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Saturday, August 22, 2015

कर्म और भाग्य - ३

         समझ और नासमझी का अंतर समझें या समझ समझ कर नासमझी की जिद -
                        एक प्रश्न जो हमेशा से ज्योतिष का ज्ञान रखने वाले लोगों के लिए भी उतना ही महत्वपूर्ण और पेचीदा रहा है , जितना कि सामान्य जन मानस के लिए . और वह प्रश्न है कि जीवन में कर्म अधिक महत्वपूर्ण है या भाग्य ...............
   
                 
                                     एक बार इसी ब्लॉग पर यह क्रम शुरू किया था पर किन्हीं कारणों से पूरा नहीं लिख पाया था देखें -कर्म और भाग्य - १ तथा कर्म और भाग्य - २   इन लेखों में रामचरितमानस महाभारत और रामायण के उदाहरणों से इस विषय को समझना शुरू किया था पर पूर्ण नहीं कर पाए थे . अब इस विषय पर एक और प्रयास कर रहा हूँ और इसी क्रम सबसे पहले सामान्यजन और ज्योतिष ज्ञानार्जन करने वालों से आग्रह है की वे अपने विचारों से अवगत कराएं ताकि सभी को इस विषय में भागीदारी करने का मौका मिले .............

Saturday, September 17, 2011

नक्षत्र


नक्षत्र : अश्विनी

: नक्षत्र :

एक स्थान से दुसरे स्थान पर पृथ्वी के अयन चलने के कारण खिसकते प्रतीत होने वाले तारामंडलों का नाम नक्षत्र है!तैत्तिरीय संहिता में कहा गया है सृष्टि सर्वत्र जल में रहने पर सृष्टि की शुरुआत में जो तर गए वे तारे हैं!
                                                                           1. अश्विनी 
अश्विनी नक्षत्र का वैदिक नाम अश्वयुज है!अश्विनी नक्षत्र में कुल तीन तारे होते हैं,जो आपस में मिलकर घोड़े के मुख जैसी आकृति का निर्माण करते हैं!
अश्विनी नक्षत्र का मालिक अश्विनी कुमार है,और ग्रहों में इस नक्षत्र का मालिक है केतु !यह क्षिप्र नक्षत्र है,अतः इसमें खरीद-बेच,यात्रारम्भ,विद्यारंभ किया जा सकता है!तिर्यक मुख नक्षत्र होने के कारण जलयात्रा,विमान यात्रा,मशीनरी चालू करना आदि कार्य किये जा सकते हैं!चैत्र मास में अश्विनी नक्षत्र को कोई भी शुभ कार्य नहीं करना चाहिए क्योंकि इसका प्रभाव शून्य होता है!मंगलवार को अश्विनी नक्षत्र होने पर अमृतसिद्धि और रविवार को अश्विनी नक्षत्र होने पर सर्वार्थसिद्धि नक्षत्र का योग करता है!रविवार को अश्विनी नक्षत्र आनंद योग का निर्माण करता है!अपवादस्वरूप अमृतसिद्धि योग यदि सप्तमी तिथी को पड़े तो विष का निर्माण करता है,अर्थात त्याज्य है!अश्विनी नक्षत्र गंडांत संज्ञक होता है इसकी शुरुआत की दो घड़ी अर्थात 48 मिनट गंडांत होते हैं!परन्तु रविवार को अश्विनी नक्षत्र में जन्म होने पर गंडांत का दोष काफी हद तक कम हो जाता है!अश्विनी नक्षत्र के लिए केले,आक व धतूरे के वृक्ष की पूजा करनी चाहिए!अश्विनी नक्षत्र पुरुष संज्ञक और मरीचि गोत्र का होता है!पञ्च तत्वों में इसका तत्व पृथ्वी है!यह नक्षत्र-पुरुष के सर का अधिष्ठाता होता है!इस नक्षत्र की योनी अश्व,नाड़ी आद्या और गण देव होता है!
कारकत्व:-घोड़ों से सम्बंधित लोग,आधुनिक काल के हिसाब से वाहनों से सम्बंधित लोग!सेनापति,शरीर की चिकित्सा करने वाले चिकित्सक!अधीनस्थता में काम करने वाले लोग!रूपाजीवी अर्थात सुंदरता से धन कमाने वाले लोग!कृषि कर्म करने वाले !

