्मों की तीन श्रेणियों का जिक्र किया है ! 
1. अदृढ़ कर्म       2. दृढ़ कर्म          3. दृढ़ अदृढ़ कर्म 
1. दृढ़ कर्म:- कर्म की इस श्रेणी में उन कर्मों को रखा गया है जिनको प्रकृति  के नियमानुसार माफ नहीं किया जा सकता !जैसे क़त्ल,गरीबों को उनकी मजदूरी न देना,बूढ़े माँ - बाप को खाना न देना ये सब कुछ ऐसे कर्म हैं जिनको माफ नहीं किया जा सकता ! ऐसा व्यक्ति अपने जीवन में चाहे कितने ही शांति के उपाय करे लेकिन उसका कोई भी प्रत्युत्तर उन्हें देख नहीं पड़ता है ,चाहे ऐसे व्यक्ति इस जीवन में कितने ही सात्विक जीवन को जीने वाले  हों लेकिन उनको जीवन कष्टमय ही गुजरना पड़ता है वे अपने जीवन के दुखों को दूर करने के लिए विभिन्न ज्योतिषीय उपाय करते देखे जाते हैं लेकिन अंत में हारकर उन्हें यही कहने के लिए मजबूर होना पड़ता है,कि ज्योतिष और उपाय सब कुछ निरर्थक है ,लेकिन ये बात तो एक सच्चा ज्योतिषी जनता है कि क्यों यह व्यक्ति कष्ट माय जीवन व्यतीत करने बाध्य है !
2.दृढ़ अदृढ़ कर्म:-कर्म की इस श्रेणी में जो कर्म आते है उनकी शांति उपायों के द्वारा की जा सकती है अर्थात ये माफ किये जाने योग्य कर्म होते हैं !जैसे कोई  व्यक्ति कोलकाता जाने लिए टिकट लेता है परन्तु भूलवश मुम्बई जाने वाली ट्रेन में बैठ जाता है !ऐसी स्थिति में टिकट चेक करने वाला कर्मचारी पेनल्टी के पश्चात उस व्यक्ति को सही ट्रेन में जाने की अनुमति दे देता है !ऐसे वैसे व्यक्ति सदैव ज्योतिष और इसके उपायों की तरफदारी करते नजर आते हैं !
3. अदृढ़ कर्म:-(नगण्य अपराध) ये वे कर्म होते हैं जो एक बुरे विचार के रूप में शुरू होते हैं और कार्य रूप में परिणत होने से पूर्व ही विचार के रूप में स्वतः खत्म हो जाते हैं ! जैसे एक लड़का आम के बाग को देखता है और उसका मन होता है ,कि बाग से आम तोड़कर ले आये लेकिन तभी उसकी नजर रखवाली कर रहे माली पर पड़ती है और वह चुपचाप आगे निकल जाता है !यहाँ बुरे विचारों का वैचारिक अंत हो जाता है अतः ये नगण्य अपराध की श्रेणी में आते हैं और थोड़े बहुत साधारण शांति - कर्मों के द्वारा इनकी शांति हो जाती है ! ऐसे व्यक्ति ज्योतिष के विरोध में तो नहीं दिखते लेकिन ज्यादा पक्षधर भी नहीं होते !
           ज्योतिष का एक जिज्ञासु विद्यार्थी होने के नाते कहना चाहूँगा कि सभी को अपनी दिनचर्या में साधारण पूजन कार्य और मंदिर जाने को अवश्य शामिल करना चाहिए क्योंकि ये आदत पता नहीं कितने ही  अदृढ़ कर्मों से जाने - अनजाने में छुटकारा दिला देती है !कर्म और भाग्य के विषय में इसी श्रृंखला के आगामी लेख में कर्म और भाग्य के रहस्य का पूर्ण सत्य विवरण प्रस्तुत करने का प्रयत्न करूँगा !
!जय गणेश!
!!जय गणेश!!