Showing posts with label बाबा रामदेव. Show all posts
Showing posts with label बाबा रामदेव. Show all posts

Thursday, October 4, 2012

धार्मिक कर्म में मौलि बंधन क्यों ?

       किसी भी शुभ कार्य से पहले जैसे कोई पूजा -  अनुष्ठान , गृह प्रवेश ,दीपावली की पूजा  या अन्य कोई भी पूजन सर्वप्रथम पंडित जी यजमान (यज्ञमान) को तिलक करते हैं और मौली बंधते हैं फिर पूजा आरम्भ होती है ! मौली बंधते वक़्त इस  मंत्र का उच्चारण  जाता है:-


        येन  बद्धो बलीराजा दावेंद्रो महाबलः !
            तेन त्वामनुबध्नामि रक्षे  माचल माचल !! 


       ये प्रथा कब शुरू हुई और इसके महत्त्व के विषय में अनेक आख्यान शास्त्रों में मौजूद हैं !मौली बंधने की परंपरा तब से चली आ रही है, जब से महान , दानवीरों में अग्रणी महाराज बलि की अमरता के लिए वामन भगवान् ने उनकी कलाई पर रक्षा सूत्र बांधा था !

            इसे रक्षा  कवच के रूप में भी  शरीर पर बांधा जाता है !इन्द्र जब वृत्रासुर से युद्ध करने जा रहे थे तब इंद्राणी शची ने इन्द्र की दाहिनी भुजा पर रक्षा-कवच के रूप में मौली को बाँध दिया था और इन्द्र इस युद्ध में विजयी हुए ! 

      स्वास्थ्य के अनुसार मौली-बंधन से वात पित्त और कफ तीनों का शरीर में संतुलन बना रहता है और शरीर नीरोग रहता है !साधारणतया हम देखते हैं,कि यदि कोई कर्मकांडी पुरोहित जो कई दिनों तक चलने वाले अनुष्ठान में  हैं और दुर्भाग्यवश उनके कुटुंब में किसी निकट संबंधी की मृत्यु हो जाती है तो भी उनको "सूतक"का दोष नहीं लगता है और वो अपना अनुष्ठान निर्विघ्न पूरा कर सकते हैं,क्योंकि क्योंकि उनहोंने पूजन आरम्भ होने पर बंधी जाने वाली मौली बाँध  रखी है!यानी की मौली के प्रभाव से उस बड़े अनुष्ठान पर बाधा ताल जाती है ! 





    