नक्षत्रफल:-सुरूप चमकयुक्त बड़ी आँखें!आकर्षक उभारयुक्त ललाट,कार्यदक्ष,बुद्धिमान,अच्छी नीरोग शक्ति वाला,बातों से प्रभावित करने वाला होता है!दृढ़ निश्चय या यूं कहें की अड़ियलपन इनकी खास पहचान होती है!
पदार्थ:-चावल,घी,अनाज,कपडा,घास,चारा,जड़ी-बूटियाँ,केमिकल आदि!
व्यक्ति:-घोड़ों के व्यापारी,प्रशिक्षक,घुडदौड कराने वाले,वाहन उद्योग से सम्बंधित लोग,चिकित्सक,कर्मचारी वर्ग,विज्ञापन की दुनिया से जुड़े लोग!
अश्विनी नक्षत्र का वैदिक मंत्र:- "अश्विना तेजसाचक्षु: प्रIणेन सरस्वतीवीर्यम् ! वाचेंद्रो बलेनेंद्रा यदद्युरिन्द्रयम्"
बीमारियाँ:-सर में चोट,दुर्बलता,मिर्गी,सर के आधे भाग में दर्द,मूर्छा,असाधारण नींद,पक्षाघात,मलेरिया,छोटी चेचक!
मानसिक गुण:-भाईयों से मतभेद,विवेक शून्य,हनुमान जी की पूजा,लोभी,भूमि के लिए चिंतित!
व्यवसाय:-पुलिस,सेना,चिकित्सा,रेलवे,मशीनरी,लोहा,घुडसवार,जेल,अदालत,कारखाना!

Thursday, September 15, 2011


ग्रह:सूर्य

                                                                  1.सूर्य

                                             "सूर्य आत्मा जगत्स्तथुषश्च"
 सूर्य ग्रहों में राजा है!इसकी जाति राजक्षत्रिय है!इसका रंग रक्त के समान है!सूर्य के देवता अग्नि है!इसके अधिपति शिव है!सूर्य की दिशा पूर्व दिशा है!यह नैसर्गिक पाप ग्रह ना होकर नैसर्गिक क्रूर ग्रह है!
वैज्ञानिक दृष्टिकोण:-सूर्य वास्तव में एक तारा है,जो हमारे सौरमंडल को बाँधे रखने का कार्य करता है!सूर्य ही सौरमंडल का केंद्र बिंदु है,जिसके चारों ओर ग्रह और उपग्रह घूर्णन करते हैं!इसका कारण है,कि सूर्य से ही सभी पिंडों को जीवनी शक्ति प्राप्त होती है!सूर्य के बिना हमारे सौरमंडल और जीवन की कल्पना भी नहीं की जा सकती!यह पृथ्वी के सबसे नजदीक का तारा है!इसीलिये अन्य तारों की अपेक्षा अधिक चमकदार और बड़ा प्रतीत होता है!सूर्य पर हाइड्रोजन गैस का भण्डार है,जिसकी आपस में संयोजित होने की क्रिया से जो असीमित ऊर्जा विसर्जित होती है उसके अंश मात्र से पृथ्वी पर जीवन है,सभी ग्रहों का वातावरण है!
पौराणिक विवेचन:-पुराणों में आलेख मिलते हैं,कि दक्ष प्रजापति की दो कन्याओं दिति और अदिति का विवाह कश्यप मुनि के साथ हुआ था!अदिति के गर्भ से सूर्य का जन्म हुआ इसीलिये इसे आदित्य कहा जाता है!पौराणिक मान्यताओं के अनुसार सूर्य के रथ में सात घोड़े जुते होते हैं!सूर्य ने संज्ञा और छाया से विवाह किया!छाया से शनि नामक पुत्र उत्पन्न हुआ जो पिता के समान बलशाली है!
पर्यायवाची:-सूर्य को अंग्रेजी में SUN,अरबी मैं आफताब,फारसी में खुरशेद कहते हैं!हिन्दी में इसे आदित्य,अर्क,अर्यमा,अंशुमाली,ग्रहपति,दिनकर,दिवाकर,प्रभाकर,भानु,मार्तंड,रवि,सविता,भास्कर,मिहिर,दिनेश इत्यादि नामों से जाना जाता है!
वैदिक मंत्र:-  ॐआकृष्णेन रजसा वर्त्तमानो निवेशयन्नमृतं मर्त्यन्च !
                      हिरण्ययेन सविता रथेना देवो याति भुवनानि पश्यन !!
तांत्रिक मंत्र:- ॐ ह्राँ ह्रीं ह्रौं सः सूर्याय नमः !!
स्वामित्व:-रवि सौरमंडल की आत्मा है,इसके बिना सौरमंडल का अस्तित्व संभव नहीं है!अर्थात जीवन के लिए जितनी भी आवश्यक वस्तुएं हैं उन सब पर सूर्य का ही अधिकार है!हो सकता है पढ़कर ऐसा प्रतीत हो,कि जीवन के लिए तो वायु,भोजन और जल तीनों ही आवश्यक है,फिर इन सब पर सूर्य का अधिकार कैसे है!सूर्य के कारण ही पृथ्वी के पास वह शक्ति है,कि वायु और जल पृथ्वी की सतह पर उपलब्ध है और हमें भोजन प्रदान करने वाला वनस्पति जगत भी अस्तित्वमान है!रवि की ऊष्मा शरीर को जलाने वाली नहीं बल्कि शरीर के जीवित रहने के लिए जरूरी होती है!अतः आत्मा पर सूर्य का स्वामित्व है!आत्मा लौ के रूप में ऊर्ध्वगामी होकर ह्रदय में अवस्थित होती है अतः ह्रदय पर भी इसी ग्रह का अधिकार है!ह्रदय से जुड़े विभिन्न प्रकार के भाव जैसे क्षमाशीलता,अनुशासन भी सूर्य के ही अधिकार में है!
शारीरिक लक्षण एवं रचना:-इनकी आँखों का रंग धुप के जैसा होता है!अब बात आती है,कि धूप का रंग कैसा है तो गौर से देखने पर पता चलेगा कि धूप का रंग शहद के समान हल्का भूरा होता है!इनके शरीर में भी एक शहद जैसे रंग की एक परत चढी महसूस होती है!इनका चेहरा गोल होता है!यह हृदय का कारक है!पुरुषों में दांयी और स्त्रियों में बाँई आँख पर इसका स्वामित्व होता है!पेट में पाई जाने वाली जठराग्नि पर भी सूर्य का अधिकार है!