Monday, January 9, 2012

4.रोहिणी


नक्षत्र:रोहिणी

                                                                     4.रोहिणी 
रोहिणी नक्षत्र का वैदिक नाम रोहिणी ही है!इस नक्षत्र में पांच तारे मिलकर शकट अर्थात गाड़ी की आकृति का निर्माण करते हैं!संहिता ग्रंथों में रोहिणी को शकट-भेदन कहा गया है!रोहिणी का अर्थ है ऊपर की ओर बढ़्ने वाली वस्तुएं!इस नक्षत्र का स्वामी ब्रह्मा को माना गया है!नौ ग्रहों में चंद्र रोहिणी नक्षत्र का अधिपति है!यह स्थिर नक्षत्र है,अर्थात इसमें स्थिरता वाले कार्य जैसे गृह-प्रवेश,बिजाई,व्यापार शुरू करना,मंदिर बनाना आदि कार्य शुरू किये जा सकते हैं!यह ऊर्ध्वमुख नक्षत्र है अर्थात ऊपर की ओर बढ़ने वाले कार्य जैसे नौकरी शुरू करना,बड़े पद को ग्रहण करना,और विकासशील कार्य शुरू किये जा सकते हैं!चैत्र मास का रोहिणी नक्षत्र शून्यसंज्ञक होता है,इस दिन कोई शुभ कार्य नहीं करना चाहिए!शनिवार को रोहिणी नक्षत्र हो तो अमृतसिद्धि योग का निर्माण होता है और यही नक्षत्र सोमवार को हो सर्वार्थसिद्धि योग का निर्माण होता है!अपवाद के रूप में शनिवार को रोहिणी नक्षत्र हो और उसी दिन एकादशी भी हो तो विषयोग का निर्माण होता है,जो सभी शुभ कार्यों के लिए वर्जित है!इस नक्षत्र के लिए जामुन की पूजा की जाती है!रोहिणी नक्षत्र की जाति किसान,मजदूर या हलवाहे की होती है!यह नक्षत्र स्त्रीसंज्ञक होता है!गोत्र का संबंध अत्रि मुनि से है!इसकी नाड़ी अन्त्या,गण मनुष्य और योनि सर्प की होती है!यह कालपुरुष की आँखों का स्वामित्व रखता है!अनुमष्तिष्क,ग्रीवा कशेरुक और तालू पर इसी नक्षत्र का अधिकार होता है!भूसे की गाडी के आकार जैसा यह नक्षत्र फरवरी माह मे रात को 9 बजे तक दिखाई देता है!
कारकत्व:-रोहिणी नक्षत्र अधिकता से सम्बंधित है जैसे कोई आपको प्रश्न करे कि बारिश होगी क्या? उस वक्त चंद्र और लग्न का सम्बन्ध रोहिणी नक्षत्र से हो तो अच्छी बारिश होती है!जुबान के पक्के,व्यापारी,अधिकारी,योगी,पानी के जीव,खेती करने वाले,जंगली प्रदेश!
नक्षत्रफल:-रोहिणी का संबंध विकास से है!सत्यवादी,चतुर,तेजस्वी,स्थिति को भांप लेने वाले,निडर,सांसारिक सुखों में तल्लीन,खेती से प्रेम,वाक्-पटु होते हैं!
पदार्थ:-रस वाले पदार्थ,ऊन,समय सात दिन!
व्यक्ति:-इनकी आँखें बड़ी-बड़ी होती है!अपने लक्ष्य के प्रति निष्ठावान होता है!नए विचार व परिवर्तन का स्वागत करता है!व्यवस्थित ढ़ग से काम करना रोहिणी नक्षत्र का विशिष्ट गुण है!जलचर,कृषक,राजसिक प्रवृत्ति के लोग,ट्रेवल एजेंट,जहाज का कप्तान इत्यादि!
रोहिणी नक्षत्र का वैदिक मंत्र:-ब्रह्मजज्ञानं प्रथमम्पुरस्ताद्विसीमः सुरुचे वेन आयवः सबुध्न्या उपमा अस्य विष्ठा: सतश्च योनिमसतश्च विध: !!  
बीमारियाँ:-गले की खराश,पाँव व छाती में दर्द,स्त्रियों को अनियमित मासिक!
मानसिक गुण:-सौंदर्य-प्रेमी,मधुर भाषी,स्थिर मानसिकता,प्रिय मिजाज वाला,शुद्ध ह्रदय,परोपकारी!
व्यवसाय:-यह कृ्षि उत्पादन व खनिज उद्योग से जुडा़ है!यात्रा वृत्तांत लेखक,आवास का क्रय-विक्रय करने वाला,
विशेष:-पौराणिक कथाओं के अनुसार रोहिणी चन्द्रमा की सत्ताईस पत्नियों में सबसे सुदर है!कृष्ण जी का जन्म भाद्रपद मास की कृष्णपक्ष अष्टमी तिथि को रोहिणी नक्षत्र में हुआ था!