चरित्र में निहित विशेषताएं:-निःस्वार्थ प्रेम सूर्य की सबसे बड़ी विशेषता है!यह बिना भेदभाव के सबके लिए समान व्यवहार रखता है!इसकी दूसरी विशेषता है नियमित होना जिस प्रकार सूर्य नियमित होता है उसी प्रकार सूर्य के प्रभाव क्षेत्र में आने वाला व्यक्ति भी नियमित होता है!ईश्वर के प्रति सच्चा प्रेम होता है!ये ताकतवर किन्तु न्यायप्रिय होते हैं!इच्छाशक्ति बहुत ही प्रबल होती है!ये कभी थकते नहीं हैं!इनके व्यक्तित्व में एक विशेष आकर्षण होता है!दूसरों पर शासन करने की कला और ऊर्जा होती है!ईमानदारी इनकी चारित्रिक विशेषता में चार चाँद लगा देती है!
बीमारियाँ:-दिल से सम्बंधित बीमारियाँ,गर्मी के कारण होने वाले रोग,ज्वर,दृष्टि-दोष,रीढ़ सम्बन्धित रोग,पाचन से सम्बंधित समस्याएं,आत्म शक्ति की कमी!ब्लड-प्रेशर भी रवि के आधिपत्य में है क्योंकि रक्त का प्रवाह धीरे होगा या तेज यह हृदय के आकुंचन पर निर्भर करता है और हृदय पर सूर्य का अधिकार है!सूर्य के पीड़ित होने पर मुंह से थूक आता रहता है!
व्यवसाय:-राजकीय सेवा,ऊर्जा उत्पादन,दवाइयों से जुड़े व्यवसाय,धन,अनाज के कारोबार,प्रकाश देने वाली चीजें जैसे बल्ब,ट्यूब लाईट के कारोबार,डॉक्टर इत्यादि!सोने का कारोबार!सूर्य स्थिरता का कारक है यह जीवन में स्थायित्व को निर्देशित करता है!पिता द्वारा प्रदत्त स्वयं का काम!
स्टॉक मार्केट:-POWER SECTOR,NUCLEAR ENERGY,GOVT. PUBLIC SECTOR UNITS,MEDIA.
COMMODITY MARKET:-सोना,ताम्बा,कांसा,GUN METAL,माणक,गेंहू,पटाखे,ग्रेफाईट और सल्फर!
राजनीतिक दृष्टिकोण:-प्रशासकों को निर्देशित करता है!राजा,तानाशाह,बड़े शाही नेता,विभागों के अध्यक्ष,वे लोग जिनके पास शक्ति व अधिकार है!ये एक होता है,जो सभी को नियंत्रित करता है यदि इस लिहाज से देखा जाये तो सूर्य के सभी गुण राजशाही में राजा के अंदर देखने को मिलेंगे लोकतंत्र में नहीं क्योंकि लोकतंत्र में तो शासक जनता होती है शक्ति का मुख्य पुंज नागरिक होते है और नेता तो केवल कार्यवाहक होते है या यूं कहें तो नौकर होते है इसलिए मुझे ऐसा लगता है,कि विभागाध्यक्ष तो फिर भी सूर्य के प्रभाव में हो सकते हैं पर नेता तो सेवक हैं मालिक नहीं हाँ ये बात और हैकि ये लोग आगे जाकर स्वयं को लोकतंत्र का उत्तराधिकारी समझने लगें!
पदार्थ:-अखरोट,नारियल,इलाइची,केसर,अजवायन,चावल,मिर्ची,बादाम,मूंगफली,पाइन,विदेशी मुद्रा,दवाएं,
बाजार और संस्थान:-रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया,स्टॉक एक्सचेंज,सरकारी दफ्तर,सोना और इसकी कीमतों में उतार चढ़ाव,सरकारी ऋण इत्यादि!
पेड़-पौधे:-कांटेदार पेड़,बादाम,संतरे,केसर,शीशम,गुलाब और केदार के पेड़ व पौधे!इनके अलावा चिकित्सकीय प्रयोग में आने वाले पादप!
स्थान:-जंगल,शिव मंदिर,सरकारी ऑफिस,पंचायत समिति,ऊर्जा विद्युत केंद्र,विद्युत निर्माण केंद्र,दवाई की दूकान इत्यादि!
अंक:-"एक" पर निर्विवाद रूप से सूर्य का अधिकार है!
दिन,राशि और नक्षत्र:-रविवार का मालिक सूर्य है!राशियों में सिंह राशि का स्वामित्व सूर्य के पास है!सत्ताईस नक्षत्रों में से कृतिका,उत्तराफाल्गुनी और उत्तराषाढा नक्षत्रों का मालिक भी सूर्य है!
रत्न:-माणक सूर्य का प्रमुख रत्न है!इसे सोने में मढवाकर पहना जा सकता है!यह रोगप्रतिरोधक क्षमता को बढाने के साथ-साथ सरकारी साख भी बढाता है!
जीव-जंतु:-शेर,घोडा,मवेशी और जंगल में रहने वाले अन्य जंगली जानवर!
       सूर्य ग्रीष्म ऋतु का मालिक होता है!यह एक माह तक एक राशि में रहता है और इसकी एक दिन की गति लगभग एक अंश होती है!सौरमंडल में सूर्य के गति को अयनांश कहा जाता है!घर में सूर्य का स्थान पूजन-कक्ष होता है!सूर्य प्रभावित व्यक्तियों के घर का दरवाजा पूर्व दिशा मैं होता है!सूर्य चालित व्यक्ति के दांये नितंब पर निशान बना होता है!

Friday, August 19, 2011

ग्रहों की युति


  बात कुछ दिनों पहले की है,मेरे एक दोस्त मनीष जी गंगानगर से मुझसे मिलने बीकानेर आये हुए थे. बातों के दौरान ज्योतिष विषय पर चर्चा शुरू हुई. इसी क्रम में उन्होंने मुझसे पूछा,कि ग्रहों की युति को आप किस तरह से परिभाषित करेंगे. उसके बाद हमारी कुछ बातें इस विषय पर हुई,शायद ज्योतिष जिज्ञासुओं के लिए काम की हो इसलिए संवाद रूप में यहाँ लिख रहा हूँ.

मनीष जी:- ग्रहों की युति अपना प्रभाव किन-किन तरीकों से देती है?यदि दो ग्रह हों तो और यदि तीसरा ग्रह भी उनमें सम्मिलित हो तो उसका क्या प्रभाव पड़ता है,क्या वह पूरी तरह से युति के प्रभाव को बदल देता है या फिर कुछ और?सबसे महत्वपूर्ण बात हम फलादेश करते समय इन युतिओं को किस तरह काम में ले सकते हैं?
ज्योतिष विद्यार्थी:-सबसे पहले तो मोटी बात करते हैं ग्रहों के मैत्री आधारित युति संबंधों पर.ये सम्बन्ध मुख्यतया तीन तरह के होते हैं!
1.जब दो मित्र ग्रह युति में हों.
2.जब दो सम ग्रह युति में हों.
3.जब दो शत्रु ग्रह युति में हों.
              अब साधारण सी बात है,कि जब दो मित्र साथ-साथ होंगे तो कुछ न कुछ सार्थक होगा जैसे यदि वह किसी विषय पर चर्चा कर रहे हैं या अगर कहीं घूमने गए हैं,तो माहौल शांतिमय और माधुर्यपूर्ण होता है.अगर दो अजनबी जो एक दुसरे के पास-पास बैठे हैं,तो उनमें आपस में जान-पहचान होगी कुछ बातचीत होगी और साधारण शांतिमय माहौल होगा.अंत में बात करते हैं शत्रु ग्रहों की,अगर दो शत्रु ग्रह एक साथ हो तो वो उस स्थान को अशांतिमय कर देंगे और विध्वंसकारी प्रवृत्तियों को वहाँ केंद्रित करेंगे.
        अलग दृष्टिकोण से देखने पर मान लें की एक कमरा एक राशि है,यदि एक ग्रह उस राशि के एक किनारे पर बैठा है और दूसरा दुसरे किनारे पर तो युति प्रतीत होते हुए भी उनकी युति का फल प्राप्त नहीं होता है.अब क्या दो लोग एक कमरे के दो अलग-अलग छोर पर बैठकर बातचीत कर सकते हैं क्या?नहीं लेकिन हाँ एक कमरे के अंतिम छोर पर बैठा व्यक्ति अगले कमरे के शुरुआती छोर पर बैठे व्यक्ति से आराम से बातचीत कर सकता है.वास्तव में कई बार जन्मकुंडली में ऐसा ही देखने को मिलता है,कि एक भाव में स्थित दो ग्रहों में तो युति का फल नहीं मिलता जबकि दो अलग भावों में बैठे ग्रहों की युति का फल प्राप्त होता है.एक बात और जैसे मान लें कि एक दोस्त सड़क पर चला जा रहा है और पीछे से उसका एक दोस्त आ रहा है,तो वह उस आगे वाले दोस्त को आवाज देकर रोकता है,उससे बात करता है फिर दोनों चल पड़ते हैं. अर्थात ग्रहों की युति जब बनने वाली होती है तो वह अधिक ताकतवर होती है और जब छूट रही होती है तो कमजोर होती जाती है.ये तो बात हुई दोस्ती और दुश्मनी की लेकिन जब उन्होंने पूछा की इन युति के प्रभाव को जन्मपत्रिका में किस प्रकार देखेंगे तो कुछ देर सोचने के बाद मैंने उन्हें समझाने के लिए एक सारणी बनाई उसे यहाँ पेश कर रहा हूँ.मैंने इस सारणी में चंद्र को प्रधान ग्रह के रूप में लिया है और अन्य ग्रहों का इसके साथ युति सम्बन्ध किस तरह होगा इस पर चर्चा करने का प्रयास किया है,आशा है कि आप सब को भी पसंद आएगा.
                                                       -:चंद्र:-(विचार)
शनि(दु:ख,विषाद,कमी,निराशा)               :- मन में दु:ख,नकारात्मक सोच.
मंगल(साहस,धैर्य,तेज,क्षणिक क्रोध)        :-  विचारों में ओज,क्रांतिकारी विचार. 
बुध(वाणी,चातुर्य.हास्य)                           :- हास्य-व्यंग्य पूर्ण विचार,नए विचार.
गुरु(ज्ञान,गंभीरता,न्याय,सत्य)            :- न्याय,सत्य और ज्ञान की कसौटी पर कसे हुए गंभीर विचार.
शुक्र(स्त्री,माया,संसाधन,मिठास,सौंदर्य)     :- माया में जकड़े विचार,सुंदरता से जुड़े विचार.
सूर्य(आत्म-तेज,आदर)                            :- आदर के विचार,स्वाभिमान का विचार.
राहू(मतिभ्रम,लालच)                               :- विचारों का द्वंद्व,सही-गलत के बीच झूलते विचार.
केतु(कटाक्ष,झूठ,अफवाह)                        :- झूठ,अफवाह और सही बातों को काटने का विचार.
               यहाँ जैसे मैंने चन्द्रमा के केवल एक कारक को लेते हुए दुसरे ग्रहों के वे कारकत्व जो चंद्र से मिल सकते हैं,मिलाया है और युति का फल बतलाने का प्रयत्न किया है अब इन्हीं का फल अलग तरह से भी पता लग सकता है,जैसे ऊपर की सारणी की ही बात करें तो चंद्र माता का भी स्वामित्व रखता है,अब चंद्र रूपी माता का शनि के किस कारक से संयोग होगा यह विचार कर प्रभाव ज्ञात कर सकते हैं!यहाँ मैंने मूल तरीका बताने की कोशिश की है,कैसा लगा.यदि किसी सुधार की गुंजाइश हो तो अवश्य सूचित करें. 