Tuesday, June 28, 2011

श्री गणेश कहते हैं

          आज तक हमने सिर्फ ये सुना और जाना है,कि किसी भी पूजा के करने से पहले गणेश जी पूजा करनी चाहिए आइये आज गणेश जी के प्रथम पूज्य होने के अलावा उनके अन्य पक्षों पर दृष्टिपात करते हैं ! श्री गणेश केवल उपदेशात्मक रूप से नहीं बल्कि इस मोह माया युक्त संसार में जीवन को किस प्रकार व्यतीत करना चाहिए इसके बारे में अपने प्रत्येक अंग से कुछ न कुछ कहते हैं !आइये जानते हैं उन सभी नियमों के बारे में जो हमें गणेश जी प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से अपने शरीर के विभिन्न अंगों के द्वारा बता रहे  हैं !
मस्तक :- गणेश जी का मस्तक काफी बड़ा होता है जो हमें अपनी सोच को बड़ा बनाये रखने की और बड़े विचारों को मस्तिष्क में स्थिरता रखने की सलाह देता है !
आँखें :- गणेश जी आँखें काफी छोटी - छोटी होती है जो हमें  सन्देश देती है , कि जीवन में सफल होने के लिए एकाग्रता का होना सर्वाधिक महत्वपूर्ण है !एकाग्रता के बिना सरल से सरल काम को भी पूर्ण नहीं किया जा सकता है और एकाग्रता हो तो पानी में देखकर भी घूमती हुई मछली की आँख को निशाना बनाया जा सकता है ! 
कान :- गणेश जी के कान काफी बड़े होते हैं और ये बड़े कान हमें एक अच्छा श्रोता बनने का सन्देश देते हैं !अर्थात हमारे अंदर धैर्य और एकाग्रता पूर्वक अच्छी बातों को सुनने का सामर्थ्य होन चाहिए ! 
कुल्हाड़ी :- गणेश जी के दांये हाथ की कुल्हाड़ी हमें ये प्रेरणा देती है , कि हमें सांसारिक बंधनों की असत्य डोरियों को काटकर एकमात्र सत्य ईश्वर की और अग्रसर होने का प्रयत्न करना चाहिए ! 
रस्सी :-गणेश जी के बांये हाथ की रस्सी स्वयं को अपने जीवन के चरम लक्ष्य की और खींच कर ले जाने का संकेत देती है और यह लक्ष्य है स्वयं श्री गणेश !
मुख :-गणेश जी का मुख काफी छोटा होता है परन्तु ये हमें दो संकेत देता है , कि एक तो हमें कम बोलना चाहिए !कम बोलने से तात्पर्य है कि जितनी आवश्यकता हो उतना ही बोलना चाहिए अधिक नहीं ! दूसरा संकेत जो हमें गणेश जी के मुख से प्राप्त होता है वह है ,कि हमें  कम खाना चाहिए अर्थात जीवन के लिए भोजन करना चाहिए न कि केवल स्वाद के लिए !
दांत :-गणेश जी का  केवल एक ही दन्त होता है दूसरा नहीं अर्थात हमें केवल अच्छी वस्तुओं का संग्रह करना चाहिए बुरी वस्तुओं का नहीं !दूसरा संकेत हमें ये प्राप्त होता है , कि यह शरीर नश्वर होता है जिसे एक दिन अवश्य ही खत्म हो जाना है !इसलिए शरीर का अधिक मोह नहीं करना चाहिए !लेकिन "शरीर माध्यम खलु धर्मंसाधनं"के विचार को महत्व देते हुए हमें शरीर को नीरोग रखने का पूरा कर्म करना चाहिए क्योंकि शरीर ही संसार में सभी धर्मों को पूरा करने का माध्यम है और मोक्ष का माध्यम है !
सूंड :- गणेश जी की सूंड मानव शरीर की adaptibility का सर्वश्रेष्ठ उदहारण है !यह सूंड हमें शरीर में दुसरे परिवर्तनों को सहेजने और उनके साथ उसी कुशलता से काम करने का सन्देश देती है !जिस प्रकार स्वयं गणेश जी ने हाथी की सूंड का सामंजस्य स्वयं के शरीर के साथ करते हुए अपने मुख के सभी कार्य सूंड के साथ निर्विघ्न्तापूर्ण संपन्न किये !
हस्त :- गणेश जी का दांया हाथ जो आशीर्वाद  देने की मुद्रा में उठा हुआ है ,वो सभी जीवों को सुखपूर्वक जीने का आशीर्वाद दे रहा है !और साथ ही साथ संसार से ईश्वर तक जाने वाले उस दिव्य पथ को भी आलोकित कर रहा है ! 
मोदक अर्थात लड्डू :-मोदक हमें इस बात की सूचना देता है कि यदि आप कोई कर्म करते हैं तो आपको उसका फल तो मिलेगा ही लेकिन यदि आपका कर्म और उसके प्रभाव नश्वर होते हैं तो आपको नष्ट  होने वाला फल ही प्राप्त होगा लेकिन यदि आपके कर्म ईश्वर प्राप्ति के मार्ग को प्रशस्त करने वाले हैं तो आपका प्रसाद भी अलौकिक ,दिव्य और गणेश जी के मोदक के समान अनश्वर होगा ! (अर्थात साधना का फल है मोदक)
बड़ा पेट  :-गणेश जी का बड़ा पेट हमें इस बात की शिक्षा देता है ,कि हमें जीवन में जो कुछ भी हो रहां है उसे शांतिपूर्वक पचा लेना चाहिए!चाहे वह अच्छा हो रहा है या बुरा ! 
प्रसाद :- गणेश जी सामने रखा हुआ प्रसाद ये बता रहा  है , कि सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड आपके कदमों में है और आपके आदेश की प्रतीक्षा कर रहा है ! 
मूषक(चूहा):- मूषक अर्थात गणेश जी का वाहन !मूषक के द्वारा गणेश जी ये बताना चाह रहे हैं ,कि ऐसी इच्छाएं जो हमारे वश में नहीं होती हैं वो नुकसान पहुंचा सकती है इसलिए इच्छाएं सदैव उस आकार की ही होनी चाहिए कि हम उन पर सवारी कर सकें यदि यदि इच्छाएं हम पर सवारी करना शुरू कर देती है तो मुश्किल हो जाती है !विशालकाय गणेश जी का वाहन छोटा सा मूषक इसी बात की दार्शनिक व्याख्या करता नजर आता है  !
         क्यों गणेश का केवल मुख नहीं अंग - अंग बोलता है और वो भी लाजवाब !गणेश जी ने इतनी बुद्धि और अवसर दिया ताकि उनकी यशगाथा में शामिल हो सकूं इसके लिए उनका धन्यवाद ! 
! जय गणेश !