Saturday, August 13, 2011

आखिर बुल्लेशाह फकीरी में रम गए


             

मनुष्य ईश्वर का ही अंश है इसलिए उसके अंतस में सदैव परब्रह्म का प्रतिबिम्ब विद्यमान रहता है!और मूल रूप से इसी प्रतिबिम्ब को साक्षात् प्राप्त कर लेना ही मनुष्य का लक्ष्य होता है लेकिन इस मायानगरी में प्रवेश करते ही सत्व,रज और तमोगुण के फंदे उसे इस प्रकार जकड लेते हैं,कि वह अपने प्रमुख लक्ष्य से विमुख हो जाता है!फिर भी मन में यदा-कदा ईश्वर को मिलने का विचार हिलोरें लेने लगता है,लेकिन यदि उस वक्त किसी श्रेष्ठ गुरु का सानिध्य प्राप्त हो जाये तो मनुष्य फकीरी की राह पर चलकर सबकुछ पा लेता है,अन्यथा जीवन भर सबकुछ पाकर भी फ़कीर ही बना रहता है!इसी सन्दर्भ में एक छोटी से घटना का उल्लेख यहाँ कर रहा हूँ,जो इस बात को चरितार्थ करती है,कि श्रेष्ठ गुरु का क्या महत्व है!और साथ-साथ यह भी बताती है,कि श्रेष्ठ गुरु ईश-अनुकम्पा से ही प्राप्त होता है!
 फ़कीर बुल्लेशाह एक रियासत के बादशाह थे!पर उनकी सदैव इच्छा रहती थी,कि वे अपना मन अध्यात्म में लगाएं,पर ग्रह-योग उनका साथ नहीं दे पा रहे थे और वे बस मन में सोचकर ही रह जाते थे!एक दिन एक फ़कीर घूमते-घूमते उनके राजमहल में पहुंचा!
फ़कीर ने राजा से पूछ लिया:-ये किसकी सराय है?
 राजा ने कहा:-यह सराय नहीं है बल्कि महल है और आप इस राजमहल को सराय कह रहे हैं!
फ़कीर ने कहा:- तुमसे पहले यहाँ कौन रहता था?
राजा ने कहा:-हमारे वालिद और उनसे पहले उनके वालिद यानि हमारे दादा हुज़ूर रहा करते थे!
फ़कीर ने कहा:-जहां लोग आते-जाते रहे,कुछ समय ठहरकर लौट जायें वह सराय नहीं तो और क्या है!
पर बुल्लेशाह को वैराग्य की वो शक्ति नहीं मिली,कि वो बात को पूरी तरह समझ पाते!कुछ दिनों के पश्चात एक फ़कीर और आया और महल के बाहर बैठकर एक गगरी में हाथ डालकर कुछ खोजने लगा!बुल्लेशाह जब बाहर घूमने निकले तो फ़कीर से पूछा कि बाबा क्या खोज रहे हो?
फ़कीर:-बेटा मेरा ऊँट खो गया है बस उसीको ढूंढ रहा हूँ!
राजा:-ये आप क्या कह रहे हैं बाबा,गगरी में ऊँट कैसे आ सकता है जो आप उसे गगरी में खोज रहे हो!
तब फ़कीर ने कहा कि जब तू महल में बैठकर अल्लाह को ढूंढ सकता है,तो मैं गगरी में ऊँट क्यों नहीं ढूंढ सकता !
तब बुल्लेशाह का वैराग्य चरम पर पहुँच गया!कुछ समय बाद उन्होंने  राजमहल(सराय)छोड़ दिया!पंजाब आकर फ़कीर बन गए और ईश्वर रूपी सच्ची दौलत उन्हें प्राप्त हो गयी!
    जय गुरुदेव.

शिव का तीसरा नेत्र :- एक रहस्य


जब कभी भी अध्यात्मिक चर्चाओं का दौर चल पड़ता है और उसी प्रवाह में भोलेनाथ अर्थात शिव के बारे में बात होने लगे तो एक तस्वीर मानस-पटल पर साफ़ रहती है,कि,शिव बड़े ही भोले देवता हैं,लेकिन क्रोधित होने पर वे तांडव करने लगते हैं,नृत्य के चरम पर उनके ललाट पर स्थित उनका तीसरा नेत्र खुलता है और सबकुछ भस्म!अब बात करें तीसरे नेत्र की तो क्या वास्तव में शिव के ललाट पर दो नेत्रों के समान तीसरा नेत्र होता है!अगर होता भी है तो उसमें ऐसा क्या है,कि वह केवल क्रोध आने पर ही खुलता है सामान्य अवस्था में बंद रहता है!                                                                                                          मैंने इस बारे में कुछ अलग विचार करना प्रारंभ किया और सोचते-सोचते आज दस पंक्तियों का विचार पककर तैयार हुआ सो आपके समक्ष पेश कर रहा हूँ!ये मेरा व्यक्तिगत विचार है,ऐसा ही होता हो आवश्यक नहीं!आशा है पाठकगण इसमें आवश्यकता होने पर सुधार का प्रयास करेंगे!    यदि आदिकाल से शुरू करें तो सृष्टि के आरम्भ में केवल पुरुषों की उत्पत्ति ब्रह्मा ने की!ब्रह्मा जब स्त्री की उत्पत्ति नहीं कर पाए तो उन्होंने शिव से प्रार्थना की तो शिव  ने आदिशक्ति माया(योगमाया) को स्त्री के रूप में उत्पन्न कर अपने शरीर से अलग किया और इसी माया ने स्त्री जाति का निर्माण किया!अतः स्त्री वास्तव में माया का ही प्रतिबिम्ब है!यह माया सदैव पुरुषों के ललाट पर ही निवास करती है,जैसे ही पुरुष के शरीर,नेत्र या मानसिक विचारों का संसर्ग स्त्री स्वरुप के साथ होता है,तो उसकी छवि सर्वप्रथम मनुष्य के ललाट पर जाकर स्थित हो जाती है!ललाट पर ही मनुष्य का ज्ञान -चक्षु स्थित होता है और यह छवि ललाट पर जाकर मनुष्य के ज्ञान-चक्षुओं पर पर्दा डाल देती है,जिसके कारण उसके दिमाग कुछ भी सोचने-विचार करने का सामर्थ्य समाप्त हो जाता है,कि वह जो कर रहा है वह सही है या गलत!उस समय केवल अंतरात्मा ही ये सन्देश देती है,कि तू जो कर रहा है वह गलत है लेकिन मष्तिष्क इस बात को मानने के लिए तैयार नहीं होता,क्योंकि वह तो माया की चपेट में होता है!अतः विचार किया जा सकता है,कि ललाट पर स्थित चक्षु कोई सामान्य नहीं बल्कि ज्ञान का बोध करवाने वाला नेत्र होता है!चूंकि साधारण मनुष्य माया के आवरण से पूर्णतया लिप्त रहता है अतः उसके ललाट पर इसका कोई अंश भी दृष्टिगोचर नहीं होता है!अब जब माया साधारण मनुष्य पर अपना त्रिगुणात्मक फंदा डालती है,तो वह पूर्णतया उसकी चपेट में आ जाता है पर जब यही प्रभाव कोई शिव पर करने का प्रयत्न करे तो वह ज्ञान रूपी अग्नि से जलकर भस्म हो जाता है!जिस प्रकार कामदेव हो गया था,जिसने शिव की माया का प्रयोग उन्हीं पर करने का प्रयत्न किया!शिव का तीसरा नेत्र शरीर मैं आज्ञा चक्र के केंद्र में स्थित है जहां विवेक बुद्धि का निवास होता है!देखा जाए तो शिव का तीसरा नेत्र ज्ञान पुंज है,जो अज्ञान रूपी अंधकार को जलाकर भस्म कर देता है!"साधारण रूप में देखें तो शिव ईश्वर हैं और बुरे लोगों को अपने तीसरे नेत्र की अग्नि से जलाकर भस्म कर देते है और यदि अलग तरह से देखने का प्रयत्न करें तो शिव का तीसरा नेत्र ज्ञान पुंज है जो अज्ञान का नाश करता है!"तो चलो तीसरा नेत्र हम भी प्राप्त करें!

Monday, June 13, 2011

कर्म और भाग्य -३


                            कर्मों की व्याख्या :-के.एस.कृष्णमूर्ति
 कृष्णमूर्ति पद्धति के बारे में बात करने से पहले मैं बात करना चाहूँगा कर्म के सिद्धांत के बारे में जिसका उल्लेख प्रो. के. एस. कृष्णमूर्ति जे ने अपनी पुस्तक "FUNDAMENTAL PRINCIPLES OF ASTROLOGY" में किया है!क्योंकि चाहे जीवन हो ज्योतिष ये सब कर्म ही तो हैं जो इनका निर्धारण करते हैं !जीवन और ज्योतिष में कर्मों के सम्बन्ध और महत्त्व को समझने लिए ही कर्मों के सिद्धांत को पहले समझना आवश्यक सा देख पड़ता है !कृष्णमूर्ति जी ने अपनी पुस्तक में में कर्मों की तीन श्रेणियों का जिक्र किया है ! 
1. अदृढ़ कर्म       2. दृढ़ कर्म          3. दृढ़ अदृढ़ कर्म 
1. दृढ़ कर्म:- कर्म की इस श्रेणी में उन कर्मों को रखा गया है जिनको प्रकृति  के नियमानुसार माफ नहीं किया जा सकता !जैसे क़त्ल,गरीबों को उनकी मजदूरी न देना,बूढ़े माँ - बाप को खाना न देना ये सब कुछ ऐसे कर्म हैं जिनको माफ नहीं किया जा सकता ! ऐसा व्यक्ति अपने जीवन में चाहे कितने ही शांति के उपाय करे लेकिन उसका कोई भी प्रत्युत्तर उन्हें देख नहीं पड़ता है ,चाहे ऐसे व्यक्ति इस जीवन में कितने ही सात्विक जीवन को जीने वाले  हों लेकिन उनको जीवन कष्टमय ही गुजरना पड़ता है वे अपने जीवन के दुखों को दूर करने के लिए विभिन्न ज्योतिषीय उपाय करते देखे जाते हैं लेकिन अंत में हारकर उन्हें यही कहने के लिए मजबूर होना पड़ता है,कि ज्योतिष और उपाय सब कुछ निरर्थक है ,लेकिन ये बात तो एक सच्चा ज्योतिषी जनता है कि क्यों यह व्यक्ति कष्ट माय जीवन व्यतीत करने बाध्य है !
2.दृढ़ अदृढ़ कर्म:-कर्म की इस श्रेणी में जो कर्म आते है उनकी शांति उपायों के द्वारा की जा सकती है अर्थात ये माफ किये जाने योग्य कर्म होते हैं !जैसे कोई  व्यक्ति कोलकाता जाने लिए टिकट लेता है परन्तु भूलवश मुम्बई जाने वाली ट्रेन में बैठ जाता है !ऐसी स्थिति में टिकट चेक करने वाला कर्मचारी पेनल्टी के पश्चात उस व्यक्ति को सही ट्रेन में जाने की अनुमति दे देता है !ऐसे वैसे व्यक्ति सदैव ज्योतिष और इसके उपायों की तरफदारी करते नजर आते हैं !
3. अदृढ़ कर्म:-(नगण्य अपराध) ये वे कर्म होते हैं जो एक बुरे विचार के रूप में शुरू होते हैं और कार्य रूप में परिणत होने से पूर्व ही विचार के रूप में स्वतः खत्म हो जाते हैं ! जैसे एक लड़का आम के बाग को देखता है और उसका मन होता है ,कि बाग से आम तोड़कर ले आये लेकिन तभी उसकी नजर रखवाली कर रहे माली पर पड़ती है और वह चुपचाप आगे निकल जाता है !यहाँ बुरे विचारों का वैचारिक अंत हो जाता है अतः ये नगण्य अपराध की श्रेणी में आते हैं और थोड़े बहुत साधारण शांति - कर्मों के द्वारा इनकी शांति हो जाती है ! ऐसे व्यक्ति ज्योतिष के विरोध में तो नहीं दिखते लेकिन ज्यादा पक्षधर भी नहीं होते !
           ज्योतिष का एक जिज्ञासु विद्यार्थी होने के नाते कहना चाहूँगा कि सभी को अपनी दिनचर्या में साधारण पूजन कार्य और मंदिर जाने को अवश्य शामिल करना चाहिए क्योंकि ये आदत पता नहीं कितने ही  अदृढ़ कर्मों से जाने - अनजाने में छुटकारा दिला देती है !कर्म और भाग्य के विषय में इसी श्रृंखला के आगामी लेख में कर्म और भाग्य के रहस्य का पूर्ण सत्य विवरण प्रस्तुत करने का प्रयत्न करूँगा !
!जय गणेश!
!!जय गणेश!!